अमरेन्द्र कुमार
आजादी के बाद नेताओं ने जनता के लिए रोटी, कपडा, मकान आदि का जो आश्वासन दिया था, वे पूरे नहीं हुए। उनके सारे वायदे खोखले थे। उनहोंने छल-छद्म का रास्ता अख्तियार कर लिया। इसीलिए व्यंग्यकारों ने भी उन नेताओं के कपटी आचरण, धूर्तता आदि पर कलम का नश्तर चलाया और उनक मुखौटा उतरा। वे सभी व्यंग्यकार पत्र -पत्रिकाओं में ही लिखते थे — भले ही वे रचनाएं बाद में किताबों के रूप में प्रकाशित होती थीं। ऐसे ही व्यंग्यकारों की पंक्ति में के. पी. सक्सेना भी शामिल थे।
अभी जमाना उनके व्यंग्य में व्यक्त चुटकी लेने वाली बातों का मजा ले ही रहा था कि वे अचानक सो गए। उनके निधन से हिंदी – पाठकों को एक धक्का लगा और उनके व्यग्य के नश्तर की कलात्मकता याद आने लगी। उनहोंने अपनी धारदार ककलम से पुलिस,नेता, अधिकारी आदि की कलई खोली और गुदगुदाते-गुदगुदाते ऊपरी आवरण हटा कर सत्य का उद्घाटन कर दिया।
मुझे याद आता है कि जब मैं दिल्ली से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक ‘युग ‘ का सम्पादक बना, तो व्यंग्य लेख के लिए दिल्ली या बिहार के किसी लेखक को नहीं चुना, बल्कि सक्सेना जी से अनुरोध किया। मैंने सम्पादकीय विभाग के अपने सहयोगियों से परामर्श कियाऔर सक्सेना जी से व्यंग्य लिखवाने लगा। उनके व्यंग्य पर लगातार प्रतिक्रियाएं आने लगीं, तो मेरे मन में उत्साह जगा। मैंने सोचा कि मेरा निर्णय सही था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)