मनु शर्मा तुम जीत गए, नो वन किल्ड मीडिया !

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न्यूज़ चैनलों की जब भी आलोचना होती है तो अपने बचाव में न्यूज़ चैनलों के संपादक कुछ सकरात्मक कार्यों का उल्लेख करते हैं तो उसमें जेसिका लाल हत्याकांड को जरूर गिनाया जाता है. सच भी है कि यदि मीडिया और खासकर न्यूज़ चैनलों ने जेसिका लाल हत्याकांड को प्रमुखता से नहीं उठाया होता तो संभवतः कातिल मनु शर्मा अब भी खुल्ले में घूम कर न जाने कितनी जेसिकाओं को अपना शिकार बना रहा होता.


लेकिन मीडिया के इस मुहिम से मनु शर्मा का परिवार इस कदर भन्नाया कि पत्रकारों और मीडिया को ही सबक सिखाने और अपने जूते तले मसलने के लिए मीडिया के धंधे में ही कूद पड़ा. पैसों के अथाह समुन्द्र से कुछ बूंदे खर्चकर मनु शर्मा का परिवार मीडिया इंडस्ट्री में इंडिया न्यूज़ समाचार चैनल के जरिये घुस गया और माननीय पत्रकारों समेत पत्रकारों की एक बड़ी फ़ौज वहां चाकरी करने लगी.

 


लेकिन यह आंशिक सफलता थी. क्योंकि बड़े कद और बड़े चैनलों के नामचीन पत्रकार इससे दूर ही रहे. हाँ बाद में जब एम.जे.अकबर संस्थान से जुड़े तो शर्मा फैमिली को एक बड़ी सफलता हाथ लगी. लेकिन सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब दीपक चौरसिया इंडिया न्यूज़ में आने के लिए तैयार हो गए और टेलीविजन इंडस्ट्री का एक सबसे चर्चित चेहरा मनु शर्मा के परिवार के चैनल का चेहरा बन गया.


दरअसल यहाँ दीपक के ज्वाइन करने के लिए कोई ऐतराज नहीं. वे बेहतर विकल्प के लिए वहां गए होंगे और उसमें कुछ भी गलत नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर उनके नजरिये से साब ठीक ही है. लेकिन पत्रकारीय दृष्टिकोण से यह आघात है. यह संकेत हैं कि मनु शर्मा के परिवार ने जिस उद्देश्य से मीडिया की दुनिया में प्रवेश किया, उसमें उन्होंने आधी सफलता हासिल कर ली. मीडिया को सबक तो नहीं सीखा सके, लेकिन जिन पत्रकारों ने मनु शर्मा की धज्जियाँ उड़ाई, उनसे अपनी चाकरी जरूर करा ली.


दरअसल मीडिया की दुनिया अजीब है. जेसिका लाल मर्डर के अभियुक्त मनु शर्मा को जिस मीडिया ने सजा दिलाने में अहम भूमिका निभाई. बड़े पत्रकारों और संपादकों ने पीपही बजायी.


अब उन्हीं में से कुछ लोग उसी परिवार की चाकरी करेंगे और शायद जब मनु शर्मा छूट कर आ जाएगा तो उसका हुकुम भी बजायेंगे. सहारा के बाद इंडिया न्यूज़ ने भी पैसे की ताकत को दिखा दिया. पैसा फेको तमाशा देखो.


फिर किसी चैनल पर ये डुगडुगी बजेगी, नो वन किल्ड मीडिया.


(एक दर्शक की नज़र से )

1 COMMENT

  1. मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं जिन्हें दोगुनी से ज्यादा सैलरी पर भी बुलाया गया था, लेकिन वो पिकैडिली ग्रुप में काम करने नहीं गये। ये अलग बात है कि वे अभी भी किसी बड़े संस्थान में किसी मोटी तनख्वाह पर नहीं हैं, लेकिन उनकी अभी भी पत्रकारों में और खुद उनकी अपनी नजर में साख बची हुई है। उन्हें सलाम।

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