न्यूज़ एंकरों से कोई पूछे कि क्या बने रहे…(उल्लू!) : ओम थानवी

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हिरेन्द्र झा, सहायक संपादक, आधी आबादी

यादों में आलोक…

यादों में आलोक - पत्रकारिता में मर्यादा
यादों में आलोक – पत्रकारिता में मर्यादा

20 मार्च, गुरुवार शाम मीडिया के तमाम दिग्गज कांस्टीट्यूशन क्लब के एनेक्सी सभागार में एकत्रित थे। मौका था विख्यात पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर की तीसरी पुण्यतिथि का। पत्रकारिता के इतिहास में जिन्होंने भी अपना निशान छोड़ा उन्हें लिखने में महारत हासिल थी! आप जितने भी नाम याद कर लें आप पाएंगे कि सभी सफल नाम अपनी कलम के धनी रहे हैं। इसी फेहरिस्त में एक रौशन नाम है आलोक तोमर का।

एनेक्सी सभागार का मुख्यद्वार सफ़ेद फूलों की मालाओं से सुस्सजित हर आने वाले के मन में आलोक तोमर की यादों की खुशबूभर रहा था। बनज कुमार बनज का एक दोहा है कि – ‘बीच सफ़र से चल दिया ऐसे मेरा ख्वाब , आधी पढ़ कर छोड़ दे जैसे कोई किताब! ’ ठीक मंच के नीचे गुलाबी पंखुरियों के बीच आलोक तोमर की भव्य तस्वीर देख कर शायद यही पंक्तियाँ हर किसी के ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रही थी! ठीक इसी दिन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह की भी मृत्य की खबर आयी। कार्यक्रम की शुरुआत खुशवंत सिंह को दो मिनट मौन श्रद्धांजलि देने के बाद की गयी।

इस मौके पर ‘पत्रकारिता में मर्यादा’ विषय पर एक विमर्श का आयोजन किया गया था। वक्ताओं में मुख्य रूप से अशोक वाजपेयी, आनंद प्रधान, ओम थानवी, केसी त्यागी, दीपक चौरसिया, राजेश बादल, राजीव मिश्र, राहुल देव रहे, संक्षेप में अपनी बात संतोष भारतीय ने भी रखी, कार्यक्रम का संचालन  शम्भुनाथ शुक्ल ने किया।

कहीं न कहीं इस विमर्श में भाषा की मर्यादा, राजनीतिक पक्षधरता, एंकर की मर्यादा, निर्णयात्मक पत्रकारिता जैसे विषयों के बहाने आलोक तोमर की प्रासंगिकता को टटोलने की कोशिश की गयी।

अशोक वाजपेयी अपने चिरपरिचित अंदाज़ में मीडिया की भाषा पर बोलते हुए कहा कि आज जो अखबार प्रकाशित हो रहे हैं उनकी भाषा न तो हिंदी है, न अंग्रेजी ही और न ही हिंग्लिश। उसके लिए कोई नया शब्द तलाशना होगा और ये सिर्फ दिल्ली का हाल नहीं है बल्कि हर जगह यही हो रहा है! सीएम , पीएम जैसे शब्दों पर भी उन्होंने चुटकी ली! उन्होंने अपने दौर को याद करते हुए बताया कि कैसे उस समय अखबार में सम्पादक के नाम चिट्टी प्रकाशित हो जाना भी बड़ी बात हुआ करती थी और उनकी लिखी एक ख़त की भाषा और शैली के आधार पर उन्हें बाद में उस अखबार से एक असाइनमेंट भी मिला। भाषा के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम बाहरी लोग हैं इसलिए भाषा सुधारने का जिम्मा मीडिया पर ही है, वर्ना बिगाड़ तो वो रही ही है!

राजेश बादल ने इस बात पर चिंता जतायी कि आज नए लोग पढ़ते नहीं हैं इसलिए उनकी भाषा कमजोर रहती है। उन्होंने बताया कि जबसे राज्य सभा टीवी में पढ़ने का संस्कार विकसित हुआ है तब से अच्छे परिणाम मिलने लगे हैं! अब उन्हें शायद ही किसी रिपोर्ट को दुबारा लिखने की ज़रूरत पड़ती है!

उन्होंने ये भी कहा कि जब कभी आलोक की बात होगी तो उनकी भाषा और शैली की बात होगी और जब हम पत्रकारिता की भाषा पर बात करेंगे तो आलोक तोमर का जिक्र ज़रुर आएगा!

उन्होंने प्रस्ताव दिया कि आलोक की याद में भाषा के लिए अगर कोई काम किया जाए तो वे अपना योगदान ज़रूर देंगे। साल में सिर्फ एक दिन आलोक और उनकी भाषा पर बात करके कुछ हासिल नहीं हो सकता।

जनसत्ता संपादक ओम थानवी जी ने भाषा के सवाल पर प्रभास जोशी को याद करते हुए कहा कि वो भाषा के साथ खेलते थे और वो ऐसा इसलिए कर पाते थे क्योंकि भाषा पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी। उन्होंने वो भाषा अर्जित की थी। मिसाल के लिए उन्होंने कहा कि गांधी लंगोट पहनते थे क्योंकि उन्होंने वो व्यक्तित्व अर्जित किया था। आज अगर कोई नेता लंगोट पहने तो हंसी आएगी क्योंकि उन्होंने वो आभमाण्डल अर्जित नहीं किया है। ठीक यही हाल भाषा के साथ है जब आप उस पर पकड़ मज़बूत बना लेते हैं तो आप उसके साथ खेल सकते हैं! प्रयोग कर सकते हैं!

उन्होंने न्यूज़ एंकर पर भी चुटकी ली कि कई बार समाचार पढ़ते हुए ब्रेक लेते समय वो कहते हैं कि आप बने रहिये हम लौटते हैं ब्रेक के बाद! उन्होंने सवाल किया कि क्या बने रहे? उल्लू बने रहे! तो ये बने रहे का प्रयोग थोडा अटपटा है! ये अंग्रेजी का नक़ल करने के चक्कर में गड़बड़ हो गयी है! स्टे विथ अस तो चल जाता है पर बने रहिये हास्यास्पद है! वैसे यहाँ भी वो अरविन्द केजरीवाल का नाम लिए बगैर ये कहना नहीं भूलें कि अगर कोई मीडिया समूह किसी राजनेता का बहिष्कार करता है तो ये गलत है। उन्होंने याद दिलाया कि 2005 में मनमोहन सिंह ने भी एक बार मीडिया को बहुत बुरा भला कहा था , उस समय तो किसी मीडिया समूह ने उनके बहिष्कार की बात नहीं की। उन्होंने इस बात की भी वक़ालत की कि ऐसा कोई नियामक बने जो मीडिया की भाषा तय करे , उसे समृद्ध करे, उस पर नज़र रखे!

राहुल देव तो भाषा पर बहुत काम करते ही रहते हैं तो यहाँ भी उन्होंने भाषा को लेकर संवेदनशील होने की बात कही। उन्होंने बताया कि कई ऐसे बड़े पत्रकार, सम्पादक हैं जो हिंदी बोलते हुए अंग्रेजी के कई शब्दों का बिना रोक टोक इस्तेमाल करते हैं । उन्होंने ऐसे शब्दों की एक लम्बी सूची भी बनायीं है। उन्होंने आक्रोश जताया कि चलन के नाम पर भाषा की गंगा को नाली के रूप में बदला जा रहा है!

इस मौके पर आलोक तोमर की याद में पहली बार भारतीय जनसंचार संस्थान (आई.आई.एम.सी) के पत्रकारिता के दो विद्यार्थियों को फेलोशिप भी दी गयी। फेलोशिप के तहत हिंदी पत्रकारिता के छात्र विवेकानंद सिंह और प्रसारण पत्रकारिता की छात्र मीना को इक्कीस हजार रूपये का चेक प्रदान किया गया। आनंद प्रधान ने इन छात्रों से सभी का परिचय कराया और बताया कि गरीबी रेखा की तरह एक मीडिया रेखा भी है जहाँ आज भी हासिये पर पड़े लोगों की बात कम ही की जाती है! इस फ़ेलोशिप का मकसद ऐसे विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना है जिनका उद्देश्य पत्रकारिता के सिद्धांतों को समृद्ध करना हो!

संसद सदस्य के सी त्यागी भी पत्रकारिता की मर्यादा पर अच्छा बोले। उन्होंने कहा कि उनके पेशे यानि कि राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि राजनीति की मर्यादा विषय पर बात ही नहीं हो सकती। उन्होंने बीते दौर की पत्रकारिता का स्मरण कराते हुए कहा कि एक दौर था जब पत्रकार किसी नेता से मिलकर निकलता तो अगल बगल देखता था कि कोई उसे देख तो नहीं रहा और आज वही पत्रकार नेता के घरों से निकलते हुए गर्व महसूस करता है। और लोग उन्हें बड़ा पत्रकार मानते हैं। उन्होंने उम्मीद जतायी कि प्रकृति अपना ये चक्र पूरा करेगी और हम फिर से वैसे पत्रकार देख सकेंगे! आलोक तोमर को याद करते हुए वो ये कहना नहीं भूलें कि मुझे याद नहीं कि आलोक के बाद कौन पत्रकार अपनी लेखनी की वजह से जेल गया है? हाँ दूसरे वजहों से ज़रूर गए होंगे!

संतोष भारतीय और दीपक चौरसिया भी पहुंचे उन्होंने भी अपनी-अपनी बात रखी , क्या कहा ठीक से सुन न पाया क्योंकि पत्रकारिता की मर्यादा विषय पर इनका भाषण भला क्या सुनता?

हिरेन्द्र झा,सहायक संपादक,आधी आबादी
हिरेन्द्र झा,सहायक संपादक,आधी आबादी

दो घंटे का समय कैसे गुज़रा पता ही न चला। कुल मिलाकर हम जैसे पत्रकारिता के छात्रों को इस शाम ने काफी समृद्ध किया। इस दौरान सुप्रिया रॉय अपने चेहरे पर मुस्कान सजाये हर आने-जाने वालों का अभिनन्दन करती रहीं। एसएन विनोद, आलोक रंजन, भास्कर भट्ट, जनार्दन यादव, नीरज , श्रवण शुक्ल आपसे मिलना भी सुखद रहा। चलते-चलते आलोक तोमर को एक शेर समर्पित करते हुए कहूंगा कि- ‘आखिरी चेहरा समझ कर ज़ेहन में रख लो मुझे, क्या पता फिर इस ज़मी पर आदमी पैदा न हो…’

हम जैसों की यादों में आलोक हमेशा रहेंगे!

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