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सहारा में बड़े बदलाव

सहारा समय
सहारा समय

सहारा में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. खबरों के मुताबिक़ रमेश अवस्थी को सहारा टीवी और न्यूज़ पेपर में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारी मिलेगी जो अखिल भारतीय स्तर पर लायजनिंग व अन्य काम देखेंगे.

रमेश अवस्थी सहारा के जाने माने चेहरों में से एक है और इनका नाम संस्था से जुड़े काफी कामो में पहले भी आता रहा है . सहारा में काफी लम्बे समय के बाद बदलाव का सिलसिला एक बार फिर जारी है !

सर्कुलर के अनुसार पता लग रहा है की रमेश अवस्थी ने देहरादून एवं कानपूर यूनिट को भी अपने अंडर में रखा है और साथ ही साथ snb के एडमिनिस्ट्रेशन का भी चार्ज लिया है और यह यूपी के सर्वे की ज़िम्मेदाररी भी देखेंगे. रमेश अवस्थी को उपेन्द्र राय का सबसे ख़ास और विश्वास पात्र माना जा रहा है. आने वाले कुछ समय में और भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते है.

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में संविधान दिवस का आयोजन

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में 26 नवम्बर 2015 को संविधान दिवस का आयोजन किया जा रहा है। देश में पहली बार मनाये जा रहे संविधान दिवस के उपलक्ष्य में ‘भारतीय संविधान: नागरिक के दायित्व और अधिकार’विषयक व्याख्यान का आयोजन किया गया है।

देश में 26 नवम्बर का दिन संविधान दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश में पहली बार किसी शैक्षणिक संस्थान द्वारा संविधान दिवस मनाया जा रहा है। कार्यक्रम का आयोजन 26 नवम्बर 2015 को प्रातः 11.30 बजे विश्वविद्यालय के एम.पी.नगर स्थित विकास भवन परिसर के सभागार में होगा। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता हरियाणा एवं पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ. भारत भूषण प्रसून होंगे।वे ‘भारतीय संविधान: नागरिक के दायित्व और अधिकार’विषय पर अपने विचार व्यक्त करेंगे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. सीताशरण शर्मा होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला करेंगे।

संविधान दिवस के आयोजन के विषय में बताते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतांत्रिक देश का शासन संचालन संविधान में बताये गए प्रावधानों के अनुसार होता है। हमें अपने संविधान पर गर्व है। युवाओं एवं विद्यार्थियों को भारतीय संविधान के उजले पक्ष एवं लोकतंत्र में नागरिकों के दायित्व एवं अधिकारों के विषय में बताया जाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से संविधान दिवस का आयोजन किया जा रहा है।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के समस्त शैक्षणिक विभागों के विद्यार्थी,अधिकारी,शिक्षकगण एवं नगर के गणमान्य नागरिक शामिल होंगे।

पत्रकार सुरक्षित होंगे तभी प्रेस की आजादी सुरक्षित रहेगी : डॉ. नंदकिशोर त्रिखा

”प्रेस की आजादी सुरक्षित रखनी है तो पत्रकार सुरक्षित रहना चाहिए।” यह बात गत 22 नवंबर को नई दिल्लीस में आयोजित एक संगोष्ठी् में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के पूर्व राष्ट्री य अध्यईक्ष डॉ. नंदकिशोर त्रिखा ने कही। इस कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली् जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने किया था और विषय था- ‘पत्रकार सुरक्षा अधिनियम और मीडिया आयोग की जरूरत।’

अपने संबो‍धन में डॉ. त्रिखा ने पत्रकार और पत्रकारिता के गौरवपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही उन्हों ने मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि आज जितनी मीडिया की दयनीय और पत्रकारों की असहाय स्थिति है, ऐसी पूर्व में नहीं रही। संपादक संस्थात की साख गिरी है। पत्रकार आजादी खो चुका है और वहीं, मालिक मजबूत हो रहा है।

उन्होंरने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि पत्रकारों पर जानलेवा हमले बढ़ते जा रहे हैं। यह पत्रकार ही नहीं, बल्कि समाज के लिए भी खतरे की घंटी है क्यों कि पत्रकार समाज के लिए काम करता है।

डॉ. त्रिखा ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन पर बल देते हुए कहा कि 1952 में पहला प्रेस आयोग बना और आपातकाल के बाद दूसरा। तब से स्थिति काफी बदली है। प्रिंट व रेडियो के साथ-साथ इलेक्ट्रॉ निक और वेबमीडिया का विस्ताथर हुआ है। अब फिर से इन सभी मीडिया माध्य मों की स्थिति पर विचार करना होगा।

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्सा के अध्य्क्ष श्री रासबिहारी ने कहा कि आज समाज में पत्रकार सबसे शोषित है। पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं और जिस तरह से अखबारों और टीवी चैनलों में पत्रकारों की छंटनी हो रही है, उससे पत्रकारों के भविष्यब पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। उन्होंरने कहा कि पत्रकार सुरक्षा अधिनियम, मीडिया आयोग और मीडिया परिषद् की मांग को लेकर आगामी 7 दिसंबर को देशभर के पत्रकार संसद का घेराव करेंगे।

प्रेस एसोसिएशन के सचिव श्री मनोज वर्मा ने कहा कि उत्तकरप्रदेश, पं. बंगाल, दिल्लीि जैसे अनेक राज्यों में पत्रकारों का शोषण और उत्पीदड़न किया जा रहा है। यह दुर्भाग्य,पूर्ण है। पत्रकार नहीं बचेगा तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। आपातकाल में कोशिश की गई थी पत्रकारों को दबाने की। एनयूजे ने तब संघर्ष किया। हम लंबे समय से पत्रकार सुरक्षा अधिनियम की मांग कर रहे हैं। हम बहुत मांग कर चुके, अब आंदोलन ही रास्ताक है।
दिल्लीत जर्नलिस्ट्सं एसोसिएशन के अध्य‍क्ष श्री अनिल पांडेय ने राष्ट्री य एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्यी में पत्रकारों की स्थिति का अवलोकन करते हुए कहा कि आज पत्रकार अनेक तरह की चुनौतियां का सामना कर रहा है। उन पर जानलेवा हमले हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर उनकी छंटनी हो रही है। इसलिए समग्र मीडिया का मूल्यांएकन करने के लिए तीसरा प्रेस आयोग अतिशीघ्र बनना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन दिल्ली जर्नलिस्ट्सं एसोसिएशन के कार्यकरिणी सदस्यघ श्री संजीव सिन्हाह ने किया। इस कार्यक्रम में एनयूजे के पूर्व उपाध्यसक्ष श्री सुभाष निगम, एनयूजे के कोषाध्यहक्ष श्री दधिबल यादव, एनयूजे राष्ट्रीकय कार्यकारिणी सदस्यर श्री मनोहर सिंह, डीजेए के कोषाध्य क्ष श्री राजेंद्र स्वाामी, डीजेए कार्यकारिणी सदस्य् श्रीमती सीमा किरण एवं सर्वश्री संजय सक्सेशना, राजकमल चौधरी, सगीर अहमद, वरिष्ठस टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी, योजना पत्रिका के संपादक श्री ऋतेश पाठक, यथावत पत्रिका के एसोसिएट संपादक श्री ब्रजेश झा, अंकुर विजयवर्गीय (हिंदुस्ता न टाइम्सक), उमाशंकर मिश्र (अमर उजाला), पंकज प्रसून (न्यूरज नेशन), श्री कंत शरण (नेपालवन टीवी) सहित बड़ी संख्याउ में पत्रकारगण उपस्थित रहे।

भव्य राममन्दिर की अधूरी आस

राजीव गुप्ता

हिन्दुत्व पुरोधा अशोक सिंघल का नाम सुनते ही एक हिन्दूवादी छवि के नेता का चित्र मानस में उभरता है । ऐसा व्यक्तित्व जिसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था अयोध्या में भगवान राम का भव्य मन्दिर निर्माण करवाना । अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस व्यक्तित्व ने अजीवन संघर्ष किया । इसी वर्ष के 30 सितम्बर को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी के साथ मिलकर अशोक सिंघल ने अपने जीवन की अंतिम प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए वर्तमान केन्द्रीय सरकार को अयोध्या में भगवान राम के भव्य मन्दिर निर्माण करने की तरफ अग्रेसित होने के लिए कहा । अशोक सिंघल को भारतीय तिथि के अनुसार पिछले मास 1 अक्टूबर को अपना 90 जन्मदिन मनायें हुए अभी चंद दिन ही बीते थे और दिल्ली के सिविक सेंटर में आयोजित उस कार्यक्रम में जो भी गया होगा उसने कभी यह कल्पना भी नही की होगी कि मात्र चंद दिनों बाद ही अशोक सिंघल हमारे बीच में नहीं होगें । अपने जन्मदिन के उस कार्यक्रम में अशोक सिंघल ने अपनी बुलन्द आवाज एक गीत ‘यह मातृभूमि मेरी, यह पितृभूमि मेरी..’ गाकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था । अपने सपने को अपनी मौत की आहट सुनकर भी कैसे जिन्दा रखा जाय, यदि यह जानना हो तो आपका अधिक पीछे जाने की जरूरत नही । गत मास हुए सिविक सेंटर में हुए उस कार्यक्रम को ध्यान कीजिए, जब विष्णु हरि डालमिया ने संघ परिवार की शीर्ष नेतृत्व मोहनराव भागवत तथा देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में कह दिया अयोध्या में भगवान राम का भव्य मन्दिर बनवाकर अशोक सिंघल जी को जन्मदिन का तोहफा दे दीजिए । स्वतंत्र भारत के इतिहास में अशोक सिंघल एक ऐसा नाम बनकर उभरा जिससे वैचारिक मतभेद होने के बावजूद भारतवर्ष का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो उनके व्यक्तित्व से परिचित न हो । अशोक सिंघल के कारण ही देश की राजनीति को भी राममन्दिर का ककरहा पढकर ही राजनीति करना पडा । उन्होंने देश के नेताओं को यह सिद्ध करके दिखा दिया कि धर्म से बढकर कोई राजनीति नही होती है । उनके राममन्दिर आन्दोलन ने ही लालकृष्ण आडवाणी को नायक और अटल बिहारी वाजपेयी को देश का प्रधानमंत्री बनाया । दूसरे शब्दों में, जिसने रामनाम से राजनीति शुरू किया वह राजनीति की वैतरिणी में पार हुआ ।

दो ध्रुवों की तरह आस्था और विज्ञान को साधने वाले अशोक सिंघल ने बीटेक की अपनी पढाई बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से किया था । लेकिन अशोक सिंघल ने नौकरी करने की जगह हिन्दुत्व की राह पक़डा और पहुंच गए गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर । उन दिनों हिन्दुत्व की सबसे बडी प्रयोगशाला गोरखपुर का गोरक्षनाथ मन्दिर ही था । वहाँ पहुँचकर अशोक सिंघल ने गीताप्रेस और गीतावाटिका में वेदों और उपनिषदों का अध्ययन शुरू किया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघाचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के माध्यम से अशोक सिंघल का संघ के साथ संबंध आया और वर्ष 1942 से स्थानीय ‘भारद्वाज शाखा’ जाने लगे । प्रो. राजेन्द्र सिंह के निर्देश पर वें श्री गुरू जी से मिलने नागपुर चले गए । गुरू जी से मिलने के बाद तो उन्होंने पीछे मुडकर ही नही देखा । रज्जू भैया और अशोक सिंघल, दोनों के पिता प्रशासनिक अधिकारी थे और इलाहाबाद में अगल – बगल में दोनों का घर होने के कारण पारिवारिक संबंध बहुत प्रगाढ था । 1949 में संघ पर प्रतिबन्ध लगने के कारण वें जेल भी गए । भानुप्रताप शुक्ल के पूछने पर संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरू जी ने एक बार कहा था कि संघ के कार्य को बढाने वाले नई पीढी में बहुत लोग हैं, उन लोगों में से नई पीढी में कानपुर के अशोक सिंघल भी हैं । कालांतर में अशोक सिंघल संघ के प्रचारक बने और लगभग 25 वर्ष तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रचारक के नाते संघ का कार्य किया । बाद में वें देहरादून, हरिद्वार और उत्तरकाशी में भी प्रचारक रहे । दूसरे शब्दों में, पहले उन्हें साधु – संतों का सान्निध्य प्राप्त करने का सौभाग्य मिला और 70 के दशक में अशोक सिंघल ने जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया । 1975 में देश में आपातकाल लगाया गया और 1977 में जब आपातकाल देश पर से हटा तो अशोक सिंघल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत का प्रांत प्रचारक बनाया गया । दिल्ली प्रांत प्रचारक होने के कारण 1977 में जनता पार्टी के गठन में पर्दे के पीछे उनकी बडी भूमिका थी । इमरजेंसी के दौरान वें भूमिगत हो गए थे । इमेरजेंसी खत्म होने के बाद संघ की योजना से वें विश्व हिन्दू परिषद भेजे गए । कालांतर में अशोक सिंघल वर्ष 1981 में 5 – 6 लाख की संख्या वाले विराट हिन्दू समाज के कार्यक्रम के संचालक के रूप में सार्वजनिक मंच पर वे पहली बार सामने आये । सन 1982 में वें विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री का दायित्व उन्होनें संभाला । वर्ष 1986 में विहिप के महामंत्री का दायित्व संभाला । तत्पश्चात विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष बने और लंबे समय तक वें अध्यक्ष बने रहे । स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष पद छोड दिया और विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक के रूप में अजीवन मार्गदर्शन करते रहे ।

अशोक सिंघल के कारण देश में ‘रामजन्मभूमि’ एक ऐसा विषय बन गया जिसने केन्द्र सरकार तक को प्रभावित किया । विश्व हिन्दू परिषद द्वारा चलाये जा रहे हिन्दू समाज के जागरण का अभियान 25 सितम्बर, 1990 को और तीव्र हो गया क्योंकि इस दिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा लेकर निकले और जनता को श्रीराम मन्दिर जीर्णोद्धार का महत्व तथा छद्म पंथनिरपेक्षता का अर्थ समझाने लगे । जिसके कारण आडवाणी की रथयात्रा से कांग्रेस के वोट का गणित बुरी तरह बिगड गया । कालांतर में अयोध्या में घटित 30 अक्टूबर से 2 नवम्बर, 1990 की घटना का साक्षी रहे भानुप्रताप शुक्ल ने लिखा था कि इतिहास और हम साथ – साथ चल रहे थे । हम मौन थे किंतु इतिहास मुखर था । विश्व हिन्दू परिषद द्वारा घोषित कारसेवा को मुलायम सिंह यादव द्वारा नही करने देने की घोषणा से दुनिया भर के लोगों की निगाहें अयोध्या पर आ टिकी थी । 29 अक्टूबर की देर रात्रि तक अयोध्या में कोई हलचल नही थी । चारों तरफ मुलायम सिंह यादव की चौकसी की वाहवाही हो रही थी । 30 अक्टूबर की प्रात: 9 बजकर 10 मिनट पर मणिराम छवनी का सिंहद्वार खुला । अशोक सिंघल मात्र तीन – चार लोगों के साथ प्रसन्न मुद्रा में निकले । चारों तरफ सन्नाटा था । समय ने सांस रोक लिया और मानों कहने लगा कि हे राम ! क्या अकेले अशोक सिंघल ही कारसेवा करेगें कि अचानक एक साथ लाखों कारसेवक अयोध्या के घरों से निकल कर एक साथ प्रकट हो गए और रामजन्मभूमि की तरफ निकल पडे । प्रशासन के हाथ – पैर फूल गए और मुलायम सिंह की घोषणा ‘परिन्दा भी पर नही मार सकता’ धरी की धरी रह गई । इस प्रकार के प्रबन्धन कला में निपुण थे हिन्दुत्व पुरोधा अशोक सिंघल । रामजन्मभूमि पर भव्य मन्दिर देखने की ललक के चलते उन्होने प्रशासन की गोली सहन किया पर टस से मस न हुए और ‘राम काज करिबे को आतुर’ की अपनी धुन में लगे रहे । 2 नवम्बर 1990 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा रामभक्तों पर गोलियाँ चलवाकर सैकडो रामभक्तों को मौत के घाट उतार दिया गया ।

4 अप्रैल 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति हेतु ऐतिहासिक जनसभा हुई । विश्व हिन्दू परिषद और श्रीराम कारसेवा समिति के तत्वाधान में दिल्ली के बोट क्लब पर हुए जनसमागम को इतिहास कभी नही भूल पायेगा । इस जनसमागम में जो भीड उमडी उसने भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों को आश्चर्यचकित कर दिया । देश भर के जनमानस को विश्व हिन्दू परिषद जगाता रहा । 6 दिसंबर 1992, के उस काल को कभी कोई नही भूल सकता । यही वही दिन था जिस दिन रामभक्तों ने अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचे को गिरा दिया था । भानुप्रताप शुक्ल के साथ बैठे अशोक सिंघल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि रामजन्मभूमि आन्दोलन छोटे स्तर पर भी खत्म हो सकता था परंतु इसका दायरा बढ्ता ही गया । जब लखनऊ तक यात्रा हो गई तबतक श्रीमती इन्दिरा गांधी का देहवासान हो गया और शासन में नयी सरकार आ गई थी । वर्ष 1986 में जब ताला खुला तब बाबू जी (उनके गुरूदेव) चले गये । फिर केन्द्र की और उत्तरप्रदेश की सरकार गिरी । संतो का कहना था कि या तो सरकार झुके या हटे । कालांतर में सरकार हट गई । हम नयी सरकार में राम – रथ निकाल रहे थे इसका भी निषेध हो सकता था । इसे दैवेच्छा ही कहेगें कि उसी समय शाहबानों प्रकरण भी पूरे देश में उठ गया । इसके कारण देश के मुसलमानों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया । प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू समाज भी जागृत हुआ । कांग्रेस में भी प्रतिक्रिया हुई । उसी समय ‘राम जानकी रथ’ भी निकल रहा था । कांग्रेसी भी चाहते थे कि मुसलमान आगे बढ रहें हैं तो रथ भी आगे बढे । वीर बहादुर के मन में प्रेरणा जगी कि ताला कैसे खुले ? और फिर उसे न्यायालय के आदेश से खुलवाया । इतने में कुंभ का समय आ गया । कुंभ में एक स्थान पर संत – शक्ति एकत्रित हुई । शिलान्यास की तिथि निश्चित की गई । शिलापूजन का कार्यक्रम बना । शिलान्यास पूर्व ही चुनाव घोषणा हो चुकी थी । शिलापूजन का कार्यक्रम का प्रभावचुनाव पर भी पडा और केन्द्र में सरकार बदल गई । उसी काल में टेलिविजन पर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे कार्यक्रम का प्रसारण किया जाने लगा और हमारे रथों का उत्तरप्रदेश व बिहार के आंचलों में घूमना, यह सब ‘दैवेच्छा’ ही थी । रामजन्मभूमि आन्दोलन में ‘रामायण’ सीरियल की बहुत बडी भूमिका है । इस सीरियल का प्रभाव नवयुवकों पर बहुत अधिक पडा और बहुत हद तक उसी में से बजरंग दल निकलकर आया । भारतीय राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ कि कालांतर में भारतीय जनता पार्टी ने जिस उम्मीदवार को सपोर्ट किया वह जीत गया । बोफोर्स घोटला कोई मुद्दा नही था अपितु रामजन्मभूमि मुद्दा था । कालांतर में जिसका लाभ विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी मिला । मंडल – कमंडल की राजनीति के कारण लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली । रामजन्मभूमि का छोटा – सा विषय आज राष्ट्र की पूरी राजनीति को परिवर्तन दे रहा है । अशोक सिंघल स्पष्ट रूप से मानते थे कि यदि राजीव गांधी की मृत्यु न हुई होती तो परिणाम और अच्छे हुए होते ।

यह सच है कि राममन्दिर पहले विश्व हिन्दू परिषद के एजेंडे में नही था । ऐसा कहा भी जाता है कि 1980 में जब अशोक सिंघल ने राममन्दिर की मांग को लेकर दिल्ली में अपनी पहली प्रेसवार्ता की तो विहिप का लेटर हेड भी उन्होंने उपयोग नही किया । दूसरे शब्दों में, राममन्दिर का विषय सीधे उनके हृदय से जुडा था । राममन्दिर का विषय सीधे उनके हृदय से जुडा होने के कारण उन्होंने कभी उसपर समझौता नही किया । यही कारण है कि अशोक सिंघल राजग – 1 के समय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोलने से भी पीछे नही हटे । यह बहुत कम लोग ही जानते होगें या यूँ कहें कि अशोक सिंघल के इस पहलू के बारें में बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि उन्होने हिन्दू समाज में व्याप्त बुराईयों को खत्म करने का बीडा उठया । इसका पहला उदाहरण सार्वजनिक रूप से 1986 में अयोध्या में घटी हमें उस घटना से पता चलता है जब शिलापूजन के कार्यक्रम में कामेश्वर नामक दलित व्यक्ति से पहली ईंट रखवाया । देश के लगभग दो सौ से अधिक मन्दिरों के पुजारियों को दलित परिवार के बच्चों को बनाया । इसके लिए अशोक सिंघल ने बकायदा वेद पाठशालाएं खोली और वेद अध्य्यन के पश्चात उन बच्चों को दीक्षित करने कार्य स्वयं शंकराचार्य द्वारा किया जाता है । पूर्वोत्तर भारत समेत देश के दूसरे भागों में लाखों की संख्या में एकल विद्यालय खुलवाकर ईसाई मिशनरियों के षडयंत्र पर रोक लगा दिया ।

1996 में जब अमरनाथ यात्रा पर संकट आया तो अशोक सिंघल के आह्वान पर बजरंग दल ने अमरनाथ यात्रा को सुचारू रूप से चलाया । 2005 में जब बूढा अमरनाथ यात्रा पर आतंकवादियों के कारण संकट आया तो अशोक सिंघल के आहवान पर बजरंग दल ने पुन: इस यात्रा को सफलता पूर्वक चलाया । केन्द्र सरकार द्वारा रामसेतु को तोडने के मसौदे को ध्वस्त करने हेतु दिल्ली में अशोक सिंघल के नेतृत्व में विशाल रैली किया गया और इस रैली का प्रभाव यह हुआ कि केन्द्र सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पडा । वर्ष 2013 में जब तत्त्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने ‘भगवा आतंकवाद’ कहकर संबोधन किया तो वह अशोक सिंघल ही थे जिन्होने सर्वप्रथम गृहमंत्री को ललकारा और कालांतर में उन्हें शब्द वापस लेने पर विवश होना पडा । अयोध्या में भव्य राममन्दिर निर्माण को लेकर 30 मई 2013 को अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी से भेंट किया और उसने आग्रह किया कि वें मुस्लिम समुदाय को समझाएँ कि मुस्लिम समुदाय अपनी उस बात को मानें जिसमे उसने कहा था कि यदि वहां कोई मन्दिर होना सिद्ध होता है तो मुस्लिम समुदाय अपना दावा छोडकर शांतिपूर्वक मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा । जनजागरण करने हेतु अशोक सिंघल ने अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा कार्यक्रम किया जिसमें उत्तरप्रदेश प्रशासन के अहंकार के चलते उन्होने अपनी गिरफ्तारी भी दिया । यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नरेन्द्र मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मेदवार बनाने को लेकर संघ और भाजपा में जब मतभेद हुआ तो अशोक सिंघल खुद आगे आए और फरवरी 2013 में इलाहाबाद के महाकुंभ में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित धर्मसंसद में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीद्वार बनाने हेतु संतो का समर्थन कर दिया । यह पहला अवसर था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघाचालक मोहनराव भागवत की उपस्थिति में संघ परिवार के किसी इतने बडे अधिकारी ने इस प्रकार की बात खुले मंच पर किया हो । उसके बाद तो अशोक सिंघल हर मंच पर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में प्रचार करने लगे और उनमें दैवीय शक्ति का आशीर्वाद होने की बात कहने लगे । कालांतर में नरेन्द्र मोदी जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उनके शपथ समारोह में अशोक सिंघल गए । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी उनकी यही आस थी सरदार पटेल द्वारा सोमनाथ मन्दिर निर्माण की तर्ज पर संसद से कानून बनवाकर राममन्दिर निर्माण के आडे आ रही वें सारी अडचन को दूर करेगें ।

आश्विन कृष्ण पंचमी संवत 1983 विक्रमी, 27 सितंबर 1926 ई. को माँ विद्यावती की कोख से जन्म लेने वाले अशोक सिंघल के पिता महावीर सिंह अलीगढ के बिजौली गाँव के थे । इस प्रकार एक जीवन, एक उद्देश्य को चरितार्थ करने वाले विश्व हिन्दू परिषद के 89 वर्षीय अशोक सिंघल का संपूर्ण जीवन अयोध्या में भगवान रामलला का भव्य मन्दिर देखने की अधूरी आस के साथ समाप्त हुआ । ऐसी दिव्य आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजली ।

मोदी के ब्रांड अंबेसडर ने ही मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया !

जनता ,नेता ,मंत्री दादरी के अखलाख को भूल गई लेकिन शहरुख याद हैं। सरकारें सुनपेड में दो दलित बच्चो को जिन्दा जलाने की घटना को भी भूल गई लेकिन आमिर खान पर सर फुट्टवल के लिये तैयार हैं। दादरी में अखलाख का परिवार अब क्या कर रहा है या फिर फरीदाबाद के सुनपेड गांव में उन दलित मां बाप की क्या हालत है जिनके दोनों बच्चे जिन्दा जला दिये गये, कोई नही जानता । लेकिन शहरुख की अगली फिल्म दिलवाले है। और आमिर खान की अगली फिल्म दंगल है। और इसकी जानकारी हर उस शख्स को है, जो मीडिया और सोशल मीडिया पर सहिष्णुता और असहिष्णुता की जुबानी जंग लड रहे हैं। लेकिन यह लोग अखलाख और सुनपेड गांव के दर्द को नहीं जानते। तो देश का दर्द यही है । शाहरुख और आमिर खान अपने हुनर और तकनीक के आसरे बाजार में बदलते देश में जितना हर घंटे कमा लेते है उतनी कमाई साल भर में भी अखलाख के परिवार और सुनपेड गांव के जीतेन्द्र कुमार की नहीं है। और कोई नहीं जानता कि अखलाख के परिवार का अपने ही गांव में जीना कितना मुहाल है और जीतेन्द्र कुमार को अब कोई सुरक्षा नहीं है जिसके आसरे वह स्वतंत्र होकर जिन्दगी जीता नजर आये।

लेकिन आमिर खान के घर के बाहर सुरक्षा पुख्ता है। यानी रईसों की जमात की प्रतिक्रिया पर क्या सड़क क्या संसद हर कोई प्रतिक्रिया देने को तैयार है लेकिन सामाजिक टकराव के दायरे में अगर देश में हर दिन एक हजार से ज्यादा परिवार अपने परिजनों को खो रहे है। और नेता मंत्री तो दूर पुलिस थाने तक हरकत में नहीं आ रहे है तो सवाल सीधा है । सवाल है कि क्या सत्ता के लिये देश की वह जनशक्ति कोई मायने नहीं रखती जो चकाचौंध भारत से दूर दो जून की रोटी के लिये संघर्ष कर रही है। इसीलिये जो आवाज विरोध या समर्थन की उठ रही है वह उसी असहिष्णुता के सवाल को कहीं ज्यादा पैना बना रही है, जो गरीबो को रोटी नहीं दे सकती और रईसों को खुलापन। असल में आर्थिक सुधार और बाजार अर्थव्यवस्था के रास्ते चलने के बाद बीते 25 बरस का सच यही है कि पूंजी ने देश की सीमा मिटाई है। पूंजी ने अपनी दुनिया बनायी है । और मनमोहन सिंह से लेकर नरेन्द्र मोदी तक उन्हीं गलियों में भारत का विकास खोज रहे है जो चकाचौंध से सराबोर है । इसीलिये सत्ता की महत्ता हथेलियो पर देश को चलाते 8 हजार परिवारो पर जा टिकी है, जिनके पास देश का 78 फीसदी संसाधन है। देश की नीतियां सिर्फ 12 करोड़ उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बनायी जा रही हैं। यानी देश में असहिष्णुता इस बात को लेकर नहीं है कि असमानता की लकीर मोटी होती जा रही है। कानून व्यवस्था सिर्फ ताकतवरों की सुरक्षा में खप रही है । किसान को राहत नहीं मिली। मजदूर के हाथ से रोजगार छिन गया। महंगाई ने जमाखोरों-कालाबारियो के पौ बारह कर दिये। यह सोचने की बात है कि अखलाख के परिवार की त्रासदी या सुनपेड में दलित का दर्द शाहरुख खान की आने वाली फिल्म दिलवाले या आमिर की फिल्म दंगल तले गुम हो चुकी होगी। तो मसला सिर्फ फिल्म का नही है सिस्टम और सरकारें भी कैसे किसी फिल्म की तर्ज पर काम करने लगी हैं महत्वपूर्ण यह भी है।

सरकारों के ब्रांड अंबेसडर कौन है और देश के आदर्श कौन हो जायेंगे। याद कीजिये मोदी प्रधानमंत्री बने तो पीएमओ हो या इंडियागेट दोनो जगहों पर आमिर खान को प्रधानमंत्री मोदी ने वक्त दिया । महत्ता दी। कभी कोई गरीब किसान मजदूर पीएमओ तक नहीं पहुंच पाता लेकिन आमिर खान के लिये पीएमओ का दरवाजा भी खुल जाता है और प्रधानमंत्री मोदी के पास मिलने का वक्त भी निकल आता है । लेकिन आमिर खान ने कुछ इस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के दौर को ही कटघरे में खडा कर दिया जो बीजेपी पचा नही पा रही है और मोदी सरकार निगल नहीं पा रही है।

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी और मोदी सरकार के मंत्री भी जिस तेजी से निकल कर आमिर खान को खारिज करने आये उतनी तेजी कभी किसी असहिष्णु होते नेता मंत्री के बयान पर नहीं दिखायी दी। ना ही अखलाख की हत्या पर कोई इतनी तेजी से जागा। तो क्या देश जुबानी जंग में जा उलझा है या फिर विकास के उस चकाचौंध में उलझा है जहां मान लिया गया है कि सत्ता के ब्रांड अंबेसडर रईस ही होते हैं। सत्ता रईसों के चोचलों से ही घबराती है। रईसों के साम्राज्य में कोई सत्ता सेंध नहीं लगा सकती । इसीलिये अर्से बाद संसद भी उसी तर्ज पर जाग रही है जिसमें असहिष्णुता के सवाल पर नोटिस देकर विपक्ष दो दिन बाद से शुरु हो रहे संसद के तत्कालीन सत्र में बहस चाहता है। यानी सवाल वही है कि असहिष्णुता के सामने अब हर सवाल छोटा है। चाहे वह महंगी होती दाल का हो । या फिर आईएस के संकट का । बढ़ती बेरोजगारी का है या फिर नेपाल में चीन की शिरकत का । यकीनन दिल किसी का नहीं मानेगा कि भारत में सत्ता बदलने के बाद सत्ता की असहिष्णुता इतनी बढ़ चुकी है कि देश में रहे कि ना रहे यह सवाल हर जहन में उठने लगा है। लेकिन जब देश के हालात को सच की जमीन पर परखे तो दिल यह जरुर मानेगा कि देश गरीब और रईसो में बंटा हुआ है । गरीब नागरिक वह है जो सत्ता के पैकेज पर निर्भर है और रईस नागरिक वह है जिसपर सरकार की साख जा टिकी है और उसी के लिये विकास का टंटा हर सत्ता चकाचौंध के साथ बनाने में व्यस्त है । इसलिये देश के हालात को लेकर जब देश का गरीब सत्ता से कोई सवाल करता है तो वह किसी के कान तक नहीं पहुंचता लेकिन जैसे ही चकाचौंध में खोया रईस सत्ता पर सवाल दागता है तो सरकार में बेचैनी बढ़ जाती है । ध्यान दें तो मोदी सरकार के ब्रांड अंबेसडर वही चेहरे बने जिनमें से अधिकतर की जिन्दगी में एक पांव देश में तो दूसरा पांव विदेश में ही रहता है । और संयोग से आमिर खान को भी मोदी सरकार का ब्रांड अंबेसडर बनने का मौका भी मिला और इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के साथ आमिर खान की गुफ्तगु हर किसी ने देखी समझी भी । तो क्या मोदी सरकार का दिल इसीलिये नहीं मान रहा है जिन्हे अपना बनाया वही पराये हो गये । मगर आखिरी सवाल यही है कि रास्ता है किधर और हालात लगातार बिगड़ क्यों रहे है । क्या देश उन परिस्थितियो के लिये तैयार नहीं है जहां मीडिया बिजनेस बन कर देश को ही ललकारते हुये नजर आये। और सोशल मीडिया कही ज्यादा प्रतिक्रियावादी हो चला है, जहां हर हाथ में खुद को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने का हथियार है। और हर रास्ता चुनावी जीत-हार पर जा टिका है । जहां मान लिया जा रहा है कि जुनावी जीत सत्ता को संविधान से परे समूची ताकत दे देता है । यानी तीसरी दुनिया के भारत सरीखे देश को एक साथ दो जून की रोटी से भी जूझना है और चंद लोगो के खुलेपन की सोच से भी।

(लेखक के ब्लॉग से साभार)

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