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अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी की पत्रकारों ने की निंदा

journalist condeman arnab arrest

रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की महाराष्ट्र पुलिस द्वारा की गयी गिरफ्तारी की पत्रकारों ने भर्त्सना की है. पत्रकारों ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता के लिहाज से खतरनाक माना है और अपनी असहमति जताई है. इसमें ऐसे भी पत्रकार हैं जो अर्नब की पत्रकारिता से असहमति रखते हैं. आइये जानते हैं किस पत्रकार ने क्या कहा –

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार

अर्नब की गिरफ़्तारी के तरीक़े का विरोध उन की पत्रकारिता का समर्थन नहीं है। दोनों में फ़र्क़ करने का विवेक हममें होना चाहिए। अर्नब ने गंभीर पत्रकारीय अपराध किए हैं। उन पर कार्रवाई प्रेस परिषद को करनी चाहिए। लेकिन महाराष्ट्र पुलिस का इस पूरे प्रकरण में व्यवहार शुद्ध बदला लेना ही है.

रजत शर्मा, प्रधान संपादक, इंडिया टीवी

I condemn the sudden arrest of Arnab Goswami in an abetment to suicide case. While I don’t agree with his style of studio trial, I also don’t approve of misuse of state power to harass a journalist. A media Editor cannot be treated in this manner

vir sanghvi @virsanghvi

No matter whether you agree with his journalism or not, all of us should condemn the way in which the police have arrested Arnab Goswami.

रुबिका लियाकत, न्यूज एंकर, एबीपी न्यूज

अर्नब से सहमत हो न हो इस बात पर हम सब को सहमत होना ज़रूरी है कि उनके साथ जो हो रहा है वो सरासर ग़लत है। असहमति के मायने अगर गिरफ़्तारी है तो आगे आपकी बारी है।

TV9 का आधिकारिक बयान

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को बदले की कार्यवाही बताता है। यह सीधा सीधा लोकतंत्र पर हमला है। TV9 ग्रुप के CEO @justbarundas , TV9 भारतवर्ष के न्यूज डायरेक्टर @hemantsharma360 और TV9 मराठी के एडिटर @umeshk73 ने #ArnabGoswami की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया.

सुमेरा, न्यूज एंकर, टीवी9

#ArnabGoswami की गिरफ़्तारी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है. #ArnabGoswami के साथ जो हुआ है वो कल किसी और के साथ होगा इसलिए इस मुद्दे पर खुल कर बोलिए।ये वक्त ये सोचने के लिए भी है कि ना जाने कितने दूर दराज़ के इलाक़ों में अलग अलग राज्यों में काम करने वाले पत्रकारों का ऐसा शोषण होता है लेकिन वो सुर्ख़ियाँ नहीं बन पाते ।

Prema Sridevi @premasridevi

I had worked wit #ArnabGoswami for 15 yrs, perhaps the only journalist to work wit him for so long. Wen it came to the way we do news, many times we hav been on opposite ends but im deeply hurt to see the way he was arrested, timing of his arrest, the vendetta being played out

Shobhaa De @DeShobhaa

No matter what you think of Arnab Goswami and his brand of “journalism”, police action against him is shocking in a democracy. Assault and intimidation by cops is not acceptable under any circumstances!
#ArnabGoswami

उमेश चतुर्वेदी Umesh Chaturvedi @uchaturvedi

National Union of Journalists (India) strongly condemns arrest of the #RepublicTVLive editor @TeamsArnab Goswami by Mumbai police. Clear cut vindictive action on behest of Maharashtra Government. Assault on Freedom of Press.

Manak Gupta @manakgupta

Arrest in a 2-3 year old case which had been closed by police itself…!! This is wrong. Plane and simple. Shows desperation #ArnabGoswami.

Navika Kumar @navikakumar

The coercive arrest of #ArnabGoswami is against the spirit of Press Freedom. A counter productive move in a Democracy. There’s one basic Tenet enshrined in our Constitution. Right to Freedom of Expression. Agree disagree but can’t compromise FoE.

Indian Digital Media Association @IndiaIDMA

Statement condemns state high-handedness used by the Maharashtra government displayed against Republic TV and Mr. Arnab Goswami. IDMA vows to fight

Anuranjan Jha

#अर्णबगोस्वामी को बिना पूर्व नोटिस, सुबह सुबह एक आतंकवादी की तरह गिरफ्तार किया जाना और घसीटकर ले जाया जाना फासिज्म का नमूना है। इस गिरफ्तारी पर वो सारे चुप हैं जो पिछले 6 साल से देश में इमरजेंसी का रोना रो रहे हैं। वो सब चुप रहेंगे क्यूं उनको #हूंबोहूंबो करने की आदत है। वो सब चुप रहेंगे जिनको #अर्णब की तरक्की पसंद नहीं है और वो सब भी चुप रहेंगे जिन्हें अगर #अर्णब कल बुलाकर अपने चैनल में नौकरी दे दें तो चुपचाप गुलगुले खा लें। ये चुप्पी खतरनाक है। सब आएँगे जद में। सरकारों को शर्म आनी चाहिए।

गिरीश पंकज

मैं मानता हूं कि आर भारत चैनल के अर्णब गोस्वामी की प्रस्तुति शालीन होनी चाहिए। बहुत अधिक उत्तेजित होकर घटनाओं के बारे में चर्चा करना गलत है। संयत स्वर में भी बात कही जा सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप एक व्यक्ति को पूरी तरह से नष्ट करने पर उतारू हो जाएं।

महाराष्ट्र में मीडिया के दमन करने का जो दृश्य आज मैंने टीवी पर देखा, वैसा दृश्य इस देश की परंपरा रही है । राज्य कोई भी हो, वहाँ सरकार किसी की भी हो, अगर उसके खिलाफ है कोई लिखेगा या बोलेगा तो उसका दमन स्वभाविक है। हमारे राजनेता लोकतंत्र की बात तो करते हैं लेकिन अभिव्यक्ति का गला घोटते रहते हैं। आप जल संकट पर बात कर सकते हैं। लोक कला की दशा और दिशा पर घंटों बहस कर सकते हैं। समाज के नैतिक पतन पर आंसू बहा सकते हैं,मगर सरकार के रवैये पर निरंतर प्रहार किया, तो तुम्हारी खैर नहीं । और वही हुआ आर भारत के अर्णव गोस्वामी के साथ ।

पुलिस ने दो साल साल पहले बंद पड़े एक मामले को पुनः खोलकर अर्णव को गिरफ्तार किया है। इसके पहले हीरोइन कंगना राणावत भी महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ मुखर थी, तो हमने देखा, उसके ऑफिस को तोड़ दिया गया। आश्चर्य की बात यह है कि एक मीडिया के दामन पर बाकी मीडिया बेहद खामोश है। एक घर को जलता हुआ देखकर दूसरा घर वाला खुश हो जाय, यह भारत देश में ही संभव है।

मैंने वर्षी तक सक्रिय पत्रकारिता में भागीदारी अदा की है। रायपुर में भी यह महसूस किया है कि एक मीडिया हाउस पर कोई संकट आता है तो दूसरा मीडिया हाउस मज़ा लेता है। और जब मज़ा लेने वाले पर संकट आता है तो दूसरा मीडिया हाउस आनन्दित होता है जबकि होना यह चाहिए कि ऐसे वक्त पर सभी को एक हो कर विरोध करें। हैरत केंद्र सरकार में बैठे मंत्रियों को देखकर हो रही है । उनके निंदा वाले बयान तो जरूर आ रहे हैं लेकिन उनमें इतना आत्मबल नहीं है कि वह राज्य सरकार को लताड़ सकें। केंद्रीय गृह मंत्री महाराष्ट्र के अत्याचारी डीजीपी परमबीर सिंह पर तो कार्रवाई कर ही सकते थे ।

अमर उजाला के पत्रकार राघवेंद्र नारायण मिश्रा का आकस्मिक निधन

journalist Raghavendra Narayan Mishra dies
journalist Raghavendra Narayan Mishra dies

अमर उजाला, लखनऊ के डिप्टी एडिटर राघवेंद्र नारायण मिश्रा की आज रात 8:00 बजे हृदय गति रुक जाने से अचानक मौत हो गई।

वे अपने पैतृक जिला देवघर (झारखंड) गए थे। वहीं अचानक वह बेहोश होकर गिर पड़े।

उन्हें तत्काल पास के अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

बड़ी त्रासदी यह कि परसों ही उनकी बड़ी बहन का निधन हो गया था।

राघवेंद्र जी मेरठ शिमला और जम्मू कश्मीर में भी रहे हैं।

उनके लघु भ्राता रामानुग्रह प्रसाद नारायण मिश्र दैनिक जागरण, रांची में वरिष्ठ पत्रकार हैं।

परमात्मा राघवेंद्र जी को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि।

अर्नब गोस्वामी गिरफ्तार, महाराष्ट्र पुलिस पर मारपीट का आरोप !

arnab goswami arrested

मुंबई| महाराष्ट्र पुलिस की रायगढ़ यूनिट ने बुधवार की सुबह रिपब्लिक टीवी के मालिक और मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी के घर पर छापा मारा और उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सचिन वैज ने कहा कि गोस्वामी को 2018 के आत्महत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला पहले बंद हो गया था, जिसे अब फिर से खोला गया है।

पुलिस टीम ने रिपब्लिक टीवी के प्रमुख को उनके घर में घुसकर गिरफ्तार किया। उनके परिवार ने इसका विरोध किया और उनके साथियों ने इसकी लाइव कवरेज करने की कोशिश की।

चैनल ने इसका जबरदस्त विरोध किया है कि “एक शीर्ष भारतीय न्यूज चैनल के संपादक को 20 से 30 पुलिसकर्मियों ने घर में घुसकर अपराधी की तरह बाल खींचकर उठाया, धमकाया और उन्हें पानी तक नहीं पीने दिया।”

पुलिस वैन से गोस्वामी ने कहा कि उनके साथ मारपीट की गई। उनके बेटे को पीटा गया और उनके ससुराल पक्ष के लोगों के साथ बदसलूकी की गई। उधर उनके सहयोगियों ने इस घटनाक्रम को प्रसारित करते हुए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों से न्याय की मांग की।

माना जा रहा है कि उन्हें रायगढ़ के अलीबाग ले जाया जाएगा। (एजेंसी)

क्या अंग्रेजी को शुद्ध रखने के लिए अखबारों को हिन्दी का उच्चारण बिगाड़ देना चाहिए?

hindi akhbar bhasha

आज अख़बार के जिस ख़बर की तसवीर मैं चस्पाँ कर रहा हूँ, उसके ज़रिये हिन्दीवालों का अपनी ही भाषा के प्रति अज्ञान और अँग्रेज़ी को श्रेष्ठ मानने की उनकी मानसिकता, दोनों की ही शिनाख़्त आप कर सकते हैं।

शीर्षक में एक शब्द है—लॉन्ग-कोविड। पूरी ख़बर में कई बार ‘लॉन्ग’ शब्द इस्तेमाल हुआ है। सोचिए कि लिपि की ध्वन्यात्मक विशिष्टता के स्तर पर देवनागरी के हिसाब से यह ‘लॉन्ग’ क्या है। इसी तरह से सॉन्ग, रॉन्ग वग़ैरह भी लोग लिखने लगे हैं।

‘महाजनो येन गतः स पन्थाः’ के अनुसार धीरे-धीरे आम लोग भी ऐसा ही लिखना शुरू कर देंगे। यह मूर्ख मीडिया के अज्ञान की विजय होगी। कई शब्द-प्रयोगों में मीडिया का सिखाया अनाप-शनाप सिर चढ़कर आजकल बोलने भी लगा है।

ख़बरों में अँग्रेज़ी के Long, Song, Wrong जैसे शब्दों के लिए लॉन्ग, सॉन्ग, रॉन्ग लिखने का जिसने भी आदेश जारी किया होगा, ज़ाहिर-सी बात है कि उसे देवनागरी लिपि की बुनियादी बातें पता नहीं रही होंगी और वह अँग्रेज़ी उच्चारण की शुद्धता बनाए रखने का ज़बरदस्त हिमायती भी रहा होगा। मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि भाषा अँग्रेज़ी हो या देशी-विदेशी दूसरी कोई और, अगर हम उसका कोई तत्सम शब्द प्रयोग में लाते हैं, तो बेहतर है कि उस शब्द का मूल उच्चारण भी अधिकतम शुद्ध रूप में बचाकर रखें, लेकिन सवाल यह है कि अन्य किसी भाषा का उच्चारण शुद्ध रखने के लिए क्या अपनी ही भाषा का उच्चारण बिगाड़ देना चाहिए?

दुनिया की किसी और भाषा में ऐसा नहीं हो रहा है, जैसा हिन्दी में हो रहा है। हमारी ही तरह अँग्रेज़ों के गुलाम रहे पाकिस्तानी तक ऐसा नहीं करते। विडम्बना तो यह है कि अगर हमारे जैसे कुछ लोग साफ़-सुथरी हिन्दी सीखने-सिखाने की बात करते हैं तो मानसिक गुलामों की एक पूरी फ़ौज है, जो एक सुर में गाने लगती है कि आप हिन्दी को कठिन बनाना चाहते हैं। मज़ा यह कि हिन्दी को साफ़-सुथरी और व्याकरणसम्मत बनाने के विरोधी ऐसे ही लोग अँग्रेज़ी को ज़रा भी बिगाड़ना पसन्द नहीं करते और बड़ी ज़िम्मेदारी से उसे साफ़-सुथरी, शुद्ध और व्याकरणसम्मत बनाए रखने की वकालत करते हैं।

अब सोचिए कि रोमन में लिखे Long को देवनागरी में क्या ‘लॉन्ग’ लिखा जाना चाहिए? रोमन में 26 अक्षरों से काम चलाया जाता है, तो क्या देवनागरी वर्णमाला में भी वर्णों की सङ्ख्या घटाकर 26 कर दी जाए? सच्चाई यही है कि रोमन बेहद कमज़ोर लिपि है। हमारी मानसिक गुलामी इसे महान् बनाती है। यह तकनीकी वर्चस्व का युग है। अँग्रेज़ीवालों का तकनीकी वर्चस्व हमारे ऊपर ज़्यादा है तो अँग्रेज़ी हमें महान् लगती है, पर किसी दिन हिन्दीवालों का तकनीकी वर्चस्व दुनिया पर बढ़ जाए तो हर कहीं हिन्दी महान् दिखाई देने लगेगी। बहरहाल, भाषा-विज्ञान के संसार के सारे अध्येता स्वीकार करते हैं कि देवनागरी में मानवीय अभिव्यक्ति की दृष्टि से ज़रूरी ध्वनियों के लिए सर्वाधिक समर्थ प्रतीक मौजूद हैं। बात बस इतनी है कि हम हिन्दीवाले क्या अँग्रेज़ियत की मानसिकता से बाहर निकलकर हिन्दी का गौरव महसूस कर पाएँगे या अँग्रेज़ी में जगह न बना पाने की विवशता में ही जैसे-तैसे हिन्दी की पूँछ पकड़कर घिसटते रहेंगे?

वास्तव में Long को ‘लॉन्ग’ के बजाय देवनागरी में लिखा जाना चाहिए ‘लॉङ्ग’। रोमन में ङ्, ञ्, ण् और न् के लिए सिर्फ़ एक प्रतीक N से काम चलाया जाता है, जबकि इन सभी ध्वनियों का देवनागरी में महीन विश्लेषण है और अलग-अलग वर्ण निर्धारित करने के ध्वनि-वैज्ञानिक कारण हैं। ये सभी ध्वनियाँ अल्पप्राण घोष हैं, पर ङ् कोमल तालव्य, ञ् तालव्य स्पर्श-घर्षी, ण् मूर्धन्य प्रतिवेष्ठित स्पर्श, तो न् दन्त्य-वर्त्स्य। रोमन में विकल्प नहीं तो सबका काम N से चलाना पड़ता है। हमारे पास जब सही उच्चारण को व्यक्त करने के लिए समाधान मौजूद है तो हम हर कहीं N = न् क्यों बनाएँ? याद रखने की बात है कि उच्चारण की दृष्टि से हमेशा N का मतलब न् नहीं होता। Long, Song, Wrong जैसे शब्दों में N का उच्चारण स्पष्ट रूप से अल्पप्राण घोष कोमल तालव्य स्पर्श वाला है, जिसको व्यक्त करने के लिए देवनागरी में ‘ङ्’ मौजूद है। यह बात ज़रूर है कि टाइपराइटर के चलन के बाद उसके सीमित कीबोर्ड में टाइप की सुविधा को देखते हुए ङ् के स्थान पर अनुस्वार की बिन्दी का ज़्यादा प्रयोग किया जाने लगा। बावजूद इसके यह एकदम विलुप्त नहीं हुआ और ‘वाङ्मय’ जैसे शब्दों में प्रयोग किया जाता रहा। वर्तमान में कम्प्यूटर की सुविधा ने टाइपिङ्ग को एकदम आसान बना दिया है, इसलिए अब फिर से नासिक्य ध्वनियों को सही रूपों में प्रचारित किए जाने की ज़रूरत है। संसार की सबसे महान् लिपि की वैज्ञानिकता की रक्षा इसी तरीक़े से हो सकती है। यह निहायत ग़लत है कि आप अँग्रेज़ी के अर्धविवृत स्वर ‘ऑ’ के सही उच्चारण को बचाने के लिए हिन्दी के कोमल तालव्य ‘ङ्’ को दन्त्य-वर्त्स्य स्पर्श ‘न्’ बनाकर बिगाड़ दें। यदि ‘ङ्’ आपके कीबोर्ड पर नहीं बनता या आप इसे पूरी तरह से बेदख़ल ही कर देना चाहते हैं, तो भी कम-से-कम एकदम से ग़लत चीज़ का प्रचार तो मत कीजिए। रोमन के Long, Song अथवा Wrong के लिए बेहतर है कि देवनागरी में ‘लांग’, ‘सांग’ अथवा ‘रांग’ लिखिए, लोग अँग्रेज़ी के हिसाब से समझ ही जाएँगे। अगर अँग्रेज़ी के ‘ऑ’ को बचाने के लिए हिन्दी के ‘ङ्’ और ‘न्’ को बिगाड़ने की ज़िद ठान रखी हो, तो बात दूसरी है।

यह भी समझने की बात है कि जब हमारे यहाँ नचिकेता, याज्ञवल्क्य के संवाद चल रहे थे तो पश्चिम में लोग भेड़-बकरियाँ चराया करते थे या लूटमार करके अपना पेट भरते थे। विकास की जो धारा पश्चिम में चली, भारत में उससे अलग थी। उन्होंने प्रकृति के शोषण को अपने जीवन का आधार बनाया, पर हमारे पुरखे प्रकृति के पोषण को जीवन-मूल्य बनाकर आगे बढ़े। उनके यहाँ जीवन खण्ड-खण्ड होकर चलता रहा है, पर हमारे यहाँ जीवन को समग्रता में देखने का पुरुषार्थ किया जाता रहा है। यह विशेषता भारतीय जीवन-दर्शन की अन्यान्य विधाओं में कहीं भी देखी जा सकती है। चिकित्सा, सङ्गीत, योग से लेकर पाक-कला तक में। भाषा के विकास में भी यही चीज़ मौजूद है। अँग्रेज़ों के कोड़े हमारे शरीर पर इतने पड़े हैं कि आँखें जैसे आज भी पथराई हुई हैं और हम अपनी भाषाओं में मौजूद समग्रता का यह तत्त्व आसानी से नहीं देख पा रहे हैं। सवाल बस इतना है कि जो उनकी मजबूरी है, क्या उसे हमें अपनी भी मजबूरी बना लेनी चाहिए?

( संत समीर के सोशल मीडिया वॉल से साभार )

कौन बनेगा करोड़पति के एक सवाल पर अमिताभ बच्चन के खिलाफ एफआईआर

amitabh ke khilaf fir
amitabh ke khilaf fir

सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और उनके लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के निर्माताओं के खिलाफ हिंदू भावनाओं को आहत करने के आरोप में एक एफआईआर दर्ज की गई है।

बच्चन ने करमवीर ऐपिसोड में मनुस्मृति से संबंधित प्रश्न पूछा था। इस ऐपिसोड में सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन और अभिनेता अनूप सोनी मेहमान के तौर पर शामिल हुए थे।

इसमें 6.4 लाख रुपये के लिए प्रश्न पूछा गया था, “25 दिसंबर 1927 को डॉ.बी.आर.अंबेडकर और उनके अनुयायियों ने किस धर्मग्रंथ की प्रतियां जलाईं थीं?

इसके विकल्प – (ए) विष्णु पुराण, (बी) भगवद गीता, (सी) ऋगदेव, और (डी) मनुस्मृति थे।” इस सवाल का जवाब मनुस्मृति था।

जवाब के बारे में विस्तार से बताते हुए अमिताभ बच्चन ने कहा, “1927 में अंबेडकर ने प्राचीन हिंदू ग्रंथ मनुस्मृति की निंदा की और इसके एक पॉइंट को जाति व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए इसकी प्रतियां भी जलाईं।”

सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को यह ठीक नहीं लगा और शो का बायकॉट करने की मांग उठने लगी।

हिंदू कार्यकर्ताओं ने निमार्ताओं पर ‘वामपंथी प्रचार’ करने का आरोप लगाया है, वहीं अन्य लोगों ने इसे ‘हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ के लिए दोषी ठहराया।

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