जानिए एबीपी न्यूज के क्राइम शो ‘सनसनी’ को बीस लाख में कैसे हुई थी खरीदने की कोशिश?

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सनसनी के दस् साल पूरे
सनसनी के दस् साल पूरे




सनसनी के दस् साल पूरे
सनसनी के दस् साल पूरे

सनसनी के दस साल पूरे हो चुके हैं. दस सालों में चैनल का मालिकाना हक और नाम तक बदल गया(स्टार न्यूज़ से एबीपी न्यूज़). लेकिन कार्यक्रम ‘सनसनी’ का न अंदाज बदला और न इसके एंकर श्रीवर्धन के तेवर में कोई कमी आयी है.सनसनी कार्यक्रम के दस साल पूरे होने पर वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार अजीत अंजुम अपने अंदाज में सनसनी को याद कर रहे हैं. तो पढ़िए उनके यादों के पिटारे से सनसनी की रामकहानी-

अजीत अंजुम

एबीपी न्यूज़ पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सनसनी के दस साल पूरे हुए . कुछ लोगों ने मुझे याद किया , कुछ ने फ़ोन करके बधाई दी तो आज सोचा कि मैं भी सनसनी के बारे में अपनी यादें ताज़ा कर लूँ . सनसनी को हम सबने मिलकर 22 नवंबर 2004 को लाँच किया था . क़रीब तीन साल तक इस शो को हमने प्रोड्यूस किया और जब न्यूज़ 24 के लाँच की तैयारी शुरु हुई तो स्टार न्यूज़ का ये शो हमने उनके हवाले कर दिया . स्टार न्यूज़ में आज भी वही लोग सनसनी बना रहे हैं , जो तब हमारे साथ थे . अलग -अलग चैनलों में क़रीब पचास ऐसे रिपोर्टर -प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं , जो सनसनी का हिस्सा रहे (उनके बारे में भी लिखूँगा )

हालाँकि सच कहूँ तो बीते पाँच- छह सालों के दौरान मैंने कभी सनसनी को लेकर न कोई बात की , न लिखा , न किसी समारोह में ज़िक्र किया क्योंकि मैं क्राइम शो के प्रोड्यूसर की छवि से निकलना चाहता था . एक दूसरा सच कहूँ तो बीते पाँच -छह सालों में मैंने सनसनी के एक -दो एपिसोड भी नहीं देखे हैं . बाक़ी के क्राइम शो भी न के बराबर ही देखे .

2004 के जुलाई -अगस्त का महीना रहा होगा . उस वक़्त उदय शंकर स्टार न्यूज़ ( अब एबीपी न्यूज़) के सीईओ थे और शाज़ी ज़मान मैनेजिंग एडिटर . मैं बीएजी फ़िल्मस का संपादकीय प्रमुख था . हम लोग उस वक़्त स्टार न्यूज़ के लिए पोल खोल और रेड अलर्ट जैसे कार्यक्रम प्रोड्यूस करते थे . इसके अलावा दिन भर की ख़बरों -घटनाओं का न्यूज़ कंटेंट भी स्टार न्यूज़ के लिए तैयार करते थे . एक दिन उदय शंकर ने बातों ही बातों में हमें स्टार न्यूज़ के लिए क्राइम शो डिज़ायन करने का ज़िम्मा दे दिया , इस निर्देश के साथ कि दो महीने के भीतर लाँच हो जाना चाहिए . तब तक रेड अलर्ट स्टार न्यूज़ के वीकेंड क्राइम शो के रूप में काफ़ी चर्चित हो चुका था . उसकी लोकप्रियता और टीआरपी की वजह से ही डेली क्राइम शो लाँच करने फ़ैसला हुआ .

अब मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि जल्द से जल्द टीम बने . एंकर मिले , कंटेंट डिज़ायन हो , कंसेप्ट फ़ाइनल हो , नाम तय हो और तय समय पर लाँच भी हो जाए . जब हम ये सब करने में जुटे थे , तब ज़ी न्यूज़ का क्राइम शो -‘क्राइम रिपोर्टर’ काफ़ी चर्चित हो रहा था . विनोद कापड़ी उन दिनों ज़ी न्यूज़ के आउटपुट हेड थे और क्राइम रिपोर्टर के कर्ता – धर्ता . मुक़ाबला प्रोग्राम से भी होना था और प्रोग्राम बनाने वाले से भी . चुनौती बड़ी थी और इसका अहसास उदय शंकर हमें हर बातचीत में कराते थे , ये कहते हुए कि अजीत ऐसा शो बनना चाहिए कि लगे कि हमने बहुत अलग हटकर किया है .

रेड अलर्ट की टीम में उन दिनों यासीर उस्मान , रजनीश प्रकाश , मुकुंद शाही , प्रदीप श्रीवास्तव , नीरज राजपूत जैसे बेहतरीन काम करने वाले लोग थे लेकिन वीकली से डेली लाँच करना चुनौती भरा काम था . उदय ने स्टार न्यूज़ की तरफ़ से सुपरवाइज़री भूमिका के लिए अंजू जुनेजा को ज़िम्मा सौंपा . अंजू के साथ हम पहले भी पोल खोल प्रोड्यूस कर रहे थे , सो एक फ्रिक्वेंसी मिली हुई थी . क्राइम शो का नाम क्या हो , इस पर काफ़ी जद्दोजहद हुई . कई नाम आए लेकिन एक बातचीत के दौरान शाज़ी ने नाम दिया -सनसनी . मुझे जितना याद आ रहा है शुरू में मैं बहुत सहमत नहीं था , बाद में हो गया . एंकर को लेकर भी काफ़ी मगजमारी हुई . दर्जनों स्क्रीन टेस्ट हुए . अनुराग श्रीवास्तव ने दर्जनों एंकर का स्क्रीन टेस्ट लिया , लेकिन कोई जंच नहीं रहा था . शो लाँच करने का दबाव बढ रहा था . इसी बीच पता चला कि आजतक में भी डेली क्राइम शो की तैयारियाँ चल रही हैं . अब चिंता ये होने लगी कि आजतक कहीं हमसे पहले न अपना शो लाँच कर दे . हम अपने शो को लाँच करने की तैयारियाँ भी कर रहे थे और ये भी पता कर रहे थे आजतक की क्या तैयारी है और कब तक लाँच हो सकता है . उन दिनों कमर वहीद नकवी आजतक के न्यूज़ डायरेक्टर थे . एक दिन कहीं हमारी मुलाक़ात हुई तो टटोलने की मंशा से मैंने उन्हीं से पूछ दिया कि भाई साहब , आप क्राइम शो कब लाँच कर रहे हैं ? नकवी जी ने आदतन जवाब देने की बजाय अपने चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए उल्टे सवाल पूछा -आप कब लाँच कर रहे हैं ? मैंने कहा -भाई साहब , अभी तो हमारी तैयारी नहीं है . एंकर भी फ़ाइनल नहीं है . तब नकवी जी थोड़ा खुले . उन्होंने कहा कि हम भी अभी तैयार नहीं हैं . मुझे इतना पता था कि आजतक की इतनी तैयारी ज़रूर है कि जिस दिन भी हम अपना शो लाँच करेंगे , वो भी कर देगा . उनकी नज़र स्टार न्यूज़ पर थी . स्टार न्यूज़ की तरफ़ से मुझपर दबाव था कि कहीं आजतक हमसे पहले न लाँच कर दे . मैंने नकवी जी से कहा -हम दोनों तैयार नहीं हैं तो क्यों नहीं तय कर लेते हैं कि दो – तीन सप्ताह बाद करेंगे . ये रज़ामंदी क़रीब क़रीब हो गई ( ऐसा मुझे याद आ रहा है )

इस बीच मैं एक तरफ़ टीम बनाने में जुटा था , दूसरी तरफ़ एंकर का तलाश जारी थी . परेशान होकर मैंने अपने बेहद अज़ीज़ दोस्त अरविंद गौड़ को फोन करके एनएसडी के कुछ एक्टर्स को स्क्रीन टेस्ट के लिए भेजने को कहा . कई आए , बात बनी नहीं . तभी एक दिन अनुराग एक शख़्स की आवाज़ और अंदाज से उत्साहित होकर एक टेप दिखाने आया . मैंने भी टेप देखा तो लगा कि हमारी तलाश पूरी होती दिख रही है लेकिन खुले लंबे बाल को लेकर कुछ कन्फ़्यूज हो रहा था . हमने टेप शाज़ी ज़मान को मुंबई भेजा . उदय शंकर और शाजी ने टेप देखने के बाद अपनी राय दी और उस शख़्स के हेयर स्टाइल पर कुछ काम करने की बात हुई . हमने दोबारा स्क्रीन टेस्ट किया. उदय शंकर और शाज़ी ने हमारे दफ़्तर आकर टेप देखा और आम सहमति से ये तय हुआ कि यही हमारा एंकर होगा और इस तरह से श्रीवर्धन हमारे एंकर बन गए . दुल्हे का सलेक्शन होने के बाँह हम थोड़े निश्चिंत हुए कि अब बैंड ,बाजा और बारात का इंतज़ाम तो तय समय पर हो ही जाएगा . 22 नवंबर को सनसनी के लाँच की तारीख़ तय हुई . उदय का फ़रमान था कि अब कुछ भी हो जाए तारीख़ नहीं टलेगी और तय तारीख़ पर ये शो लाँच हुआ . उसी दिन आजतक पर शम्स ताहिर खान के नेतृत्व में वारदात के नाम से भी क्राइम शो लाँच हुआ . मुझे याद कि चौथे या पाँचवें दिन शम्स का मेरे पास सहानुभूति भरा फ़ोन आया था . शम्स ने कहा था – आपका कंटेंट तो बहुत अच्छा है , स्क्रिप्ट और ट्रीटमेंट भी बढ़िया है लेकिन एंकर आप ठीक रख लेते तो आपका शो चल जाता . मैंने हँसकर कहा था – कोई बात नहीं , देखते हैं क्या होता है . कुछ ही सप्ताह के बाद सनसनी के सामने सब पस्त थे . रेटिंग और धमक के मामले में वारदात तो सनसनी के सामने कहीं नहीं था , वो भी तब जब आजतक की रेटिंग स्टार न्यूज़ से ज़्यादा थी . इसका श्रेय श्रीवर्धन त्रिवेदी और उस टीम को जाता है , जो सनसनी के लिए जान लगाकर काम करती थी . उस टीम में लोग जुड़ते गए , बिछुड़ते गए लेकिन जिसने जितने दिन भी काम किया कुछ देकर ही गया . अंजू जुनेजा की भूमिका सबसे अलग और सबसे ख़ास थी . तीन सालों के दौरान जिन लोगों के नाम मुझे याद आ रहे हैं , वो हैं – शशि शेखर मिश्रा , अनुराग श्रीवास्तव , रजनीश प्रकाश, मनीष कौशल , देव प्रकाश , रवीन्द्र रंजन, अजय कुमार, सुधीर सुधाकर , विवेक प्रकाश , अलका , बृज बिहारी चौबे , विकास मिश्रा , नीरज राजपूत , रितेश श्रीवास्तव , नीरज पांडेय, धर्मेन्द्र द्विवेदी , अनुप पांडेय, जितेन्द्र शर्मा , प्रशांत गुप्ता , नासिक खान , दीप उपाध्याय, नितिन जैन ,पूनम अग्रवाल ,सतेन्द्र उपाध्याय , चिराग़ गोठी , कुमार विक्रम, संजय चंद्रा , अखिलेश आनंद, मुकेश केजरीवाल ,प्रशांत देव ,विनोद मिश्रा , आस्था कौशिक, नम्रता नारायण, रीटा बख़्शी , नलिनी तिवारी , ऋचा श्रीवास्तव , अतुल भाटिया , मुकेश सेंगर, विमल कौशिक, विकास कौशिक , लतिकेश शर्मा, अमिताभ ओझा, सौरभ , मानस श्रीवास्तव , ब्रजेश राय ,संतोष तिवारी , परिवेश वात्स्यायन , आलोक वर्मा ….. ( जिनके नाम छूट रहे हों गाली मत देना , बता देना ) . इन सबके अलावा कई कैमरामैन और एडिटर्स की भूमिका बहुत अहम रही . इनमें कुछ ऐसे भी हैं , जिनका साथ महीने – दो महीने का रहा . कई ऐसे नए लड़के थे , जिन्होंने सनसनी में इंटर्नशिप की थी , आज बेहतरीन क्राइम रिपोर्टर हैं .

उन दिनों क्राइम का नंबर वन शो ज़ी न्यूज़ का क्राइम रिपोर्टर था , लेकिन अच्छी बात ये हुई कि सनसनी लाँच होने से पहले ही विनोद कापड़ी ज़ी न्यूज़ छोड चुके थे और स्टार न्यूज़ का हिस्सा बन चुके थे . विनोद ज़ी न्यूज़ में होते तो क़िला फ़तह इतना आसान नहीं होता . हमने सनसनी को एक मुहिम के तौर पर लाँच किया था और हमने कई तरह की कामयाब मुहिम चलाई भी . घूसखोर अफ़सरों के ख़िलाफ़ हमने मुहिम चलाई और क़रीब ढाई सौ अफ़सरों को रंगे हाथों पकड़ा , जिनमें आईएएस और आईपीएस भी शामिल थे . हमने तब एक स्लोगन गढ़ा था -बच न सकेंगे वो , घूस लेते हैं जो .Human trafficking के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू की तो कई राज्यों से सैकड़ों केस हमें मिले . नौकरी के नाम पर विदेश भेजने वाले कबूतरबाज़ों के ख़िलाफ़ हमने दो महीने तक लगातार कैम्पेन चलाया . विक्टिम या उनके परिवार वाले हमारे नोएडा दफ़्तर आते , हमारे रिपोर्टर्स की टीम छापामार दस्ते की तरह कबूतरबाज़ों के ठिकाने तक पहुँचती और हंगामा मचता . पुलिस की मदद से मामला दर्ज होता या फिर कैमरे के सामने ठगे गए लाखों रूपए वापस लौटाए जाते . ऐसा कई बार हुआ , जिस ग़रीब के पैसे वापस मिलता , उसकी आँखों से ख़ुशी के आँसू छलकते , हमें दुआएँ देता और हम अपने को धन्य मानकर ऊजावान हो जाते .

उन्हीं दिनों हमने हेल्पलाइन की शुरूआत की , सनसनी में दो मोबाईल नंबर दिखाने लगे और चार -पाँच लड़कों का एक हेल्प डेस्क बनाया . दिन भर सैकड़ों फ़ोन आते थे .खाड़ी देशों में फँसे बहुत से कामगार लोग सनसनी के नंबर पर फ़ोन करते और वतन वापसी के लिए मदद की गुहार लगाते . हमारी अपनी सीमाएँ थी लेकिन कई लोगों की वापसी की कामयाब कोशिशें हुई . मुझे आज भी याद है पंजाब का रहने वाला रामपाल नाम का एक युवक हमारी मुहिम की वजह से जब घर लौटा तो हमारी टीम ने एयरपोर्ट से लेकर होशियारपुर तक उसे कवर किया और उसके परिवार वालों की दुआएँ लेकर मैं चैन की नींद सोया था .

लाखों की कैपिटेशन फ़ीस लेकर दाख़िला देने वाले इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेजों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई तो हमारी टीम के प्रशांत गुप्ता ने दर्जनों कालेजों को एक्सपोज़ किया . एक दिन जब ग्रेटर नोएडा के कालेजों के स्टिंग आपरेशन का प्रोमो चला तो एक नामचीन कॉलेज के डायरेक्टर का हमारे रिपोर्टर के पास फ़ोन आया कि इसे रोक दो , जितने पैसे चाहिए , ले लो . जैसे ही रिपोर्टर ने मुझे बताया , मैं पाँच मिनट की एडिटेड स्टोरी को बीस मिनट की स्टोरी बनाने में जुट गया . मैंने ख़ुद पूरी स्टोरी लिखी .स्टार न्यूज़ में शाज़ी और विनोद कापड़ी को फ़ोन करके ज़्यादा प्रोमो चलाने का आग्रह किया और स्टोरी के असर का इंतज़ार करने लगा . उस शख़्स ने बेचैन होकर फिर फ़ोन किया और स्टोरी रोकने के बदले बीस लाख तुरंत देने की पेशकश कर दी . मैंने उससे हुई पुरी बात श्रीवर्धन के एंकर लिंक में लिखी और वो स्टोरी टेलीकास्ट हुई . श्रीवर्धन की बुलंद आवाज़ में वो लाइनें हमारे पूरे दफ़्तर में गूँज रही थी – आज सनसनी को ख़रीदने की कोशिश हुई . क़ीमत लगाई गई बीस लाख , लेकिन सनसनी न बिक सकती है , न झुक सकती है …

और मैं ख़ुद से रश्क करते हुए ख़ुद को ही कह रहा था …साले हमें ख़रीदने चलो हो…( सारी ,गाली का इस्तेमाल कर रहा हूँ , लेकिन इसके बग़ैर बात पूरी नहीं होती ) . ऐसे मौक़े न जाने कितनी बार आए , जब स्टोरी रोकने के लिए लाखों की पेशकश हुई . धमकियाँ भी मिली लेकिन इससे हमारी बैटरी और ज़्यादा चार्ज हो जाती थी . अब आएगा मज़ा की तर्ज़ पर मैं स्टोरी को और असरदार बनाने में जुट जाता था . ज़्यादा प्रोमो चलवाता और जो स्टोरी पाँच मिनट में ख़त्म होने वाली होती , उस पर पूरा एपिसोड लिख देता था . फिर उदय शंकर को फ़ोन करता , सर, इस स्टोरी के लिए फ़ोन आने शुरू हो गए हैं, इसका चलना ज़रूरी है . उदय तो उदय थे .वैसा बास टीवी में न तो हुआ है , न होगा ( शायद ) . शाज़ी ज़मान भी इस शो से दिल से जुड़े थे . अमूमन रात साढ़े ग्यारह बजे सनसनी के टेलीकास्ट के बाद हमारी बात होती .

दरअसल सनसनी को हमने एक क्राइम शो की तरह समझा ही नहीं , मेरे लिए वो एक मुहिम थी . हर रोज़ नए आइडिया सोचता , टीम से बात करता , अपने छापामार दस्ते को उस आइडिया के पीछे लगाता ( हमारे रिपोर्टर छापामार दस्ता की तरह काम करते थे ) . उस दौर में सनसनी की ऐसी धमक थी, जिसका अंदाज़ा आज लोग नहीं लगा सकते . हमने पाखण्डी बाबाओं के ख़िलाफ़ तीन महीने तक मुहिम चलाई . दिल्ली ,मुंबई, जयपुर, पटना, लखनऊ , भोपाल समेत कई शहरों में हमारे छापामार रिपोर्टरों ने पचासों बाबाओं को एक्सपोज़ किया . विक्टिम के साथ मिलकर पचासों केस दर्ज करवाए , बाबाओं को जेल भिजवाया. ख़ास बात ये थी कि कई बाबा पकड़े जाने पर आन कैमरा कहते थे कि मैं हर रोज़ सनसनी देखता था और लगता था कि कहीं एक दिन हम भी न पकड़े जाएँ .

नोएडा में हमारे दफ़्तर में हर रोज़ दर्जनों लोग हमारे हेल्पलाइन पर फ़ोन करके अपनी शिकायतें लेकर आते थे , उन्हें लगता था कि ये सनसनी वाले उनकी मदद ज़रूर करेंगे . मैं ख़ुद कई बार उन लोगों से मिलता , उनकी स्टोरी दिखाता , उनके साथ रिपोर्टर भेजता और कुछ सार्थक करने के अहसास से भर उठता था .सनसनी की कामयाबी का श्रेय बीएजी की एमडी अनुराधा प्रसाद को भी जाता है , जिन्होंने मुझे अपने मुताबिक़ काम करने का अधिकार और आज़ादी दी .

दूसरे चैनलों में सनसनी को लेकर कितनी खलबली थी , इसकी कहानियाँ हम तक पहुँचती . हमारे प्रोमो देखकर हड़कंप की ख़बरें भी पहुँचती थी .
जैसा कि मैंने पहले बताया विनोद कापड़ी ज़ी न्यूज़ छोड़कर स्टार न्यूज़ आ चुके थे , कुछ महीनों बाद सनसनी के सामने क्राइम रिपोर्टर की रेटिंग गिरने लगी तो ज़ी न्यूज़ ने हमारे छापामार दस्ते को दो लड़कों को तोड़ा और हमारी तरह हेल्पलाइन नंबर देकर मुहिम चलाना शुरू किया . मुहिम की ज़्यादातर कापी या तो मैं ख़ुद लिखता था या फ़ाइनल करता था . जो रिपोर्टर ज़ी न्यूज़ गया , वो शायद अपने साथ यहाँ की दस -बीस स्क्रिप्ट भी ले गया था . वो उसी अंदाज में शूट करता , जैसे मैंने ठोक-पीटकर सिखाया था और नाम -जगह बदलकर क़रीब क़रीब वही स्क्रिप्ट कई दिनों तक चिपकाता रहा . बाद में जब उसने सुर पकड़ा ,तब हम वहाँ से काफ़ी आगे निकल चुके थे .

एक बार आजतक के वारदात में एंकर ने बहुत तल्ख़ लहजे में आन एयर कहा -यूँ तो कई सनसनियाँ हमारी डस्टबीन में पड़ी होती है लेकिन हम दिखाते हैं अपराध की ऐसी ख़बरे, जिसे आप कहते हैं वारदात . अगर मुझे ठीक से याद है तो रवि शर्मा उस दिन वारदात की एंकरिंग कर रहे थे . जैसे ही मुझे पता चला , मैंने ग़ुस्से में सुप्रिया प्रसाद और नकवी जी को फ़ोन किया . मैंने अपना विरोध दर्ज कराया . दोनों ने माना कि नहीं होना चाहिए था और अगले दिन के रिपीट से ये लाइनें हटा दी गई .

रवि शर्मा को मैं शानदार क्राइम रिपोर्टर -प्रोड्यूसर मानता हूँ , लेकिन पता नहीं किस खीझ में उसने ऐसा लिखकर आनएयर कर दिया था .

( आगे की कहानी के लिए देखते रहिए फ़ेसबुक )




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