बड़ी घटनाएँ दबा दी जाती हैं और प्रायोजित घटनाएँ खबर बना दी जाती हैं!

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देश की दो फीसदी आबादी का देश के 70 फीसदी संसाधनों तथा पूँजी पर कब्जा है और ये लोग मीडिया के जरिये देश को अपनी योजनानुसार बरगलाते और दिग्भ्रमित करते रहते हैं। ये लोग बड़ी से बड़ी घटना को दबवा देते हैं और देशहित की बातों से ध्यान हटाने के लिये प्रायोजित और बनावटी घटनाओं को ज्वलन्त व सनसनीखेज सबर बनाकर पेश करवा देते हैं। जिसके चलते देश के लोगों को वास्तविक हालातों का ज्ञान ही नहीं हो पाता है और भोले-भाले ऊर्जावान युवा अपने दुश्मनों के दुष्चक्र में फंसकर अपने ही पैरों पर कुल्हा़ड़ी मारने को उद्यत हो जाते हैं।


इस प्रकार के मामले इस देश में अनेकों बार, बल्कि बार-बार दोहराये जाते रहते हैं। जिनकी शुरूआत हुई मण्डल कमीशन के विरोध में मीडिया द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को ही सड़कों पर उतारने को उकसाया गया। जिसमें युवाओं को आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर विरोध करते हुए दिखाया गया और जानबूझकर मनुवादियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के युवाओं को ही आगे कर दिया। जिन्हें मीडिया के सामने लाकर केरोसीन तथा पेट्रोल से नहलाकर आग के हवाले कर दिया गया। मीडिया ने इसे आरक्षण विराध के रूप में प्रचारित किया। इसी प्रकार से गुजरात में दंगों के दौरान मनुवादियों ने हिन्दुत्व का जहर घोलकर वहॉं के अशिक्षित, विपन्न, शोषित और पिछड़े और दूर-दराज के पिछड़े क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों को आगे कर दिया। जो आज भी कोर्ट-कचेहरियों के चक्कर काट रहे हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी और भाजपा इस घिनौने कत्लेआम के प्रतिफल में गुजरात की सत्ता पर लगातार काबिज हो चुके हैं।

उसी गुजरात में पिछले सप्ताह चालीस आदिवासियों को मनुवादियों ने खौलते तेल में हाथ डालकर अग्नि परीक्षा देने के लिये विवश कर दिया और इस दुष्कृत्य को मीडिया ने खबर बनाने के बजाय प्रायोजित तरीके से दबा दिया। जबकि अग्नि परीक्षा जैसी धूर्त चालों के जरिये लोगों को मूर्ख बनाने वाले मनुवादियों के षड़यन्त्र को मीडिया द्वारा प्रमुखता से विश्‍व के समक्ष उजागर करना चाहिये था! सवाल तो यह भी उठना चाहिये कि जब सति-प्रथा जैसी अवैज्ञानिक और अमानवीय कुप्रथा को प्रतिबन्धित करके, इसका महिमामंडन प्रतिबन्धित और अपराध घोषित किया जा चुका है तो किसी भी प्रकार से अग्नि परीक्षा जैसी अमानवीय और नृशंस क्रूरता की कपोल-कल्पित कहानियों से भरे पड़े मनुवादियों के ग्रंथों को क्यों प्रतिबन्धित नहीं किया जा रहा है? जिनके चलते ही लोगों के अवचेतन मन में ऐसे अमानवीय और क्रूर विचार पनपते हैं। दुर्भाग्य यह है कि देश का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया मनुवादियों के कब्जे में है, जो फिर से इस देश को मनुवाद से शासित होते देखने के लिये लगातार प्रयास करता रहता है, उस मीडिया से ये अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह मनुवादियों के षड़यन्त्रों को ध्वस्त करने वाली खबरों को प्रमुखता से प्रचारित, प्रसारित और प्रकाशित करे!

इसी का दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण इलाहाबाद में कुम्भ के दौरान हुए हादसे में कई दर्जन निर्दोष लोगों की जान चली जाने का है, जिसमें कोई राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो कोई रेलवे मंत्रालय को, जबकि कोई भी इस बात को नहीं उठा रहा है कि कुम्भ जैसे अवैज्ञानिक और अश्‍लील आयोजनों की जरूरत ही क्या है? जहॉं पर संत का चौला पहने हजारों लोग स्त्रियों की उपस्थिति में नग्न होकर स्नान करते हैं!

सच तो यह है कि मनुवादियों ने इस देश के लोगों के अवचेतन में इस प्रकार की अनेक रुग्णताएँ गहरे में स्थापित कर दी हैं कि उनसे लोगों को रोगमुक्त करने के लिये लगातार वर्षों तक प्रयास करने की जरूरत है। जबकि इसके ठीक विपरीत कुम्भ स्नान की कपोल-कल्पित कहानियों का मीडिया लागातार महिमामण्डन कर रहा है और आर्यों के इस अश्‍लील आयोजन को बढाने के लिये प्रयास जारी हैं। जबकि दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि मूल निवासियों को युद्ध में हराने के जश्‍न के रूप में कुम्भ का आयोजन किया जाता है, जिसमें बढचढकर मूल निवासी ही हिस्सा ले रहे हैं!

मीडिया के जरिये क्रूर और चालाक मनुवादी व्यवस्था के संचालक एक बार फिर से अपने अवैज्ञानिक सिद्धान्तों को आस्था की चाशनी में लपेटकर भोलेभाले देशवासियों के समक्ष इस प्रकार से परोस रहे हैं कि इस षड़यन्त्र में फंसकर आम लोगों, विशेषकर स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों और दलितों के वर्तमान और भविष्य को बर्बाद किया जा रहा है
। इसी सुनियोजित षड़यन्त्र की क्रूर परिणिती है-इलाहबाद की रेलवे पुल की रैलिंग टूटने की दु:खद घटना, जिसके लिये और कोई नहीं केवल और केवल मनुवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। जिससे निजात दिलाने की मीडिया और राजनेताओं से दूर-दूर तक कहीं कोई संभावना नजर नहीं आ रही है|

हालांकि खुशी इस बात की है कि अमानवीय और अवैज्ञानिक मनुवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को इस देश के ब्राह्मण समाज के कुछ युवा समझ रहे हैं और वे इसके विरुद्ध खड़े भी हो रहे हैं। जिसके चलते दलित आन्दोलन को ताकत मिल सकती है। यद्यपि बामसेफ जैसे संगठन इस दिशा में लागातार अच्छा काम कर रहे हैं और देशवासियों को ब्राह्मणवादी और मनुवादी व्यवस्था के चंगुल से मुक्त करवाने के लिये देशभर में अभियान चलाये हुए हैं, जो मुनवादी मीडिया के समक्ष नाकाफी ही है!

1 COMMENT

  1. मुर्ख और पूर्वाह्ग्रह से ग्रसित इस लेखक के विचारों को दरकिनार कर देना ही उचोत है !

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