हम उनके मरने नहीं देते, वह हमारे जीने नहीं देते- सरबजीत सिंह पर विशेष

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संजीव चौहान

संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी करामत राही के साथ.....राही के मुताबिक उन्होंने जेल में सरबजीत का लंगर भी बनाया था..करामत राही 18 साल बाद पाकिस्तान से छूट कर भारत लौटे हैं
संजीव चौहान पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ बंद रहे भारतीय क़ैदी करामत राही के साथ…..राही के मुताबिक उन्होंने जेल में सरबजीत का लंगर भी बनाया था..करामत राही 18 साल बाद पाकिस्तान से छूट कर भारत लौटे हैं
पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में उम्रक़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह पर हमला साजिश का नतीजा हो सकता है। यह मत मेरा नहीं है। कहने का मतलब यह, कि इस मत में मेरी ‘हां’ या ‘न’ कोई मायने नहीं रखती है। यह सोच उन तमाम भारतीय क़ैदियों की है, जो अपनी आधी से ज्यादा ज़िंदगी पाकिस्तानी जेलों में गुजारकर लौटे हैं। ऐसे तमाम क़ैदियों से रुबरु होने का मौका कई बार मुझे भी मिला। ऐसे क़ैदियों की फेहरिस्त यूं तो लंबी है। इनमें कुछ क़ैदी मुझे आज भी याद हैं। अक्सर इनसे आज भी मुलाकात और बात होती रहती है। मसलन करामत राही, गोपाल दास, महेंद्र सिंह, सरदार बलवीर सिंह आदि-आदि। पाकिस्तान के पूर्व सजायाफ्ता क़ैदी सरदार बलवीर सिंह से मैं सन् 2012 के मध्य में अमृतसर में उनके घर पर मिला था। एक खास इंटरव्यू के सिलसिले में। बलवीर से इससे पहले भी यूं तो कई बार मैं पंजाब जाकर मिल चुका था। सन् 2012 के मध्य की बलवीर से मेरी भेंट, आखिरी मुलाकात साबित हुई। 2012 में जब मैं बलवीर से मिला, तो उन्होंने बताया, कि पाकिस्तान में गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान, उन्हें जो यातनाएं दी गयीं, उसी के चलते उन्हें फेफड़ों की बीमारी हो गयी है। इस मुलाकात के दो-तीन महीने बाद ही एक दिन पता चला, कि बलवीर सिंह की मौत हो गयी है। बलवीर सिंह ने बताया था, कि पाकिस्तान में पूछताछ के दौरान उन्हें बर्फ की सिल्लियों में दबा दिया जाता था। नंगे बदन पर चमड़े के गीले पट्टे से पीटा जाता था। बदन से खून रिसने लगता था। बकौल बलवीर- ‘जिस अंधेरी कोठरी में मैं बंद था। पांच दिन से पानी की बूंद नहीं दी गयी थी। प्यास से हलक सूख गया था। इसके बाद भी और ज्यादा परेशान करने के लिए पूछताछ कर रहे पाकिस्तानी अफसरों के इशारे पर उनके मातहतों ने अंधेरी-बदबूदार संकरी कोठरी में सांप के छोटे-छोटे बच्चे छोड़ दिये थे।’

करामत राही की कहानी इससे भी ज्यादा रुह कंपा देने वाली है। करामत राही मूलत: पाकिस्तानी हैं। बाद में उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल कर ली। भारत की नागरिकता हासिल करने के बाद करामत राही बटाला, गुरदासपुर (पंजाब) के फतेहगढ़ चूड़ियांवालां इलाके में रहने लगे। राही पाकिस्तान की कई जेलों में सज़ायाफ्ता के रुप में क़ैद रहे हैं। बकौल राही –‘पाकिस्तान में गिरफ्तारी से पहले कई बार वह सरबजीत सिंह से मिलते रहे हैं। अक्सर सरबजीत उनके गांव आ जाता था मिलने। पाकिस्तान में सज़ा होने के बाद मैं करीब चार साल तक (सन् 2001 से 2004 या 2005 रिहाई के समय तक) कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के साथ क़ैद रहा । सरबजीत वार्ड में (तन्हाई) और मैं बैरक में बंद था।’ अब सरबजीत पर उसी कोट लखपत जेल में क़ैद रहते हुए जब हमले की खबर सुनी, तो करामत राही को एक बाकया याद आता है।

पाकिस्तानी जेलों में बिताई ज़िंदगी के पन्ने पलटते हुए करामत राही बताते हैं – ‘चार साल के लिए जब पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में मुझे लाकर बंद किया गया, उस समय वहां तन्हाई में सरबजीत सिंह भी बंद था। तब उस जेल का आईजी था अब्दुल सत्तार आजज। आजज ईमानदार और तेज-तरार्र जेल अफसर था। जाड़े के दिन थे। सुबह करीब दस-ग्यारह बजे कुछ लोग बाहर से जेल में क़ैदियों को कंबल बांटने आये थे। सभी क़ैदियों को कंबल लेने के लिए जेल की बैरक-वार्डों से बाहर निकाला गया। मेरे पांवों में बेड़ियां और हाथों में हथकड़ियां लगीं थीं। बेड़ी-हथकड़ी में जकड़े सरबजीत सिंह को जैसे ही मैंने सामने देखा, उससे हाथ मिलाने लगा। उसी समय सरबजीत और मुझ पर आईजी जेल आजज की नज़र पड़ गयी। आईजी आजज ने मातहतों को हुक्म दिया, कि वे तुरंत सरबजीत सिंह को उसके वार्ड (तन्हा काल-कोठरी) में ले जाकर बंद कर दें। साथ ही सरबजीत का कंबल उसके वार्ड में ही पहुंचा दें।’ सरबजीत पर हमले के पीछे करामत राही किसी पाकिस्तानी तनजीम का हाथ मानते हैं। लंबे समय तक कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह के लिए ‘लंगर’ (खाना) पका चुके करामत राही के मुताबिक, पाकिस्तानी जेलों में क़ैद भारतीय क़ैदियों को खतरा आम या आपराधिक छवि वाले पाकिस्तानी क़ैदियों से खतरा नहीं रहता है। पाकिस्तान की जेलों में क़ैद तनजीमों के नुमाईंदों (शुभचिंतकों) से भारतीय क़ैदियों को ज्यादा खतरा रहता है। पाकिस्तानी जेलों के अंदर बंद तनजीमी क़ैदी और बाहर मौजूद उनके कट्टरपंथी आका हमेशा भारतीय क़ैदियों की तलाश में रहते हैं। करीब 18 साल पाकिस्तान की जेलों में सज़ा काटकर लौटे करामत राही इस बात से इंकार नहीं करते हैं, कि कोट लखपत जेल में बंद फांसी की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत भी ऐसी की किसी तन्जीम के आकाओं की साजिश का शिकार बन गया हो।

भारत के प्रधानमंत्री और भारतीय सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान की जेल से करीब 28 साल बाद छूटे गोपाल दास भी करामत राही की बात का समर्थन करते हैं। बकौल गोपाल दास- ‘भारत की जेलों में बंद किसी पाकिस्तानी पर अमूमन तो मैंने कभी हमले की खबर सुनी ही नहीं है। कभी अगर कोई ऐसी घटना घट भी जाती है, तो भारत सरकार तुरंत पाकिस्तान प्रशासन, भारत में पाकिस्तानी दूतावास को इसकी सूचना देता है। जबकि पाकिस्तान की जेलों में भारतीय क़ैदियों के साथ मारपीट, जानलेवा हमलों की वारदातें अक्सर होती रहती हैं। इन वारदातों की पहले तो पाकिस्तान सरकार सूचना देने से ही कतराती है। अगर किसी घटना की जानकारी बाहर आ भी जाये, तो पाकिस्तान में मौजूद भारतीय दूतावास के अफसरान पाकिस्तानी जेलों में घुसने की हिम्मत ही नहीं करते हैं। आखिर ऐसा क्यों ?’

पाकिस्तान में उम्र क़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह के साथ कोट लखपत जेल में गोपाल दास भी कई साल बंद रह चुके हैं। गोपाल दास के मुताबिक –‘मुझे लग रहा था, कि भारत में अफजल गुरु और कसाब की फांसी कहीं न कहीं पाकिस्तान में बंद सरबजीत सिंह पर नाजायज असर डालेगी। वही हुआ। संभव है कि पाकिस्तान में मौजूद अपने कट्टरपंथी आकाओं को खुश करने के लिए ही जेल में बंद कट्टरपंथियों ने सरबजीत को निशाना बना दिया हो। पाकिस्तान में सरकारें नहीं, सरकारों पर तनजीमें हावी रहती हैं। कोई बड़ी बात नहीं है कि, किसी तनजीम ने देश की जनता की नज़रों में खुद को ऊंचा दिखाने के लिए सरबजीत को निशाना बना दिया हो, और पाकिस्तानी हुकूमत सोती रही हो।’ सन् 1984 से 2011 तक पाकिस्तान की मुलतान, मियांवाली, सियालकोट सहित कोट लखपत जेल में क़ैद रहने वाले गोपाल दास के मुताबिक- ‘कोट लखपत जेल में मैं करीब तीन साल बंद रहा। उस समय सरबजीत सिंह भी वहां क़ैद थे। इस तीन साल के लंबे अरसे में मेरी सरबजीत से ब-मुश्किल 4-5 मिनट की ही मुलाकात हो सकी थी। मतलब यह कि इतना कड़ा पहरा था, कि जेल में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।’ गोपाल दास सवाल करते हैं कि- ‘इतने चाक-चौबंद इंतजामों के बीच सरबजीत पर हमला सोची-समझी साजिश नहीं तो और क्या है?’ गोपाल दास तो ये भी कहते हैं कि- ‘कोई बड़ी बात नहीं कि, किसी मजहबी तनजीम के दबाब में आकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआई ने ही कट्टरपंथी आकाओं और उनके नुमाईंदों को कहीं छूट न दे दी हो, और उन्होंने मौका हाथ से खाली नहीं जाने दिया।’ गोपाल दास के मुताबिक- ‘ बिना सोची-समझी रणनीति के पाकिस्तानी जेलों में सरबजीत सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उम्र-क़ैद की सज़ा पाये क़ैदी पर इस तरह और इतना खतरनाक हमला संभव ही नहीं है।’

जो भी हो, पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद उम्र क़ैद की सज़ा पाये भारतीय क़ैदी पर सरबजीत सिंह पर जैसा हमला हुआ, वैसा हमला मैंने हाल-फिलहाल या फिर पिछले कम से कम दो दशक के अपने पत्रकारिता के करियर में भारत में किसी पाकिस्तानी क़ैदी के ऊपर कभी न सुना न देखा। ऐसा नहीं है, कि भारत की जेलों में कुछ गलत नहीं होता है। ऐसा भी नहीं है, कि भारत की जेलों में दंगा-फसाद, मारपीट, जानलेवा हमले या फिर हत्या की घटनाएं ही नहीं होती हैं। भारत की जेलों में गाहे-बगाहे यह सब होता है, लेकिन सरबजीत सिंह की जैसी दुर्गति पाकिस्तान की हाई-सिक्योरिटी वाली कोट लखपत जेल में हुई है, कभी किसी पाकिस्तानी क़ैदी की इतनी दुर्गति किसी भारतीय जेल में मैंने न देखी न सुनी। विदेशी क़ैदियों की सुरक्षा और उनके आंकड़ों की बात की जाये, तो दिल्ली में स्थित तिहाड़ जेल में इस वक्त करीब 4 सौ विदेशी क़ैदी बंद हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या 100 के आसपास नाइजीरियाई क़ैदियों की है। इन चार सौ क़ैदियों में करीब 50 क़ैदी पाकिस्तानी हैं। इन पचास पाकिस्तानी क़ैदियों में लाल किले पर हमले का मुख्य षडयंत्रकारी लश्कर-ए-तैय्यबा का आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक अहमद भी बंद है। आरिफ को भारतीय सुप्रीम कोर्ट फांसी की सज़ा सुना चुका है। आरिफ करीब 13 साल से तिहाड़ जेल में बंद है, लेकिन आज तक जेल में आरिफ के ऊपर कभी किसी ने हमला नहीं किया। आरिफ ही क्यों मुंबई की जेल में कई साल तक बंद कसाब पर भी कभी किसी ने ऐसा कोई हमला करने की जुर्रत नहीं की, जैसा कि पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह पर जानलेवा हमला हुआ।

कुल जमा अगर पाकिस्तान और भारत की जेलों में बंद एक-दूसरे देश के क़ैदियों की सुरक्षा के मुद्दे पर नज़र डाली जाये, तो निचोड़ यही निकलता है, कि हम अपनी जेलों में बंद पाकिस्तानियों को मरने नहीं देते हैं। उनकी हिफाजत ही करते रहते हैं। कसाब जैसे पाकिस्तानी कसाईयों की सुरक्षा पर करोड़ों रुपया खर्च करते हैं, जबकि पाकिस्तान की जेलों में भारतीय क़ैदियों को जीने नहीं देते हैं। अगर यह कहा और समझा जाये, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, भारत की जेलों में आखिरी समय तक सुरक्षित रहा मुंबई हमलों का एकमात्र जिंदा पकड़ा गया कसाब और तिहाड़ में कई साल से बंद लालकिले पर हमले का मास्टरमाइंड पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अशफाक। जबकि पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद भारतीय क़ैदी सरबजीत सिंह को पाकिस्तानी हुकूमत सलाखों और सात तालों में भी सलामत नहीं रख सकी। आखिर क्यों? वह (पाकिस्तान) हमारे (भारत )क़ैदियों को जीने नहीं देते, हम (भारत) उनके (पाकिस्तान) क़ैदियों को मरने नहीं देते?

1 COMMENT

  1. Saty Ujagar Karne Ke Aapke Jazbe Ko Salaam Karta Hun.
    Bhai Sahab Sanjeev Chauhan Ji..
    Bahut Hi Mahatvpurn Khabar.

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