संजीव चौहान को बेस्ट क्राइम जर्नलिस्ट अवार्ड

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arnab ashutosh

देश के जाने-माने वरिष्ठ खोजी-अपराध संवाददाता संजीव चौहान को साल 2013 के बेस्ट क्राइम जर्नलिस्ट (BEST CRIME JOURNALIST) अवार्ड से सम्मानित किया गया है। श्री चौहान को यह सम्मान दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में आयोजित सम्मान समारोह में दिया गया।

7वें मीडिया एक्सीलेंस सम्मान समारोह का आयोजन मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया के तत्वाधान में किया गया था। श्री चौहान को बेस्ट क्राइम जर्नलिस्ट का ये अवार्ड उनके 20 साल के लंबे क्राइम-रिपोर्टिंग करियर में किये गये कई सनसनीखेज खबरों/ खुलासों के लिए प्रदान किया गया है।

इस अवार्ड की चयन समिति ने श्री चौहान की उन तमाम खबरों को ध्यान में रखकर ही उनका नाम साल के सबसे बेहतर ‘क्राइम जर्नलिस्ट’ के लिये चयनित किया था, जो सिर्फ मसाला-खबरें नहीं थीं।बल्कि उनकी तमाम खबरों में वे तथ्य भी मौजूद थे, जो बाद में जांच-एजेंसियों के काम भी आये। इन खबरो में जैसे सन् 1996 का दिल्ली का सनसनीखेज पर्सनल प्वाइंट तिहरा हत्याकांड, नयना साहनी हत्याकांड, नोएडा का निठारी कांड, पूर्व दस्यु सुंदरी फूलन देवी हत्याकांड, संसद और लाल किले पर हमला, दिल्ली के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा और पू्र्व मेयर शांति देसाई का उनके जीते-जी मृत्यु प्रमाण पत्र दिल्ली के निगम बोध घाट से दलालों को पैसे देकर बनवा कर सरकारी हुक्मरानों की चूलें हिला देने जैसी प्रमुख खबरें थीं।

 

सन् 1997 में दिल्ली के झण्डेवालान देवी मंदिर में पूर्व केंद्रीय गृह-मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी को नारियल बम से उड़ा देने की नाकाम कोशिश की खबर देश में एकमात्र क्राइम रिपोर्टर संजीव चौहान ने ही ब्रेक की थी। ये खबर हिंदी अखबार दैनिक-जागरण के सभी संस्करणों में सबसे बड़ी खबर से रुप में प्रकाशित भी हुई थी, लेकिन दिल्ली पुलिस ने एक बार को ऐसी कोई घटना घटने से ही साफ इंकार कर दिया था। अगले दिन संजीव चौहान की वो खबर सही साबित हुई।

बाद में दिल्ली पुलिस ने इस मामले में बाकायदा पहाड़गंज थाने में विस्फोटक अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करके गहन जांच पड़ताल भी की। जबकि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर (अजय राज शर्मा) और मेयर शांति देसाई का जाली मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के मामले में तो संजीव चौहान के खिलाफ ही दिल्ली के कश्मीरी गेट थाने में एफआईआर दर्ज की गयी। इस मामले में शिकायतकर्ता भी कोई आम-आदमी नहीं, बल्कि दिल्ली की एक अदालत के जज ही शिकायतकर्ता बने थे। उस मामले में भी संजीव चौहान की फर्जी डैथ सर्टिफिकेट की खबर सही साबित हुई।

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