उत्तराखंड में सरकार भाजपा की और मुख्यमंत्री कांग्रेस का?

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“योगेश भट्ट”-

चुनावी सर्वेक्षणों के लिहाज से देखा जाए तो उत्तराखण्ड की जनता भाजपा की सरकार बनाने के मूड में है। लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि यही जनता मुख्यमंत्री के रूप में फिर से हरीश रावत को ही देखना चाहती है। है ना मजेदार बात? जहां भाजपा हरीश रावत के ‘कारनामों’ को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में है, वहीं कांग्रेस की तरफ से हरीश रावत एक मात्र चुनावी चेहरा हैं। यानी भाजपा की नजर में जो हरीश रावत विलेन हैं, सर्वेक्षण उन्हें मुख्यमंत्री की पहली पसंद भी बता रहे हैं और भाजपा की सरकार भी बनवा रहे हैं। यानी सरकार भाजपा की और मुख्यमंत्री कांग्रेस का। क्या ऐसा संभव है? इतना बड़ा विरोधाभास ?

जी हां चुनावी सर्वेक्षण तो फिलवक्त इसी लीक पर हैं, और इसी लिए सवालों के घेरे में भी हैं। दरअसल चुनावों से पहले सर्वेक्षणों का आना अब फैशन बन चुका है। पहले के दौर में राजनीतिक दल सर्वेक्षण करावाया करते थे, तो मकसद होता था जनता की नब्ज पकड़ना, मुद्दे पकड़ना और उम्मीदवार तय करना। ये सर्वे पूरी तरह गोपनीय होते थे। लेकिन अब तो एजेंसियां सर्वेक्षण करा रही हैं। पिछले कुछ समय से तो अखबार और समाचार चैनल भी इन सर्वेक्षणों में पार्टनर बन चुके हैं। चुनाव से पहले अखबारों और चैनलों में सर्वेक्षणों की होड़ मची हुई है। यूं तो कहानी हर जगह यही है, लेकिन उत्तराखण्ड में पिछले दिनों जिस तरह के चुनावी सर्वे सामने आ रहे हैं, उन्हें देख कर इन पर सवाल उठना लाजमी है। कोई भाजपा को 40 से 44 सीट दे रहा है तो कोई 32 से 38। कोई कांग्रेस को 25 पर सिमेट रहा है तो कोई 20 से ऊपर नहीं बढ़ा रहा। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर इन सर्वेक्षणों का मकसद क्या है? चुनाव से ठीक पहले इस तरीके के सर्वे क्यों कराए जाते हैं? मतदाता को इन सर्वे का क्या लाभ होता है? कहीं ये सर्वे प्रायोजित तो नहीं होते? जिस सुनियोजित तरीके से इन्हें प्रचारित, प्रसारित किया जाता है, उससे ये तो साफ है कि इनके पीछे कोई ‘मंशा’ जरूर है। यह अलग बात है कि इन सर्वेक्षणों से उनके आयोजकों प्रायोजकों के मकसद पूरे होते होंगे भी या नहीं.

इसी संदर्भ में वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार की इस बात में वाकई दम नजर आता है कि, ‘सर्वे का एक उद्देश्य तो नजर आता है कि इसके जरिए मुद्दों को गायब कर दिया जाता है, और चुनाव चकल्लस में बदल जाता है।’ वाकई मीडिया के इस सर्वेक्षण के खेल में कूदने के बाद चुनाव अपनी गंभीरता खोते जा रहे हैं। मतदाताओं का पूरा ध्यान सिर्फ इस पर रह गया है कि किसकी सरकार आ रही है, और कौन मुख्यमंत्री बन रहा है। जबकि देखा जाए तो मीडिया की भूमिका यह नहीं है। मीडिया की भूमिका, ‘कौन आ रहा’ बताना नहीं बल्कि ‘किसे और क्यों आना चाहिए’ इसके पक्ष में जनमत तैयार करना होना चाहिए। इस तरीके से सर्वेक्षणों से तो भ्रम का माहौल तैयार हो रहा है, ताकि मुद्दे हवा हो जाएं।

(सोशल मीडिया से साभार)

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