मीडिया के कांव-कांव अौर झांव-झांव के शोरगुल में असली सवाल गुम

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रमेश यादव

कहाँ-कहाँ मनाइएगा डिग्री अौर योग्यता का मातम !

रमेश यादव
रमेश यादव
मानव संसाधन विकास मंत्री की शैक्षिक योग्यता पर उठ रहे सवालों के आइने में आइए भारतीय समाज का चेहरा देखते हैं ।

किसी भी मसले पर विरोध के कई तरीक़े हो सकते हैं। पार्टीगत प्रतिबद्धता के आधार पर विरोध । विचारधारा के आधार पर विरोध । जनविरोधी नीतियों के आधार पर विरोध । अक्षमता, असफलता,अनिर्णय अौर
अयोग्यता के आधार पर विरोध । पसंद-नापसंद के आधार पर विरोध । इसके अलावा विरोध के आैर भी कारण हो सकते हैं,मसलन जाति,वर्ग,धर्म,क्षेत्र,लिंग आदि-इत्यादि ।

किसी भी वस्तु-स्थिति के विश्लेषण के लिए दिल,दिमाग़,दृष्टि अौर दृष्टिकोण का निरपेक्ष होना लाज़िमी है,लेकिन भारत में ‘कौवा कान लेकर भागा’ का शोर मचाने की मानसिकता से बहुतेरे लोग पीड़ित दिखाई देते हैं । यहाँ का Evaluation Methodology ( मूल्याँकन प्रक्रिया) कुछ एेसा है कि जिसे आप पसंद कीजिए, उसे हीरो बना दीजिए,जिसे नापसंद कीजिए,उसे ज़ीरो बना दीजिए ।

भारतीय मीडिया के मंच पर साधारण से साधारण अौर गम्भीर से गम्भीर मसलों पर कांव-कांव अौर झांव-झांव के शोरगुल में असली सवाल गुम हो जाते हैं । यहीं कारण है कि आमतौर पर कोई परिणाम नहीं निकलता अौर मामला ‘वहीं ढाक के तीन पात’ साबित होता है ।

इस तरह के मामले में मीडिया प्रत्यक्ष रूप से अभियान चलाकर,अप्रत्यक्ष रूप से किसको लाभ / फ़ायदा पहुँचाना चाहता है। इस अभियान में कारपोरेट का कितना हित अौर हिस्सेदारी छुपा होता है,आम लोग सूक्ष्म रूप से इसका मूल्याँकन नहीं कर पाते हैं । यह एक पुरानी परिपाटी रही है जो अब भी जारी है ।

एक बार एक राजा अपने बेटे को दी गयी शिक्षा में भेद-भाव के मामले को लेकर गुरू से शिकायत की । गुरू ने राजा के सामने ही उसके बेटे अौर ‘रंक’ के बेटे से पूछा कि हमारे बंद मुठठी में गोल आकार की एक वस्तु है,जिसके बीच में छेद है,क्या हो सकती है ? राजा के बेटे ने कहा चक्की ( हम लोग इसे गाँव में चकरी कहते हुए सुने हैं,इसमें दाल दरा जाता था अौर गेहूँ पीसा जाता था) । फिर रंक के बेटे से पूछा,तुम बताअो ! उसने कहा,आपकी मुठ्ठी में गोल आकार की जो वस्तु है,वह अंगुठी हो सकती है ।

गुरू ने राजा से कहा राजन् ! हमने शिक्षा देने में कोई भेद-भाव नहीं की । दोनों को समान शिक्षा दी। हमने दोनों से एक ही सवाल किया,लेकिन दोनों ने अपने-अपने विवेक से उत्तर दिया । हाथ में चक्की कैसे समा सकती है । ज़ाहिर है,अंगुठी अौर चक्की के आकार में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है ।

ज्ञान सिर्फ़ पढ़े-लिखों के पास ही होता है,अनपढ़ निरा गँवार होते हैं । इसका कोई वैज्ञानिक पैमाना नहीं है । कई मामलों में ज्ञान अौर विवेक को किसी डिग्री के तराज़ू पर तौलना प्राकृतिक न्याय के ख़िलाफ़ चला जाता है । आज भी समाज में बिखरे ज्ञान अौर किताबों में दर्ज ज्ञान के बीच कोई संतुलन अौर सामंजस्य नहीं है ।

किसी एक की योग्यता पर यदि लक्ष्य किया जा रहा है,इसका मतलब है कि बाक़ियों को,जिनकी योग्यता अौर दाग-धब्बे पर गम्भीर विमर्श होना चाहिए था,उन्हें जानबूझकर छुपाया जा रहा है या उसकी अनदेखी की जा रही है ।

जिस देश में पूरी आबादी की 75/80 फ़ीसदी जनता कृषि से जुड़ी हो वहाँ के कृषि मंत्री की योग्यता क्या होनी चाहिए ? ज़ाहिर है, कृषि मंत्री का पद उसे मिलना चाहिए जो हल चलाना जानता हो,फ़सल बोना-काटना जानता हो । सिंचाई अौर फ़सलों की देखरेख की जानकारी रखता हो । पैर के अंगूठे को खेत में धँसा कर उसकी अोदी / नमी परख कर लेता हो । ज़ाहिर है,एेसे लोगों को बनना चाहिए,लेकिन कृषि मंत्री कौन बनता है ? कृषि से संबंधित योजना कौन बनाता है ? उसे लागू कौन कराता है ? यह एक जलता हुआ हक़ीक़त है,जिस पर विमर्श नहीं होता ।

सवाल उठता है,शैक्षिक योग्यता सिर्फ़ एक के लिए क्यों ? सभी के लिए क्यों नहीं ? वैसे तो ग्राम प्रधान, बीडीसी,क्षेत्र पंचायत सदस्य,ज़िला पंचायत सदस्य,विधायक,विधान परिषद सदस्य,लोक सभा सदस्य,राज्य सभा सदस्य,केन्द्रीय मंत्रि,राज्य मंत्री,लोक सभा स्पीकर,प्रधानमंत्री,राज्यपाल,उपराष्ट्रपति अौर राष्ट्रपति सभी के लिए शैक्षिक योग्यता होनी चाहिए साथ में अनुभव भी,खाना पूर्ति का नहीं असली,लेकिन हक़ीक़त में क्या है ?

ज़रा सोचिए !
जिस दिन शैक्षिक योग्यता की अनिवार्य हो जायेगी,उस दिन देश का क्या हाल होगा ? फिर तो इस योग्यता में परसेंटेज भी जोड़ा जायेगा ? मूल्याँकन करने वाले कौन लोग होंगे ? किस जमात के लोग होंगे ? किस आधार पर मूल्याँकन करेंगे ? इसमें क्षेत्रवाद,जातिवाद,भाई-भतीजावाद अौर धर्मवाद की क्या भूमिका होगी ? अंदाजा लगाइए । यदि एेसे हुआ तो फिर वह समाज कैसा बनेगा ? जो लोकतंत्र है,चाहे जैसा भी है,कैसा होगा ? फिर से शीशा पिघलाकर कान में डालने की परम्परा शुरू होगी ? अंगुठाकाट द्रोणाचार्य पैदा होंगे !

सवाल तो यह भी उठना चाहिए था कि 16 वीं लोकसभा के सभी सदस्यों की शैक्षिक योग्यता क्या है ? इसमें कितने हैं,जो अपराधी अौर दाग़ी हैं ? कितने साम्प्रदायिक हैं ? कितने पूँजीपति हैं ? उनके पास पूँजी कहाँ से आयी ? उसका स्रोत क्या रहा ? जो मंत्री बने,उनके योग्यता का आधार क्या रहा ?, लेकिन इस मसले पर मीडिया में बहस वर्जित है । क्यों ? सर्वविदित है ।

अच्छा ये बताइए !
पढ़ने-लिखने का क्या मानक होना चाहिए, क्या यह व्यवस्था देश में एक समान है ? अनपढ़,12 वीं पास
अौर ‘डी लिट’ डिग्रीधारी के सोच,विचार अौर चिंतन में फ़र्क़ का मानक क्या होना चाहिए है ? कबीर को किस श्रेणी में रखा जायेगा ? जो कबीर को पढ़कर,उनपर लिखकर बड़े-अोहदे हासिल किये । पुरस्कार झटके,लेकिन कबीर नहीं हुए,बल्कि तुलसी के अनुयायी हो गये,उनके बारे में क्या लिखा/ कहा जायेगा ?

उच्च डिग्रीधारी लोग,जो मानव संसाधन मंत्रालय को इसके पहले चलाये,वो उच्च शिक्षण संस्थानों को किस ‘जन्नत’ (?) में पहुँचाये ? दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में भारत का नाम कहीं नहीं है ? इसके लिए देश का अनपढ़ ज़िम्मेवार है या गँवार ? या फिर उच्च डिग्रीधारी ? या फिर सम्पूर्ण व्यवस्था ?

उच्च शिक्षा को बनियों / व्यापारियों अौर बाज़ार के हवाले करने या फिर में गिरवी रखने का फ़ैसला जनमत संग्रह से हुआ था ? जो यह क़दम उठाये,उनकी डिग्री क्या थी ? शिक्षा का बाज़ारीकरण करके,आर्थिक रूप से कमज़ोर जमात के बेटे-बेटियों को उच्च शिक्षा से वंचित करने या रखने की साज़िश,जिन्होंने की उनकी शैक्षिक डिग्री / योग्यता क्या रही थी ?

उच्च शिक्षा में भाई-भतीजावाद / जातिवाद / क्षेत्रवाद / पैरवी अौर घूसवाद का बीजारोपड़ कैसे हुआ ? इसकी नर्सरी कौन लगाया ? किस डिग्रीधारी के कार्यकाल में इसका बीजारोपड़ हुआ ? किसके समय में कम अौर किसके समय में अधिक हुआ ?

देशी शिक्षण संस्थानों को बर्बाद कर,विदेशी शिक्षण संस्थानों के लिए द्वार खोलने वालों की योग्यता क्या रही थी ? जिसकी जैसी आर्थिक हैसियत,उसको वैसी शिक्षा की संस्कृति के विकास में किस डिग्रीधारी का हाथ रहा ?

पूर्ववर्ती सरकारों ने उच्च शिक्षा की बेहतरी के लिए जो कमीशन बने,उसमें शामिल लोग कौन थे ? सभी के लिए सर्वसुलभ शिक्षा के लिए उन्होंने क्या सुझाव दिये ? उन सुझावों को अमल में लाने वाले या रद्दी की टोकरी में डालने वालों की शैक्षिक योग्यता क्या रही थी ?

लोक सभा में कुल 543 के क़रीब सीट है,उसके अनुपात में मुल्क की पूरी आबादी सवा करोड़ है । इसमें से 50 फ़ीसदी युवा हैं,जिसे शिक्षा भी चाहिए अौर रोज़गार भी चाहिए, । हमारी शिक्षा कैसी हो,इसको लेकर कौन लोग मौन रहे ? इसके लिए लड़ने वाले कौन लोग रहे ? मोटी तनख़्वाह उठाने अौर हर जगह ख़ुद बने रहने की गणित / षड्यंत्र में लिप्त लोगों की शैक्षिक योग्यता / डिग्री क्या होगी ?

सिर्फ़ बकइती से काम नहीं चलता है । ज़मीनी हक़ीक़त का मूल्याँकन करना चाहिए । इतना जल्दी देश की शिक्षा व्यवस्था में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होने जा रहा है अौर न ही इसे कोई 12 वीं पास करने जा रहा है । यह ज़िम्मेवारी सिर्फ़ सरकार के खाते में शामिल नहीं है,जो लोग इस पेशे से जुड़े हैं,उनकी भी समान ज़िम्मेवारी है ? शिक्षा में व्यापक परिवर्तन के रास्ते को छोड़कर,पद,पैसा अौर प्रतिष्ठा के आगे रेंगने वाले कौन लोग रहे हैं ? उनकी योग्यता / डिग्री क्या रही है ?

इस सरकार में भी विभिन्न पदों पर आसीन होने के लिए सिर झुकाये पंक्ति में खड़े लोग कौन हैं ? उनकी शैक्षिक योग्यता क्या है ? कहाँ से डिग्री /डिप्लोमा लिए हैं ? इन चेहरों को पहचानिए ? शायद हमारे आसपास के ही हों ।
अौर
हाँ !
उनके घुटने को जरूर देखिएगा,वहाँ के दाग पक्के होते हैं !

आप बदलिए,सब कुछ बदल जायेगा ।

@ आत्मबोध | 28| 05|2014

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