लालू यादव की छत्रछाया में शहाबुद्दीन का आतंक

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हरेश कुमार

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हरेश कुमार

देश की राजनीति को बिहार हमेशा से प्रभावित करता रहा है, चाहे आजादी की लड़ाई हो या कोई और अवसर। लेकिन आज के समय में राष्ट्रीय पटल पर बिहार की चर्चा अच्छे कारणों की बजाए हमेशा आपराधिक छवि के नेताओं और उनके द्वारा किए जाने वाले अपराध अन्य अपराधियों से संबंध और उन सबके कारनामों के कारण होता है। बिहार के कई बाहुबलियों की अनदेखी नहीं की जा सकती, जिन्होंने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा और इस राज्य की सियासत को हमेशा हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। वैसे तो बिहार में कई नाम हैं लेकिन एक नाम ऐसा है जो सीवान से निकलकर पूरे बिहार में छा गया। वो नाम है मोहम्मद शहाबुद्दीन का….।

मोहम्मद शहाबुद्दीन

शहाबुद्दीन एक ऐसा नाम है जिसे बिहार में हर कोई जानता है।शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में हुआ था। उसने अपनी शिक्षा दीक्षा बिहार से ही पूरी की थी। शहाबुद्दीन पॉलिटिकल साइंस में एमए और पीएचडी है। शहाबुद्दीन की पत्नी का नाम हिना शहाब है। उसे एक बेटा और दो बेटी है। शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रखा था। किसी फिल्मी किरदार से दिखने वाले शहाबुद्दीन की कहानी भी फिल्मी लगती है। उसने लालू प्रसाद का वरदहस्त पाकर कुछ ही वर्षों में अपराध और राजनीति में अपना एक अलग मुकाम बनाया।

अपराध की दुनिया में प्रवेश
shahabuddin-record1986 में उसके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था। इसके बाद तो उसके नाम एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे लिखे गए। शहाबुद्दीन के बढ़ते आपराधिक आंकड़ों को देखकर पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन की हिस्ट्रीशीट खोल दी और उसे ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया। छोटी उम्र में ही अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन एक जाना-माना नाम बन गया। उसकी ताकत लगातार बढ़ती जा रही थी।

अपराध की दुनिया में अच्छा-खासा नाम कमाने के बाद उसके अंदर राजनीति की दुनिया में प्रवेश करने की लालसा ने जन्म ले लिया था। वैसे भी एक हद के अपराध के बाद अगर राजनीतिक संरक्षण न मिला तो अपराधियों की उम्र ज्यादा दिन नहीं होती। कोई न कोई टपका देता है। ऐसे समय में लालू प्रसाद यादव शहाबुद्दीन के लिए राजनीतिक संरक्षण के तौर पर सामने आए। बिहार में लालू प्रसाद मुसलमान औऱ यादवों के वोट बैंक सहारे राज कर रहे थे और उन्हें भी ऐक ऐसे नाम की जरूरत महसूस हो रही थी जिसे आगे करके मुसलमानों के वोट बैंक को अपने पाले में लाया जा सके।

देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि जिस सीवान के जीरादेई ने देश को प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसा विभूति दिया, जिसपर पूरे देश को नाज है उसी जीरादेई से मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राजनीति में प्रवेश लिया।




लालू की छत्रछाया पाते ही राजनीति में शहाबुद्दीन का प्रवेश

राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा। राजनीति में उसके सितारे बुलंद थे। पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला। पार्टी ने 1990 में विधानसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन जीत गए। उसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता। इस दौरान शहाबुद्दीन का कद और बढ़ गया। उसके बढ़ती ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में उसे लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई। 1997 में जनता दल के दो फाड़ होने के बाद राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत और बढ़ गई।

क्षेत्र में शहाबुद्दीन आतंक का पर्याय
2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी। सरकार के संरक्षण के कारण वह खुद ही कानून बन गए थे। सरकारसे मिले संरक्षण का ही परिणाम था कि पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों की तरफ से आंखे बंद किए रहती थी।

शहाबुद्दीन के आतंक के कारण किसी ने भी उस दौर में उसके खिलाफ किसी भी मामले में गवाही देने की हिम्मत नहीं की। इसका परिणाम यह निकला कि सीवान जिले को वह अपनी जागीर समझने लगे। जहां उसकी इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था।




ताकत के मद में मदहोश शहाबुद्दीन जब प्रशासनिक अधिकारियों को भी आंखें दिखाने लगा
लालू प्रसाद और सत्ता के संरक्षण के कारण मोहम्मद शहाबुद्दीन इतना ताकतवर हो गया कि वह पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी आंखें दिखाने लगा। इसका परिणाम निकला कि अधिकारियों से दुर्व्यवहार करना उसकी आदतों में शुमार हो गया। अब तो वह वह पुलिस वालों पर भी गोली चलाने लगा था।
मार्च 2001 में जब स्थानीय पुलिस राजद के मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट तामील करने पहुंची थी तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मारने के अलावा उसके साथ आए आदमियों ने पुलिस वालों की जमकर पिटाई की थी।

पुलिस और शहाबुद्दीन समर्थकों के बीच गोलीबारी
मनोज कुमार पप्पू प्रकरण से पुलिस महकमा सकते में था। पुलिस ने मनोज और शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी करने के मकसद से शहाबुद्दीन के घर छापेमारी की थी। इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी। छापे की उस कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मियों समेत 10 लोग मारे गए थे। पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई थी। मौके से पुलिस ने 3 एके-47 बरामद की थी।शहाबुद्दीन और उसके साथी मौके से भाग निकले थे। इस घटना के बाद शहाबुद्दीन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए थे।




सीवान में चलती थी शहाबुद्दीन की हुकूमत
2000 के दशक तक सीवान जिले में शहाबुद्दीन एक समानांतर सरकार चला रहे थे। उसकी एक अपनी अदालत थी। जहां लोगों के फैसले हुआ करते थे। वह खुद सीवान की जनता के पारिवारिक विवादों और भूमि विवादों का निपटारा करते थे। यहां तक के जिले के डॉक्टरों की परामर्श फीस भी वही तय किया करते थे। कई घरों के वैवाहिक विवाद भी वह अपने तरीके से निपटाते थे।

बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था। इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया। इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए।

31 मार्च 1997 को सिवान में आरजेडी सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के गुंडो ने चंद्रशेखर और उनके एक साथी की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

जेल से लड़ा चुनाव, अस्पताल में लगाया था दरबार

शहाबुद्दीन को लोकसभा 2004 के चुनाव से आठ माह पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन अपने संपर्कों और लालू प्रसाद के संरक्षण के बूते चुनाव आते ही शहाबुद्दीन मेडिकल ग्राउंड पर अस्पताल में शिफ्ट हो गया। अस्पताल का एक पूरा फ्लोर उसके लिए रखा गया था।

जब मीडिया में इस बात की चर्चा हुई तो पटना हाईकोर्ट ने ठीक चुनाव से कुछ दिन पहले सरकार को शहाबुद्दीन के मामले में सख्त निर्देश दिए। कोर्ट ने शहाबुद्दीन को वापस जेल में भेजने के लिए कहा था। मजबूरी में सरकार ने शहाबुद्दीन को जेल वापस भेज दिया, लेकिन चुनाव में 500 से ज्यादा बूथ लूट लिए गए थे। शहाबुद्दीन के आदमियों पर बूथ लूटने का आरोप लगा। इसके बावजूद दोबारा चुनाव होने पर भी शहाबुद्दीन सीवान से लोकसभा सांसद बन गए थे।जेडीयू के ओम प्रकाश यादव ने शहाबुद्दीन को कड़ी टक्कर दी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव के बाद कई जेडीयू कार्यकर्ताओं की हत्या हुई।




हत्या और अपहरण के मामले में हुई उम्रकैद
साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था। इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। राजनीतिक रंजिश भी बढ़ रही थी। नवंबर 2005 में बिहार पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया। वे संसद सत्र में भाग लेने के लिए आए थे। इससे पहले सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान उसके पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे। हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं। अदालत ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

चुनाव लड़ने पर रोक
अदालत ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने पर्चा भरा था। लेकिन वह चुनाव हार गई। सीवान में दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के बाद शहाबुद्दीन को सीवान जेल से भागलपुर सेंट्रल जेल में शिफ्ट किया गया था

बांका के बेलहर से जदयू के विधायक गिरधारी यादव के अनुसार, महागठबंधन सरकार के 4 मंत्री सहित लगभग सूबे के 30 विधायको के साथ, सीवान के लिए होंगे रवाना। ‘साहब’ की घर वापसी में लगभग 1300 गाडियो का होगा काफिला। सीवान और राजद के समर्थक अधिकांश लोग आपराधिक छवि के इस नेता को ‘साहब’ कहकर बुलाते हैं।

तेजाब कांड में शहाबुद्दीन को जमानत

सीवान के पूर्व राजद सांसद शहाबुद्दीन को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने तेजाब कांड के गवाह की हत्या मामले में सुनवाई करते हुए शहाबुद्दीन को जमानत दे दी।
गौरतलब है कि इस केस में सीवान कोर्ट ने सुनवाई करते हुए 11अगस्त, 2015 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

16 अगस्त, 2004 को चंदा बाबू के दो बेटों- गिरीश राज (निक्कू) और सतीश राज (सोनू) को उठा लिया गया। आज तक उनकी लाश नहीं मिली । उनको तेजाब से जलाकर मारा गया था। इनके बड़े भाई राजीव रोशन ने बयान दिया था कि मेरे सामने मेरे दोनों भाई मारे गए थे। मेरा भी अपहरण हुआ था। लेकिन मैं किसी तरह भाग निकला। मेरे दोनों भाइयों को पहले तेजाब से नहलाया गया। फिर उनको काटा गया। राजीव के बयान पर पटना हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से इस मामले को दोबारा खोला गया। विशेष अदालत गठित हुई, जिसने उम्रकैद की सजा द । लेकिन इसी दौरान पिछले साल 16 जून को राजीव को भी मार डाला गया। वह अपने भाइयों की हत्या का इकलौता चश्मदीद था ।

(लेखक दैनिक भास्कर.कॉम में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.)



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