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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर ट्विटर का नया इमोजी

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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर ट्विटर ने शुक्रवार को मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातचीत को बढ़ावा देने के लिए एक नया ग्रीन रिबन इमोजी लॉन्च किया। ट्विटर मानसिक स्वास्थ्य पर लगातार चर्चा को बढ़ावा देता रहा है। 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था और ऐसे में ट्विटर की ये कोशिश थी कि दुनिया भर में लोग इस विकार को लेकर खुलकर बात करें।

कम्पनी ने एक बयान में कहा है कि दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बात होती रहे इसके लिए उसने एक नया हैशटैग-हैशटैगमेंटलहेल्थ शुरू किया है और साथ ही इस हैशटैग को सपोर्ट करने के लिए नया इमोजी भी लॉन्च किया है।

दर्शकों ने माना न्यूज चैनलों के कार्यक्रमों में अनावश्यक झगड़ा होता है !

arnab goswami

देश के 76 प्रतिशत लोगों को लगता है कि समाचार चैनलों पर उचित बहस (डिबेट) न होकर अनावश्यक झगड़ा होता है। आईएएनएस सी-वोटर मीडिया कंजम्पशन ट्रैकर के हालिया निष्कर्षों में यह बात सामने आई है।

सर्वेक्षण में 76 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि विचारों के सार्थक आदान-प्रदान के बजाय टेलीविजन डिबेट पर झगड़ा अधिक होता है।

उत्तरदाताओं का विचार है कि ये बहस अक्सर पहले विश्व युद्ध की शैली पर आधारित होती हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से पहचाने जाने वाले लड़ाके (वाद-विवादकर्ता) दूसरी तरफ के व्यक्ति पर और भी अधिक जोर से चीखने-चिल्लाने में विश्वास रखते हैं।

आईएएनएस सी-वोटर के सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं से पूछा गया कि क्या वे वास्तव में मानते हैं कि टीवी न्यूज चैनल पर वास्तविक बहस की तुलना में लड़ाई-झगड़ा और चीख-पुकार अधिक होती है। इस पर सर्वे में शामिल 76 प्रतिशत ने सहमति व्यक्त की।

इनमें से 77.1 पुरुष उत्तरदाताओं ने सहमति दिखाई, वहीं 74.9 महिला उत्तरदाता इस बात से सहमत दिखाई दीं।

जब इन सवालों को सामाजिक समूहों के समक्ष रखा गया था तो दिलचप्स आंकड़े सामने आए। इनमें उच्च जाति से संबंध रखने वाले 79.7 प्रतिशत हिंदू, जबकि 94 प्रतिशत ईसाई इस बात से सहमत हैं।

इसके अलावा 78 प्रतिशत से अधिक मुसलमानों ने माना कि चैनलों पर कोई सार्थक बहस नहीं होती है, जबकि 71.6 प्रतिशत ओबीसी और 73.9 प्रतिशत एससी और एसटी वर्ग के लोगों ने कहा कि बहस से ज्यादा झगड़ा देखने को मिलता है।

शहरी क्षेत्र में लगभग 75 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 77 प्रतिशत लोग सोचते हैं कि टीवी डिबेट में बहस से कहीं अधिक झगड़ा देखने को मिलता है।

अगर आयु वर्ग की बात की जाए तो 18 से 44 आयु वर्ग में औसतन 75 प्रतिशत लोगों को लगता है कि कोई सार्थक बहस नहीं होती है।

कोविड-19 महामारी ने भारत के नए मीडिया परिदृश्य को दर्शाया है। देश में 54 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि वह टीवी समाचार चैनलों को देखकर थक चुके हैं। वहीं 43 प्रतिशत भारतीय इस बात से असहमत हैं।

इस सर्वेक्षण में सभी राज्यों में स्थित सभी जिलों से आने वाले 5000 से अधिक उत्तरदाताओं से बातचीत की गई है। यह सर्वेक्षण वर्ष 2020 में सितंबर के आखिरी सप्ताह और अक्टूबर के पहले सप्ताह के दौरान किया गया है। (एजेंसी)

66.5 फीसदी लोगों ने माना, अखबार सूचना का सबसे अहम स्रोत – सर्वे

newspaper primary source of information
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भारत के दो तिहाई से अधिक (66.5 फीसदी) लोगों का मानना है कि समाचारपत्र अभी भी जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह जानकारी आईएएनएस सी वोटर मीडिया ट्रैकर में सामने आई है। अखिल भारतीय स्तर पर किए गए इस सर्वेक्षण में 66.5 प्रतिशत उत्तरदाता इस बात से सहमत नजर आए कि समाचारपत्र अभी भी जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है, जबकि 29.2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इस पर असहमति व्यक्त की।

कोविड-19 महामारी के समय में जानकारी के महत्व को देखा जाए तो 63.1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कोरोना के बाद पाठकों के लिए अखबार पढ़ना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, जबकि 31.2 प्रतिशत लोग इस बात से असहमत नजर आए।

75.5 प्रतिशत ने कहा कि वे सभी समाचारों और ताजा घटनाओं के समग्र कवरेज के लिए समाचारपत्र पढ़ना पसंद करते हैं, जबकि इस धारणा से 12.5 लोग असहमत थे।

सर्वेक्षण के दौरान सामने आया कि देश के 75.5 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे समग्र कवरेज करंट अफेयर्स के लिए समाचारपत्र पढ़ना पसंद करते हैं, जबकि केवल 12.5 प्रतिशत लोग ही इससे असहमत हैं।

अखबारों की तुलना टीवी न्यूज चैनल की बहस (डिबेट) के साथ किए जाने पर 72.9 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि एक अखबार की रिपोर्ट टीवी चैनल में चिल्लाकर होने वाली बहस से कहीं अधिक जानकारी देती है, जबकि 21.5 प्रतिशत लोग इससे असहमत रहे।

सर्वेक्षण में पाया गया कि समाचार को फोन पर सक्रिय रूप से साझा किया जाता है। सर्वे में 68.1 प्रतिशत लोगों ने कहा, “जब मैं कुछ महत्वपूर्ण पढ़ता हूं, तो मैं इसे फोन पर अन्य लोगों से साझा करता हूं।”

हालांकि, टीवी की पहुंच को देखते हुए 40 प्रतिशत लोगों ने टीवी समाचार चैनलों को सूचना के सबसे भरोसेमंद स्रोत के रूप में पहचाना। वहीं 29.2 प्रतिशत ने इस मामले में समाचारपत्र को तवज्जो दी। इसके अलावा 14.9 प्रतिशत ने सोशल मीडिया, 4.5 प्रतिशत ने रेडियो और एफएम और 2.5 प्रतिशत लोगों ने वेबसाइट पर भरोसा जताया।

टीवी चैनलों में विज्ञापन के कारण सिर्फ चीजें खरीदने के सवाल पर 76.5 प्रतिशत ने इस बात पर असहमति जताई, जबकि 19.3 प्रतिशत इससे सहमत दिखे।

74.5 प्रतिशत ने कहा कि टीवी चैनलों में विज्ञापन मनोरंजन वैल्यू के लिए अधिक हैं, जबकि 18.5 प्रतिशत इससे असहमत नजर आए।

सर्वे के दौरान 67.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि आईपीएल मैचों के दौरान बहुत अधिक विज्ञापन ब्रेक होते हैं, जबकि 12.7 असहमत रहे। इसके अलावा 65.2 प्रतिशत ने कहा कि वे बिना किसी ब्रेक के क्रिकेट मैच देखना चाहते हैं।

सर्वेक्षण में एक और महत्वपूर्ण बात का पता चला, जब 52.2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि लाइव मैच देखने के बाद भी वे इसके बारे में अखबार में पढ़ना पसंद करते हैं, जबकि 30.2 प्रतिशत लोग इससे असहमत रहे। कुल 65 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अखबारों में विज्ञापन अधिक उपयोगी हैं, जबकि 24.6 प्रतिशत इससे असहमत नजर आए।

इस सर्वेक्षण में पूरे भारत से सभी राज्यों के सभी जिलों से आने वाले 5,000 से अधिक उत्तरदाताओं से सवाल पूछे गए थे। यह सर्वेक्षण वर्ष 2020 में सितंबर के अंतिम सप्ताह और अक्टूबर के पहले सप्ताह में किया गया था। (एजेंसी)

रामविलास पासवान के लिए बीबीसी की ऐसी हेडिंग?

bbc heading ramvilas paswan

मौसम विज्ञानी रामविलास पासवान नहीं रहे . क्या बीबीसी हिंदी का यह ​हेडिंग बहुत आश्चर्य का भाव नहीं भरता! किसी भी विधा का कोई व्यक्ति,संस्थान जब वर्तमान समय की लोकप्रिय धारा के प्रवाह में बहकर या शामिल होकर, लोकप्रिय होना चाहता है तो वह अपनी विशिष्टता से ज्यादा लोकप्रियता को महत्व देने लगता है. चाहे वह साहित्य की बात हो, कला की बात हो या कि पत्रकारिता की ही. सवाल बड़ा सरल है कि मौसम विज्ञानी कौन कहता था रामविलास पासवान को?

यह कोई टैगोर से गांधी को महात्मा जैसी मिली उपाधि तो थी नहीं! तो क्या किसी को भी एक वर्ग उस नाम से कहना शुरू करेगा, उस नाम से बीबीसी जैसा जिम्मेवार संस्थान हेडिंग चलायेगा?

गुणागणित लगाकर ही सही,डीफेम करने के लिए, राहुल गांधी का एक नाम पप्पू मशहूर किया गया तो बीबीसी राहुल गांधी के नाम के पहले ऐसे विशेषण लगायेगा?

प्रधानमंत्री को भी बहुत कुछ कहा जाता है तो क्या बीबीसी हेडिंग लगायेगा?

लालू प्रसाद के नाम आगे एक बड़ा वर्ग बिहार में अनेक किस्म का विशेषण लगाता है. तो क्या बीबीसी या कोई जिम्मेवार संस्थान वह हेडिंग में चलायेगा?

मौसम विज्ञानी रामविलास पासवान को अवसर पकड़ने के लिए ही कहा जाता था न? कहता कौन था? किसने पॉपुलर किया यह विशेषण? बिहार में कौन दल अवसर नहीं पकड़ा है या बिहार छोड़ें, देश में यह भी बताये. रामविलास ने क्या नया किया था अवसर पकड़कर?

भाजपा और कम्युनिस्ट एक घाट पर इस देश में पानी पी चुके हैं.बिहार में इस बार भाकपा माले और राजद का गंठबंधन हंसी—राजी—खुशी हो चुका है. क्या वह समाजसेवा के लिए हुआ है या कि सत्ता की सियासत को साधने के लिए ही. कांग्रेस का ही विरोध कर खड़ी हुई समाजवाद पार्टियां कांग्रेस की संगी हैं सभी जगह, दांती—काटी रोटी का रिश्ता बन रहा है? किसलिए, सत्ता साधने के लिए ही न?

कौन सत्ता साधने के लिए अपने समीकरण को नहीं बदला इस देश में? राजद और जदयू का मिलान हो चुका है, कम्युनिस्ट—भाजपा एक घाट पर पानी पी चुके हैं, कांग्रेस को ही मिटाने के लिए बनी शिवसेना, घोर सांप्रदायिक मानीजानेवानी शिवसेना, कांग्रेस के साथ सरकार चला रही है.

तो मौसम विज्ञानी आमबोलचाल में बोला जाता है. रामविलास पासवान के नाम के आगे यह लगाया भी गया था ​उन्हें डीफेम करने के लिए ही या मजाक उड़ाने के लिए ही. तो क्या किसी को डीफेम करने के लिए, मजाक उड़ाने के लिए जो शब्द कोई विरोधी खेमा स्थापित करेगा, उसे बीबीसी जैसा जिम्मेवार संस्थान स्थापित सच मानकर हेडिंग में चलायेगा. बीबीसी का नियमित पाठक होने के नाते ठीक नहीं लगा. ( सोशल मीडिया @ Nirala Bidesia )

भारत के 54 प्रतिशत लोग टीवी समाचार चैनल देखकर थक चुके हैं – आईएएनएस सी-वोटर मीडिया सर्वे

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कोविड-19 महामारी ने भारत के नए मीडिया परि²श्य को दर्शाया है। देश में 54 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि वह टीवी समाचार चैनलों को देखकर थक चुके हैं। वहीं 43 प्रतिशत भारतीय इस बात से असहमत हैं। आईएएनएस सी-वोटर मीडिया कंजम्पशन ट्रैकर के हालिया निष्कर्षों में यह बात सामने आई है।

लगभग 55 प्रतिशत पुरुषों ने सहमति व्यक्त की कि वे भारतीय समाचार चैनलों को देखकर थक गए हैं, जबकि लगभग 52 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह की राय व्यक्त की है।

दिलचस्प बात यह है कि पूर्वोत्तर भारत के 59.3 प्रतिशत लोगों ने महसूस किया कि वे भारतीय समाचार चैनलों को देखकर थक चुके हैं, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के 47.6 प्रतिशत लोगों ने ऐसा महसूस किया है।

उत्तर भारत के 57.9 प्रतिशत लोगों ने समाचार चैनलों को देखकर थक जाने की बात मानी, जबकि दक्षिण के लगभग 48 प्रतिशत और पश्चिम भारत के 53.6 प्रतिशत लोगों ने पाया कि वे भी न्यूज चैनल देख कर थक गए हैं।

अगर विभिन्न आय समूह की बात करें तो निम्न आय वर्ग के 52.4 प्रतिशत लोगों ने समाचार चैनलों से थकान महसूस की है, जबकि मध्यम आय वर्ग के 54.4 प्रतिशत और उच्च आय वर्ग के 58 प्रतिशत लोगों ने ऐसा ही महसूस किया है।

शिक्षा समूह के बारे में बात की जाए तो निम्न शिक्षित वर्ग के 52.2 प्रतिशत लोगों ने महसूस किया कि वे समाचार चैनलों को देखते हुए थक गए हैं, जबकि उच्च शिक्षित समूह के 56.4 प्रतिशत लोगों ने ऐसा ही महसूस किया है।

ग्रामीण और शहरी भारत के लोगों में इसी सवाल पर थोड़ा अंतर देखा गया है। शहरी भारत के जहां 55.5 प्रतिशत लोगों ने न्यूज चैनल से थक जाने की बात साझा की, वहीं ग्रामीण भारत के 52.8 प्रतिशत लोगों ने ऐसा महसूस किया है।

आयु वर्ग की बात करें तो 18 वर्ष से 24 वर्ष के बीच की आयु वाले युवा वर्ग में 52.4 प्रतिशत ने स्वीकार किया कि वे भारतीय समाचार चैनल देख कर थक गए हैं। इसके अलावा 25 से 34 वर्ष के बीच की आयु वाले लोगों में 55.9 प्रतिशत, 35 से 44 वर्ष में 52.3 प्रतिशत और 55 वर्ष और उससे अधिक आयु के 52 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे भारतीय समाचार चैनलों को देखकर थक चुके हैं।

इस सर्वेक्षण में सभी राज्यों में स्थित सभी जिलों से आने वाले 5000 से अधिक उत्तरदाताओं से बातचीत की गई है। यह सर्वेक्षण वर्ष 2020 में सितंबर के आखिरी सप्ताह और अक्टूबर के पहले सप्ताह के दौरान किया गया है।

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