अतिउत्साह और अदूरदर्शिता में मोदी सरकार ने विदेश नीति का बेड़ा गर्क कर दिया

नदीम एस अख्तर

तब भारत को अमेरिका से बचाने के लिए रूस ने अपने परमाणु हथियार तैनात कर दिए थे, आज भारत की धरती से अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा, रूस को धमकी दे रहे हैं.

नदीम एस अख्तर
नदीम एस अख्तर
अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा के हालिया भारत दौरे से भारत की अंतरराष्ट्रीय राजनीति को गहरा आघात लगा है और हो सकता है कि बहुत जल्द हम अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद दोस्त रूस को खो दें. ओबामा ने भारत की धरती पर आकर और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में रूस को यूक्रेन के मुद्दे पर हड़काया और भला-बुरा कहा. मोदी बगलें झांकते रहे.

मितरों ! ये भारतीय विदेश नीति का असामयिक और अदूरदर्शी प्रस्थान है. हमारी कई पीढ़ियों ने मिलकर रूस के साथ भारत के जो रिश्ते मजबूत किए थे, आपस में जो भरोसा बनाया था, अपने अतिउत्साह और अदूरदर्शिता में मोदी सरकार ने सबका बेड़ा गर्क कर दिया है. अगर हम अपने सबसे भरोसेमंद दोस्त रूस को खोते हैं तो ये भारत के लिए बड़ा झटका होगा. बहुत बड़ा.

अफसोस की बात है कि भारतीय मीडिया में इस खबर को तवज्जो नहीं मिली और ओबामा की यात्रा के दौरान पूरा माहौल ओबामामय-मोदीमय रहा. मुझे लगता है कि मोदी सरकार जिस तरह की विदेशनीति पर चल रही है, उससे जल्द ही भारतीय उपमहाद्वीप एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठने वाला है. एक नई गोलबंदी हो रही है.

खबर मिली है कि ओबामा की भारत यात्रा को counter करने के लिए पाकिस्तान अपने सालाना सैन्य परेड में उसके भरोसेमंद दोस्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को chief guest बनाकर बुला रहा है. मतलब कि एक तरफ पाकिस्तान-चीन और दूसरी तरफ भारत-अमेरिका. रूस जो अब तक भारत के साथ था, वो शायद अब भारत का वैसा साथ ना दे और नई गोलबंदी में हो सकता है कि वह पाकिस्तान के खेमे में चला जाए.

वैसे भी रूस के राष्ट्रपित ब्लादिमिर पुतिन केजीबी वाले हैं और भारत की धरती से रूस को दिए संदेश को वो कतई हल्के में नहीं लेंगे. ओबामा के साथ मिलकर मोदी ने जो किया है, वो वही बात हो गई कि दो पुराने दोस्तों के बीच एक ऐसा नया दोस्त आ गया है, जिसकी पहचान अब तक इनके अघोषित दुश्मन के रूप मे होती थी. ओबामा तो भारत की धरती से रूस को गरिया के अपना काम निकाल के जा चुके हैं. उन्होंने बहुत सफाई से दक्षिण एशिया की पॉलिटिक्स को अमेरिकी पक्ष में करने के लिए भारत का इस्तेमाल किया लेकिन हमारी सरकार उसे नहीं समझ पाई. हमारे पीएम और पूरा सरकारी अमला तो ये भी नहीं समझ पाया कि 26 जनवरी को जिन टैंकों और सैन्य विमानों की प्रदर्शनी हम अमेरिकी राष्ट्पति के सामने कर रहे थे, उनमें से ज्यादातर रूसी थी. वो हमें रूस से मिले थे. सो हमारी सरकार के इस बालपन पर ओबामा मन ही मन मुस्का रहे होंगे कि बेटा, अब तक तो रूस देता था, अब कौन देगा !!! हम तो देने से रहे और अब रूस को भी नहीं देने देंगे हथियार.

ओबामा ने भारत की सरजमीं से भारतीय प्रधानमंत्री के सामने रूस पर हमला करके एक नई जंग की शुरुआत कर दी है.अब हमारे natural ally रूस ना होकर अमेरिका और इजरायल होने जा रहे हैं. बाकी पाकिस्तान-चीन का एक खेमा पहले से हैं. संभावना-आशंका है कि रूस भी कहीं ना कहीं खुद को उसमें फिट करने की कोशिश करेगा. तो नई स्थिति ये बन रही है कि एक तरफ भारत-अमेरिका-इजरायल और यूरोप के कुछ देशों का समूह एक गुट के रूप में उभरकर सामने आ सकता है. वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान-चीन और उसमें टांग घुसाए रूस का एक दूसरा समूह. इसमें भारत की स्थिति बहुत बेपेंदी के लोटे वाली होने जा रही है क्योंकि अमेरिका कभी भी भारत के साथ comfortable नहीं रहा. वह आजादी के बाद से ही पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है और अमेरिकी सहानुभूति पाकिस्तान के साथ ही रही है. सो भारत एक तरफ जहां अपना भरोसेमंद दोस्त रूस को खो सकता है, वहीं दूसरी तरफ वह अमेरिका पर ठीक उसी तरह विश्वास नहीं कर सकता, जैसे चीन पर उसे भरोसा नहीं.

केन्द्र की बीजेपी वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने अतिउत्साह और अदूरदर्शिता में भारत की वर्षों से बनाई गई विदेश नीति की ऐसी की तैसी कर दी है. हम ये भूल रहे हैं कि जब अमेरिका ने 1971 में पाकिस्तान की मदद करने के लिए हिंद महासागर के आसपास परमाणु हथियारों से लैस अपना नौसेनिक जहाज USS ENTERPRISE तैनात कर दिया था और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का सीधा आदेश था कि जरूरत पड़ने पर भारत को सबक सिखाने के लिए उस पर सीधा हमला किया जाए. अमेरिका के साथ ब्रिटेन भी इस अभियान मे साथ था और तब भारत, पाकिस्तान से 1971 की जंग हारने के कगार पर था.

लेकिन ऐक मौके पर हमारी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अनुरोध पर रूस ने ऐसा कदम उठाया कि दुनिया भौंचक्क रह गई. रूस ने भारत के बचाव के लिए परमाणु हथियारों से लैस अपनी नौसेना का बेड़ा भेज दिया. रूस की इन परमाणु पनडुब्बियों और परमाणु हथियारों से लैस विमान को देखने के बाद ही अमेरिका-ब्रिटेन ने अपने कदम पीछे खींचे, वरना पाकिस्तान तो भारत को रौंदने वाला था. उस वक्त रूसी बेड़े की अगुवाई करने वाले Admiral Vladimir Kruglyakov ने बाद में दिए एक टीवी इंटरव्यू में जो कहा, वो दिल दहलाने वाला था. हो सके तो अंधभक्तों और मोदी सरकार को ये इंटरव्यू जरूर देखना और पढ़ना चाहिए. Admiral Vladimir के इंटरव्यू का एक अंश यहां दे रहा हूं—

“” Admiral Kruglyakov, who commanded the Pacific Fleet from 1970 to 1975, recalled that Moscow ordered the Russian ships to prevent the Americans and British from getting closer to “Indian military objects”. The genial Kruglyakov added: “The Chief Commander’s order was that our submarines should surface when the Americans appear. It was done to demonstrate to them that we had nuclear submarines in the Indian Ocean. So when our subs surfaced, they recognised us. In the way of the American Navy stood the Soviet cruisers, destroyers and atomic submarines equipped with anti-ship missiles. We encircled them and trained our missiles at the Enterprise. We blocked them and did not allow them to close in on Karachi, Chittagong or Dhaka.””

अब आप समझ गए होंगे कि भारत विदेश नीति के मोर्चे पर किस विस्फोटक स्तर पर जा पहुंचा है. अमेरिका ने हमें इतिहास में भी धोखा दिया है और आज भी देता रहता है. वो आज भी आतंकवाद से लड़ने के नाम पर पाकिस्तान को बिलियन डॉलर्स की खैरात देता है, हमारे कहने के बावजूद-उसके जानने के बावजूद कि पाकिस्तान कि धरती पर किस कदर आतंकवाद फल-फूल रहा है. सो अमेरिका हमारा स्वभाविक साथी कभी नहीं हो सकता. चीन-श्रीलंका-बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे दुश्मन भाव रखने वाले पड़ोसियों से घिरे होने के कारण भारत की स्थिति बहुत खराब हो जाती है. ऐसे में हमारे सबसे नजदीक और सबसे भरोसेमंद साथी रूस ही है, जिसकी ताकत के आगे हमारे ये दुश्मन पीछे हट जाते हैं, हटने को मजबूर होते रहे हैं…

लेकिन जिस तरह मोदी सरकार अमेरिका के साथ पींगे बढ़ा रही हैं, उससे ना सिर्फ रूस हमसे दूर होता जा रहा है, भारतीय उपमहाद्वीप में भारत अलग-थलग और अकेला पड़ता जा रहा है. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. मोदी चाहें तो रूस की तरफ दुबारा दोस्ती का पुराना वाला हाथ बढ़ा सकते हैं. पर DAMAGE तो हो चुका है. उसकी मरम्मत आसान नहीं होगी. पुतिन एक हार्डकोर राजनेता मानेजाते हैं और अगर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की धरती से रूस को धमकाए तो अंतरराष्ट्रीय जगत में इसके गहरे और उथल-पुथल वाले संकेत हैं.

अतिउत्साह से लबरेज भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी अगर ये समझ नहीं पा रहे हैं तो इससे देश का ही नुकसान होगा. कहीं वो वाली कहावत सच ना हो जाए कि —ना खुदा ही मिला और ना बिसाले सनम, ना इधर के रहे और ना उधर के !!!
संभल जाओ हिन्दोस्तां वालों !!!

(@FB – लिखना छोटा था, लम्बा लिख गया हूं. भाषा-मात्रा-व्याकरण की गलतियों के लिए माफी, अगर कहीं दिखे तो, अभी दुबारा पढ़ने की हिम्मत नहीं)

(लेखक IIMC में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं)

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