अब ‘दूरदर्शन’ भी नही बच सका यौन-शोषण की आँच से…

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विशाल शुक्ला,दैनिक जागरण

संदर्भ- दूरदर्शन के अधिकारी पर सेक्सुअल हरासमेंट का आरोप,मेनस्ट्रीम मीडिया खामोश

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विशाल शुक्ला
विशाल शुक्ला

‘सच’ सामने लाने और आम आदमी के प्रतिनिधि होने के मीडिया के स्वंयभू दावे की पोल तो काफी पहले ही खुल चुकी थी। जिसमें पेड न्यूज से लेकर चिट-फंड और नेताओं और लालाओं के काले-धन को खपाकर कई चौथे खंभों को खड़ा किया जाना शामिल रहा। लेकिन बीते कुछ समय में जिन ‘कुछ किस्सों’ ने चौथे खंभे को और बदनाम किया, वो था-इस क्षेत्र में महिलाओ का बढ़ता शोषण।

इस क्षेत्र मे जबसे न्यूज(ड) चैनलों की बाढ़ आई है, इस क्षेत्र में युवाओं की दिलचस्पी बढ़ी  है, सुबह से लेकर शाम तक –फटाफट से लेकर प्राइम-टाइम तक हम सूट-बूट पहने और ‘स्मार्ट’ एंकर्स’ और ‘रिपोटर्स’ को देखते हैं तो बरबस ही उनकी और खिंचे चले जाते हैं, और ऐसी ही किसी शाम को हो जाता है फैसला हमारे ‘पत्रकार’ बनने का, और हम उतर पड़ते हैं मीडिया की इस स्वपनिल दुनिया में अपना एक मकाम बनाने।

वास्तव में यह एक कड़वी सच्चाई है कि मीडिया में लड़कियों की स्थिति बहुत अच्छी नही है, यह बात किसी से छिपी नही है-तहलका का तरुण-तेजपाल मामला हो, या इंडिया टीवी की एंकर रही तनु शर्मा मामला (यह तो बेहद गंभीर मामला रहा, क्योंकि इस मामले में तनु द्वारा चैनल-प्रबंध तंत्र पर रसूखदार लोगों के पास जाने का दबाव बनाए जाने की बात भी कही गई थी)।

ऐसा नही है कि प्रिंट मीडिया में हालात बहुत अच्छे हैं, हिन्दी वाले जिस अंग्रेजी मीडिया के ‘आदर्शवाद’ की दुहाई देते नही थकते, उसी के एक हिस्से ‘द स्टेटसमैन’ की एक सीनियर रिपोर्टर रहीं डा. रीना मुखर्जी ने अखबार के ही तत्कालीन न्यूज कोआर्डिनेटर ईशान जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाद इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराए जाने के बजाय उन्हीं को 12 अक्टूबर 2002 को नौकरी से निकाल दिया गया था, इसके बाद उपरोक्त महिला पत्रकार ने नेटवर्क ऑफ वीमेन इन मीडिया इन इंडिया (NWMI) से संपर्क साधा और श्रम एवं महिला आयुक्त से मिलते हुए यह मामला इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में भी गया, जहाँ से शुरु न्याय की लड़ाई में डा. रीना को दशक भर के लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिली औऱ 6 फरवरी 2013 को द स्टेटसमैन प्रंबधन के विरुद्ध चल रही उनकी लंबी लड़ाई अपनी मंजिल तक पहुँची।

असल में हम इस मामले में सोशल मीडिया के ‘फेसबुक’ जैसे माध्यमों को साधुवाद दे सकते हैं, और सोचकर भी हैरानी होती है कि अगर ये ‘जनवादी’ माध्यम न होते (जनवादी –इसलिए, क्योंकि कालांतर में जनवादी माध्यम कहे जाने वाले अधिकांश मुख्य धारा के पत्रकारिय माध्यम अपनी प्रासांगिकता खो चुके हैं), तो शायद ही हम इन मामलों तक पहुँच पाते, क्योंकि कभी शोषित और पीड़ित तबके की आवाज रही ‘पत्रकारिता” की जबसे ‘मीडिया’ में परिणिति हुई है तबसे सारे मीडिया संस्थान-तनु शर्मा जैसे मामलों पर चुप्पी साध लेते हैं, एसे में विशाखा गाइडलाइंस के आने के बाद भी दूरदर्शन की एक महिला पत्रकार द्वारा एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत सहकर्मी पर यौन शोषण का आरोप लगाया जाना और उस पर दूरदर्शन के सर्वोच्च पद (डीजी-डीडी) पर एक महिला के आसीन होते हुए भी उसके द्वारा पीड़ित के आरोपो पर कार्यवाही न किया जाना, एक खतरनाक कदम की ओर संकेत करता है।

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