अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी और मीडिया का मौन

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arnab goswami arrested

रीवा सिंह, पत्रकार, ऑनलाइन मीडिया

लगभग 7 वर्ष पहले आउटलुक और नेटवर्क 18 से 200 लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। बाकी मीडियाकर्मी चुपचाप अपना काम करते रहे। किसी दिग्गज-दिलेर पत्रकार के मुंह से विरोध के स्वर नहीं फूटे जब कुछ वर्ष पहले दैनिक भास्कर अपने लोगों को अनायास ही टाटा कह रहा था।

मिलिंद खांडेकर और पुण्य प्रसून वाजपेयी एबीपी से बाहर हुए तो भी कोई क्रांति नहीं हुई, पत्रकारों ने यह भी कहा कि जब इनकी बोलने की बारी थी तब ये चुप रहे जबकि इनके बोलने से बदल सकती थी सूरत।

जब रवीश कुमार को फुटकर के भाव में धमकियां मिलती हैं जो कभी भी सच में तब्दील हो सकती हैं तब भी नहीं आता कोई होनहार पत्रकार यह कहने कि हम साथ हैं।

छोटे पत्रकार तो वो छोड़कर जो करने आये थे, वो सबकुछ कर रहे हैं जिससे पेज व्यूज़ आयें, टीआरपी आये, ग्रोथ मिले प्लैटफ़ॉर्म को। वो मीडियाकर्मी रह गये हैं। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, यह समझ रहे हैं और उनकी क्रांति क्लर्की बनती जा रही है।

पत्रकारों को आदत ही नहीं रही है साथ खड़े रहने की, एकजुट रहने की इसलिए बाहर से सुपरमैन दिखने वाले ये प्रेसकर्मी शोषित रहते हैं – दूसरों के हक़ की बात करना, अपने हक़ पर मौन हो जाना।

ख़ूब बात हुई बेरोज़गारी की, नौकरी छूटने की लेकिन किसी मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर नहीं दिखा कि कितने पत्रकारों को कोविड का हवाला देकर घर बिठा दिया गया। पत्रकार लिखते रहे जीडीपी की गिरावट, नहीं लिख सके कि वेतन इतना कट गया है कि इएमआई देना मुहाल हुआ है।

नहीं लिखते हैं कलम के क्रांतिवीर यह सब, मैं लिखती हूं तो उसकी क़ीमत चुकाती हूं और चुका रही हूं। किसी मीडिया हाउस को इतना बेबाक कर्मचारी नहीं चाहिए। फिर भी बोलने का जोखिम उठा रही हूं कि नहीं हुआ कुछ तो खेती ही करूंगी। बंजर होने से बेहतर है।

अर्णब गोस्वामी की पत्रकारिता आपको निराश-हताश करती होगी। You might have had issues with his idea of journalism but should that stop him from speaking? What happened to tolerance now? Where’s the freedom of speech? Don’t remind me that it’s abided by terms and conditions when you can see the arbitrariness of the Maharashtra govt.
Remember Voltaire said – “I may not agree with what you have to say, but I will defend to the death your right to say it.”

दो वर्ष पुराने केस में जिसे बंद किया जा चुका था, दोबारा खोला गया और सुबह सात बजे मुंबई पुलिस एंटी टेररिज़्म स्क्वॉड के साथ उनके घर पर थी। यहां तक सब न्यायोचित था भले मनमानी के लिये ही किया गया हो। राइफ़ल्स के साथ स्क्वॉड का उनके घर पहुंचना अजीब है, अजीब तो उन्हें जबरन खींचते-घसीटते हुए वैन में बिठाना भी है। सवाल कहां हैं? किधर हुए?

आपको उनकी पत्रकारिता नापसंद हो सकती है लेकिन एक पत्रकार के साथ पुलिस के इस व्यवहार पर आपत्ति सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि आप उसके विचारों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते तो वॉल्टेयर के कथन को कूड़ेदान में ही रखा करें। निष्पक्ष आप तबतक ही हैं जबतक अपने विरोधी विचारों के हाशिये पर जाने पर आप उत्फुल्ल नहीं होते। उनकी गिरफ़्तारी पर लहालोट हो रहे हैं तो ग़ज़ब हैं आप।

कमरे में चारों ओर से घेर लेना, कंधा दबाकर सोफ़े पर बिठाना, खींचकर कभी हाथ, कभी कंधा पकड़ते हुए झटके से वैन में घुसाना, इसकी क्या ज़रूरत थी? अर्णब कहीं भाग रहे थे? वे आतंकवादी हैं? क्या उनके साथ सही व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए था?

प्रेस क्लब जैसी जगहें सस्ती शराब का अड्डा भर हैं, कोई गिल्ड और कमीटी एकजुट नहीं होती ऐसे किसी भी वाकये पर। वैचारिक मतभेद का दर्द इस तरह भरा हुआ है कि कोई सोच ही नहीं पा रहा कि यह हश्र एक पत्रकार के साथ हो रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तो वैसे भी भगवान भरोसे है, ऐसे सभी लोकतंत्र ट्रायपॉड स्टैंड पर खड़े हैं लेकिन पत्रकारों ने एक चीज़ में तारतम्यता बनाये रखी है और वह है अपने लिये चुप रहने की।

अर्णब के लिये तो फिर भी संबित पात्रा से लेकर अमित शाह तक बोल चुके। वहां कोई दूसरा पत्रकार भी हो सकता था जो निष्पक्ष होता, निर्भीक होता… उसका भी यह हश्र होता। यह हश्र तथाकथित प्रहरी का हो रहा है जिससे लोकतंत्र को परहेज़ है।

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