संपादक फेसबुक से कहानियां उठाते हैं और अखबार में फैलाते हैं
फेसबुक और अखबार जब टेलिविज़न से अखबार का मुकाबला हुआ , तो दहशत खाए अखबारों ने तुरंत चोला बदला .वे अधिक से अधिक 'दृश्य' हो गए . ढेर सारे चित्र . कम से कम शब्द . अधिक से अधिक रंग. भाषा भी अधिक सनसनीखेज और चित्रात्मक . हिंसा और सैक्स की रेलपेल . यह सब कर के उन्होंने अपना वजूद तो बचा लिया , लेकिन ईमान गँ...
