किसी ने सच ही कहा है कि कोई उपर न होता-कोई नीचे न होता, अगर कोई मजबूर न होता तो कोई खुदा न होता। कल जनवरी माह का अंतिम दिन मेरे लिये आत्मग्लानि का दिन रहा। हालांकि मेरा हरसंभव प्रयास होता है हरेक चीजों से प्रेरणा लेने की। कल भले ही मेरी आत्मा पर चोट लगी हो, विश्वास चूर-चूर हुआ हो..एक नई दिशा अवश्य दे गई है।
वेशक अब लोग प्रोफेशनल हो गये हैं। इस प्रोफेशनल युग में आपको विश्वास ढूंढना बहुत मुश्किल है। आंखों के सामने साथ खड़ा या खड़ा होने के दावा करने वाला व्यक्ति कब फरेब कर जाता है, पता नहीं चलता है। जब पता चलता है ,तब समय आगे सरक जाता है और मुझ जैसा निरा मूर्ख काठ के उल्लू बने रहने के अलावे कुछ नहीं कर सकता।







