मीडिया से रंगबाजी,क्या ऐसा ही लोकतंत्र चाहते हैं केजरीवाल साहब?

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मनीष शर्मा,पत्रकार,एबीपी न्यूज़

ABP-REPORTER-KJरेल भवन के बाहर धरने के दूसरे दिन ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हार गए. हार की वजह ये नहीं है कि केजरीवाल को राजनीतिक रूप से हार मिली है. हार की वजह है कि केजरीवाल नैतिक रूप से ये लड़ाई हारे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए भी केजरीवाल ने आउट ऑफ द बॉक्स जाकर धरना दिया. मुद्दा था दिल्ली पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई. पहले दिन केजरीवाल को समर्थन मिलता नजर भी आया. रात भर उनके सड़क पर सोने से सहानुभूति भी बनी लेकिन फिर भी केजरीवाल हार गए.

आम आदमी पार्टी अगर आम लोगों की पार्टी है तो सिर्फ वो अपने वालियंटिर्स की पार्टी नहीं हो सकती. लेकिन जिस तरह पार्टी के नेताओं के बयान आ रहे हैं लग रहा है कि आम आदमी अब सिर्फ उनके कार्यकर्ता ही रह गए हैं. क्या वो लोग आम आदमी नहीं हैं जिन्हें मेट्रो में सफर करना था? क्या वो लोग आम आदमी नहीं हैं जिन्हें बैरिकेडिंग के कारण दिक्कत हो रही है. आम आदमी के लिए स्टेशन बंद हैं और बसों को डाइवर्ट किया गया है, इस परेशानी का जिम्मा केजरीवाल और उनकी रणनीति बनाने वाली टीम के सिर जाता है.

आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने मंत्रियों के साथ धरने पर बैठने वाले थे. यहां तक तो फिर भी ये विरोध प्रदर्शन था लेकिन आखिर कैसे और क्यों उन्हें अपना बाहुबल दिखाने के लिए भीड़ बुलाने की जरूरत पड़ गई. क्या केजरीवाल को लगता है कि अब उनकी बातों में असर नहीं रहा या उनका मुद्दा हल्का रह गया है. इससे पहले केजरीवाल भीड़ के लिए इतने परेशान होते नहीं देखा गया. अगर वो दस लोग ही धरने पर बैठे रहते तो क्या बात का वजन कम हो जाता?

दिन में कितनी बार रेल भवन के बाहर अराजकता का माहौल देखा गया. लोग बैरिकेड तोड़ रहे थे, कहीं पत्थर फेंके जा रहे थे. पुलिस आप कार्यकर्ताओं की पिटाई कर रही थी ना जाने कितने जख्मी हुई. सवाल ये है कि ऐसा माहौल क्यों बना. सवाल ये है कि केजरीवाल एंड टीम साबित क्या करना चाहती थी कहां जाना चाहती थी. कहां पहुंचना चाहती थी? उन्हें बात कहनी थी और पूरे देश का मीडिया उनकी बातों को कवर कर रहा था पूरा देश सुन रहा था. लेकिन इस उपद्रव की जरूरत क्या थी. जो लोग पिटे क्या उनके लिए सिर्फ दिल्ली पुलिस जिम्मेदार है? केजरीवाल साहब, आप और आपकी टीम यहां नेतृत्व देने में नाकाम रही है.

रेल भवन के सामने लोकतंत्र का हवाला देकर ही धरना दिया जा रहा है लेकिन रेल भवन के सामने लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जो बताती हैं कि आप के कार्यकर्ता अपने खिलाफ किसी आवाज को सुनना नहीं चाहते. ऐसी तमाम रिपोर्टों को रोका जा रहा है जो आप के खिलाफ हैं. एबीपी न्यूज की महिला पत्रकारों के साथ छीना झपटी हुई,उन्हें रिपोर्ट करने से रोका गया. क्या ऐसा ही लोकतंत्र चाहते हैं केजरीवाल साहब. महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाने वाले अगर महिलाओं के साथ बदसलूकी पर उतर आएं तो भगवान ही मालिक हैं.

मुख्यमंत्री जी, दिल्ली की 28 सीटों पर जनता ने आपके नुमाइंदे चुन कर भेजे हैं लेकिन आप पूरी दिल्ली के प्रतिनिधि हैं. दिल्ली के काम करना आपका लक्ष्य है ऐसा आप ही कहते हैं. दिल्ली की कानून-व्यवस्था के लिए दिल्ली पुलिस जिम्मेदार है ये आप पहले दिन ही संदेश दे चुके हैं. केंद्र सरकार पहले दिन हार गई थी जब उसने ना तो पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की बात मानी और ना ही तबादले की. लेकिन दूसरे दिन अपनी जिद पर अड़े रहकर आप भी जीते नहीं हैं.

दिल्ली की सुरक्षा सिर्फ पुलिस के हवाले नहीं हो सकती. दिल्ली की दर्जनों कॉलोनियां अपराध की पाठशाला बनी हुई हैं, जहां अशिक्षा और बेरोजगारी अपराध को बढ़ा रही हैं. जब तक इन कॉलोनियों में घुसकर माइंडसेट नहीं बदलेंगे अपराध का ग्राफ नीचे नहीं गिरेगा. सबसे ज्यादा बलात्कार घर के अंदर होते हैं और कोई परिचित करता है, इसमें पुलिस क्या कर सकती है? जरूरत समाज की सोच बदलने की भी है. सिर्फ पुलिस के खिलाफ आवाज उठाने से कुछ नहीं होगा आपके हाथ में ऐसी ताकत है आप लोगों की सोच बदलने का काम कीजिए. दिल्ली आपकी बात सुन रही है, कृपया बदलाव के इस मौके को ऐसे ना गंवाएं. दिल्ली रोल मॉडल बन सकती है लेकिन दिल्ली में जो हो रहा है उसे देखकर शायद ही किसी राज्य की जनता ऐसा मॉडल बनाने को तैयार होगी.

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(एबीपी न्यूज़ से साभार)

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