खबर पसंद न आए तो नेताओं और दर्शकों के निशाने पर सबसे पहले न्यूज एंकर ही रहते हैं। न्यूज एंकरों पर दवाब बनाने के लिए कानूनी दावपेंच के साथ-साथ कवरेज के दौरान हूटिंग, नारेबाजी, ठेलम – ठेली और बैनर पोस्टर पर अभद्र टिप्पणी आदि का सहारा भी लिया जाता है।
लंबे समय से चले आ रहे किसान आंदोलन के दौरान भी कुछ ऐसा ही दिखायी दे रहा है। किसान नेताओं को जिनकी खबर पसंद आ रही है, उनका स्वागत किया जा रहा है और जिनकी खबर पसंद नहीं आ रही, उनका तिरस्कार किया जा रहा है। मसलन आजतक की प्रमुख एंकर चित्रा त्रिपाठी जब मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत की कवरेज करने गयी तो भीड़तंत्र ने उन्हें उस जगह को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। एंकरों के साथ इस तरह के मसले हाल में काफी बढ़े हैं। इसी तरह का एक और दिलचस्प मामला और देखने को मिला जिसे मीडिया खबर के एक पाठक ने हमारे पास भेजा है।
यह एक पोस्टर है जो किसान रैली (उत्तरप्रदेश) का है। इसमें देश के कई नामी एंकरों पर छींटाकशी की गई है और उनकी नंबरिंग डॉग नंबर-1, डॉग नंबर-2 आदि से की गई है। इस नंबरिंग में जी हिंदुस्तान के एंकर (पूर्व) सरफराज सैफी को डॉग नंबर1 तो रिपब्लिक भारत के अर्नब गोस्वामी को डॉग नंबर2, जी न्यूज के सुधीर चौधरी को डॉग नंबर3 और इंडिया टीवी के मशहूर एंकर और वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा को डॉग नंबर4 बताया गया है। पोस्टर से भी मन नहीं भरा तो कुछ लोगों ने पोस्टर पर जूते भी चलाए और एंकरों को मोदी का दलाल, कुत्ते और न जाने क्या – क्या कहा!
वह रामभक्त है मगर उन्हें ईश्वर नहीं, महापुरुष मानता है। वह हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रेमी है मगर उसकी कमियों से आँखें नहीं चुराता। वह हिंदूवादी है मगर मुस्लिम-द्वेषी नहीं है। मेरे मन में भक्तों और राष्ट्रवादियों की जो छवि थी, वह उससे थोड़ा अलग है। पाँच-छह साल पहले जब पहली बार मेरा उसका सामना हुआ तो मैं संपादक-नियोक्ता की कुर्सी पर बैठा हुआ था और वह उम्मीदवार की कुर्सी पर। जहाँ तक मुझे याद है, उसने अपने माथे पर टीका लगाया हुआ था। इंटरव्यू में भी वह मुझे घोर परंपरावादी लगा।
पहली नज़र में उसने मुझे विकर्षित ही किया। लेकिन जिन 50-60 उम्मीदवारों की कॉपियाँ मैंने और मेरे साथी ने देखी थी, उनमें इसकी कॉपी सबसे अच्छी थी। मैं किसी योग्य उम्मीदवार को केवल इसलिए नहीं छाँट सकता था कि उसकी विचारधारा मुझसे नहीं मिलती थी। अगर ऐसा होता तो मैं भी 1985 में नवभारत टाइम्स में नहीं आ पाता क्योंकि मेरी और तत्कालीन प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर की विचारधारा बहुत अलग थी।
वह हमारी टीम में शामिल हुआ। मेरी टीम में कई लड़के-लड़कियाँ आधुनिक और सेक्युलर विचारधारा के थे। उसका उनसे अकसर वैचारिक टकराव होता लेकिन उस टकराव ने कभी कोई भद्दी शक्ल नहीं ली। हाँ, कई बार वह इस बात से दुखी हो जाता कि कुछ साथी उसका मज़ाक उड़ाते हैं।
उसके लिखे किसी लेख पर मैं आपत्ति करता तो वह कहता, आपको जो ग़लत लगे, वह निकाल दें। मुझे यह सही नहीं लगता। लगता जैसे मैं सेंसरशिप कर रहा हूँ। मैं चाहता था कि वह समझे कि मैं क्यों और किस बात पर एतराज़ कर रहा हूँ। हम दोनों में लंबी चर्चा होती, कुछ तो घंटे से भी ज़्यादा लंबी चलतीं। वह चुपचाप सुनता रहता और अंत में हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते और उसका लेख हलके-फुलके परिवर्तन के साथ स्वीकार हो जाता।
कई बार मुझे संदेह होता कि उसकी यह विनयशीलता स्वाभाविक है या ओढ़ी हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं संपादक हूँ, इसीलिए वह इस तरह पेश आता है। लेकिन जब मैं रिटायर हो गया, उसके बाद भी उसके फ़ोन बराबर आते रहे। जब वह कोई भंडाफोड़ करने वाली स्टोरी करता तो मुझे बताता। मुझे ख़ुशी होती और हैरानी भी कि एबीवीपी का सदस्य रह चुकने और बीजेपी का समर्थक होने के बाद भी वह राज्य की योगी सरकार की कलई खोलने में ज़रा भी पीछे नहीं रहता।
लेकिन उसकी यह ईमानदार पत्रकारिता लंबे समय तक नहीं चल पाई। यूपी सरकार उसके पीछे पड़ गई। संपादक को लगातार फ़ोन आने लगे और अपनी निष्ठा के कारण या सरकारी दबाव के चलते संपादक ने इसे रिपोर्टिंग करने से रोक दिया। कल पता चला, उसकी नवभारतटाइम्स.कॉम से विदाई कर दी गई।
कल बातचीत के दौरान वह बहुत उदास था। परसों उसे कहा गया कि लखनऊ छोड़कर नोएडा आ जाए जो उसके लिए संभव नहीं था। वह अपने उन बूढ़े दादा-दादी को अकेला छोड़कर नहीं आ सकता था जिन्होंने उसे बचपन से पाला-पोसा और संस्कार दिए। नतीजतन उसके सामने इस्तीफ़ा देने के अलावा कोई चारा नहीं था। इस्तीफा चौबीस घंटों के अंदर ही मंज़ूर हो गया।
उसके दुश्मन केवल सरकार में नहीं थे, अख़बार में भी थे। कुछ दिन पहले उसने एक ठेकेदार को रंगे हाथों पकड़ा था जो अपनी गाड़ी पर नगर निगम का बोर्ड लगाकर घूम रहा था। जब इसने उसकी कार का विडियो लिया और उस बंदे से सवाल-जवाब किया तो उसने झूठ बोला कि वह नगर निगम का कर्मचारी है। साथ ही उसने अख़बार के संपादक का हवाला भी दिया कि वह उनके परिचित हैं। उनसे फ़ोन पर बात भी करवाई। संपादक जी ने इससे कहा कि यह व्यक्ति हमारा सोर्स है और इसपर स्टोरी नहीं करें। वह स्टोरी नहीं हुई लेकिन वह घटना संभवतः ताबूत की अंतिम कील साबित हुई।
मैंने उससे पूछा, आगे क्या करोगे? उसने कहा, कुछ सोचा नहीं है। लेकिन इतना तय है कि दलाली नहीं करेंगे। रूँधे गले से वह बोला, सर, पीसीएस की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता करने आए थे। अगर ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं कर पाए तो पत्रकारिता ही छोड़ देंगे।
(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के पूर्व संपादक नीरेंद्र नागर के सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल से साभार)
अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांत नंगरहार में हुई गोलीबारी में एक पत्रकार समेत कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई। एक सुरक्षा सूत्र ने समाचार एजेंसी सिन्हुआ को बताया, “पत्रकार और लेखक सैय्यद मरोफ सआदत अपने रिश्तेदारों के साथ शनिवार शाम जलालाबाद शहर के पुलिस जिला 5 में सड़क के किनारे एक पालकी में यात्रा कर रहे थे, जब एक रिक्शा में सवार बंदूकधारियों ने उन पर गोलियां चला दीं।”
सूत्र ने बताया कि गोली लगने से सआदत का बेटा और वाहन का चालक घायल हो गया।
एक स्वतंत्र अफगान मीडिया समूह अफगान पत्रकार सुरक्षा समिति (एजेएससी) ने हत्या की निंदा की है।
सूत्र के मुताबिक, अभी तक किसी समूह ने गोलीबारी की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन तालिबान अधिकारी मामले की जांच कर रहे हैं।
अगस्त के मध्य में तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद से, कम से कम 10 लोग मारे गए हैं और कई अन्य घायल हुए हैं।
शनिवार का हमला परवान प्रांत के प्रांतीय केंद्र चरिकर शहर में शुक्रवार को हुए विस्फोट के एक दिन बाद हुआ है।
टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद के उप प्रमुख बिलाल करीमी ने कहा कि विस्फोट के बाद सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे और तलाशी अभियान शुरू किया, जिसके दौरान इस्लामिक स्टेट (आईएस) आतंकवादी समूह का एक ठिकाना खोजा गया।
करीमी ने कहा कि ठिकाने पर मौजूद आईएस के कुछ लड़ाके मारे गए, जबकि कुछ अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि तलाशी अभियान के दौरान हुए एक विस्फोट में तालिबान बलों के तीन से पांच सदस्य घायल हो गए।
नोएडा फिल्म सिटी से नए हिंदी न्यूज़ चैनल ” न्यूज़ इंडिया ” की लॉन्चिंग की तैयारी जोरों पर है। इसी कड़ी में एडिटोरियल डायरेक्टर मनीष अवस्थी का प्रोमो जारी किया गया है। इस प्रोमो को देखने के बाद एक बात तो तय है कि ” न्यूज़ इंडिया ” की टीम बाजार में अपने पैर ज़माने के लिए कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ रही है। न्यूज़ इंडिया की बड़ी और मज़बूत टीम हर मोर्चे पर कुछ नए प्रयोग कर रही है, एक नया एहसास पैदा कर रही है।
न्यूज़ इंडिया में महत्वपूर्ण भूमिका संभाल रहे मैनेजिंग एडिटर पशुपति शर्मा और और न्यूज़ इंडिया की कोर टीम के द्वारा शुरु की गई सीरीज ” हम न्यूज़ इंडिया के लोग ” को भी सोशल मीडिया पर बेहद पसंद किया जा रहा है। किसी मीडिया संस्थान में होने वाला ये अपने आप में अलग तरह का और पहला प्रयोग है और कई नए प्रोयोग किये जा रहे है। न्यूज़ इंडिया में पर्दे के पीछे एक बड़ी और मज़बूत टीम काम कर रही है। इसके अलावा कुछ और बड़े नाम चैनल के साथ जुड़ रहे हैं, जो लॉन्चिंग के वक़्त सामने आएंगे।
‘हम न्यूज़ इंडिया के लोग’ सीरीज में चैनल के एंकर्स, प्रोड्यूसर, रिपोर्टर के प्रोमो बने और खूब सराहे गए। अब इसी सीरीज में अब एडिटोरियल डायरेक्टर मनीष अवस्थी का प्रोमो उनकी प्रोफेशनल और पर्सनल यात्रा को बयां कर रहा है।
आपको बता दें कि मूल रूप से नागपुर (महाराष्ट्र) के रहने वाले मनीष अवस्थी को पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने का करीब 27 साल का अनुभव है। मनीष अवस्थी ‘आईटीवी नेटवर्क’ में करीब नौ साल से कार्यरत थे और बतौर सीनियर एंकर/चीफ पॉलिटिकल एडिटर अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे। ‘आईटीवी नेटवर्क’ के सबसे बड़े शो ‘देश का सवाल’ की जिम्मेदारी भी मनीष अवस्थी ही संभालते थे। हाल ही में उन्होंने ‘आईटीवी नेटवर्क’ से इस्तीफा देकर न्यूज़ इंडिया ज्वाइन किया है। इस पारी मे आपके सामने कई नई चुनौतियां हैं।
न्यूज एंकरिंग (News Anchoring) की दुनिया में निशांत चतुर्वेदी (Nishant Chaturvedi) का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. आजकल टीवी – 9 (TV9) में कार्यरत हैं.
इसके पहले उन्होंने आजतक (Aajtak) में लम्बे समय तक काम किया और कई तरह के यादगार शो किए.
उसके पहले न्यूज एक्सप्रेस (News Express) समाचार चैनल (News Channel) के चैनल प्रमुख (Chanel Head) के तौर पर भी वे काम कर चुके हैं. देखिये उनकी कुछ ख़ास तस्वीरें –