आजतक के पत्रकार विकास मिश्रा कोरोना से उबरे, साझा किया अपना अनुभव

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sweta singh and vikas mishra
एंकर श्वेता सिंह के साथ पत्रकार विकास मिश्र (दायें )

आजतक के वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा पिछले दिनों कोरोना से संक्रमित हो गए थे. इसकी सूचना उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से दी थी. अच्छी खबर है कि अब वे कोरोना संक्रमण से मुक्त होकर पूरी तरह से स्वस्थ्य हो चुके है और खबरों की दुनिया में वापस आ चुके हैं. बहरहाल स्वस्थ्य होने के बाद उन्होंने कोरोना के लेकर अपने अनुभवों को एक बार फिर से सोशल मीडिया पर साझा किया है जो कोरोना से जूझ रहे लोगों के लिए हौसला बढाने वाला है. आप भी पढ़िए –
vikas mishra tv journalist

पति-पत्नी कोरोना से निपट लिए। तीन दिनों से दफ्तर आ रहा हूं। जब पता चला कि कोरोना हो गया, तो चिंता सिर्फ श्रीमती जी की थी, क्योंकि उन्हें शुगर है, पित्त वगैरह की एकाध और व्याधियां हैं। इसी नाते उनकी फिक्र ज्यादा थी। रोग भी ऐसा जिसमें बाहर से कोई सहायता भी नहीं मिलनी थी। जिन पैरों को ज्यादातर वक्त घर से बाहर रहने की आदत थी, वो एक फ्लैट में कैद होकर रह गए थे।

कोरोना के साये में बीते 25 दिन अद्भुत रहे। पूरी दुनिया एक घर में सिमट गई थी। मैं मरीज भी था और तीमारदार भी। ईश्वर का आशीर्वाद था कि कोई दिक्कत मुझे नहीं थी। श्रीमती जी भी हौसला बनाए हुई थीं। नारियल पानी, संतरा, अनन्नास का जूस, काढ़ा, ग्रीन टी, चाय सब डॉक्टरों के निर्देश पर चल रहा था। खाने में भी ज्यादातर खिचड़ी या फिर रोटी-सब्जी।

मुझे पता था कि इस बीमारी में सबसे खतरनाक है डर। सबसे बड़ी संजीवनी है सकारात्मकता। ये औषधि सबसे ज्यादा काम आई। जब भी श्रीमती जी की तबीयत दाएं-बाएं होती, तो मैं उन्हें भरोसा दिलाता कि कुछ नहीं हुआ है, कभी ताने का भी सहारा लेना पड़ा। एक रोज उन्होंने कहा कि स्वाद नहीं आ रहा है। मैंने कहा-तुम्हारा मन अस्पताल जाने का कर रहा है। सोच रही होगी कि लोग क्या कहेंगे, बीमारी हुई और अस्पताल भी नहीं गए। वो बोलीं-आप भी बात को कहां से कहां ले जाते हैं। गोरखपुर वाली भाभी को पता चला तो उन्होंने नुस्खा बताया। बोलीं कि अदरक बारीक कूट लो, उसमें नीबू डाल दो और थोड़ा सा सेंधा नमक। इसे खाने के साथ खाओ, स्वाद आ जाएगा। अब पता नहीं इसका असर था या फिर मेरे ताने का। स्वाद कुछ ही घंटों में वापस आ गया।

कोरोना संक्रमण के 10 दिन बीत चुके थे। श्रीमती जी ने कहा-ये खिचड़ी और रोटी खाते खाते ऊब गए हैं। पकौड़ी खाने का मन कर रहा है। मैंने हेल्पलाइन पर फोन करके डॉक्टर से बातचीत की। डॉक्टर भी काफी उदार निकले, बोले-जो मन कर रहा है खाइए, खिलाइए। पत्नी के प्रेम में गोभी, आलू, लौकी, कद्दू और प्याज की पकौड़ी बना दी। श्रीमती जी ने पकौड़ियां तो खाईं, लेकिन रोटी, दाल या चावल को हाथ नहीं लगाया।

करीब तीन घंटे बाद पकौड़ियों ने बताया कि आखिर वो कौन हैं। हो गई तबीयत खराब। तेल माथे पर चढ़ गया और माइग्रेन सातवें आसमान पर। सांस उनकी ऊपर नीचे तो उन्हें देखकर मेरी भी हालत खराब। हेल्पलाइन पर फोन किया। उधर दूसरे डॉक्टर थे, बोले-किस मूर्ख ने बताया कि तेल वाला खाना खाएं। इतने दिनों से हल्का खाना खा रहे हैं अचानक तेल वाला खाना। हमने कहा कि अब तो खा लिया, अब क्या करें।

होम्योपैथिक, एलोपैथिक दवाओं का सिलसिला चला। हींग, अजवाइन और इनो का भी सेवन किया। उल्टियां हुईं। अगली सुबह जाकर हालात काबू में आए। जब ठीक हुईं तो बोलीं-जो मेरे लिए ठीक हो, वही खाने दीजिएगा, अगर कोई नुकसानदेह चीज खाना चाहूं तो साफ मना कर दीजिएगा। मैंने कहा-एवमस्तु।

कोरोना निगेटिव हो गया था। रिपोर्ट आ गई थी, पड़ोस में रहने वाले मेरे मित्र शील जी Sheel Shukla की बेटी अमोला Amolasheel Shukla ने घर में दही- बड़े बनाए थे। न्योता दिया तो दोनों लोग पहुंचे। श्रीमती जी को लगा कि न्योता सिर्फ दही-बड़े का है। तो उन्होंने चार दही-बड़े खा लिए। उसके बाद डिनर सामने आ गया, लेकिन उनके पेट में तो जगह ही नहीं थी। तो दही-बड़े के अलावा कुछ खाया नहीं। घर पहुंचे तो आधी रात फिर वही हुआ, जो पहले हुआ था। कराहते, दवा खाते और उल्टी करते बीती उनकी पूरी रात।

बस यही दो दिन संकट के थे, बाकी तो आनंद ही था। कामकाज से दूर, किसी बाहरी जिम्मेदारी से दूर पति-पत्नी करीब 25 दिनों तक दिन-रात एक साथ रहे। जितना साथ इन 25 दिनों में मिला, उतना तो पिछले 22 सालों में नहीं मिला था। फिल्में देखीं, आपस में बातें कीं। लोगों के फोन आते रहे, उनसे बातें, कुछ से वीडियो कॉल। इस दौरान ऐसा कोई आधा घंटा भी नहीं बीता, जिसमें बोर हुए हों।

मेरी फुफेरी बहन माधुरी दीदी Madhuri Shukla का फोन आया। रिश्ते में वे श्रीमती जी की चाची भी हैं। बोलीं कि मेरी बेटी का ख्याल रखना। मैंने कहा कि ये कहने की जरूरत नहीं, ख्याल इस नाते भी रखूंगा कि अगर इन्हें कुछ हुआ तो 50 साल की उम्र में मुझे दूसरा विकल्प भी नहीं मिलेगा। 10-15 साल पहले ऐसा कुछ होता तो शायद कम ख्याल रखता। मेरा इतना कहना था कि दोनों तरफ से ठहाके लगे।

मेरे बाबूजी सबको यही आशीर्वाद देते थे- हंसते रहो, हंसाते रहो। मैं समझता हूं कि ये आशीर्वाद नहीं बल्कि जिंदगी का सबसे बड़ा मंत्र है। रोग जैसा भी हो, वो इंजेक्शन और दवाओं से ज्यादा ठहाकों से डरता है। ये मेरा अनुभूत प्रयोग है। 25 दिनों तक घर में हंसने-हंसाने का दौर कभी कम नहीं हुआ। मुश्किल पल आए, लेकिन इन ठहाकों की गूंज में हवा हो गए।

हम पति पत्नी कोरोनाग्रस्त थे और मेरे तमाम प्रियजन हमारे लिए दुआएं कर रहे थे। लगातार फोन आ रहे थे। अगर हम लोग स्वस्थ हैं तो ये आप सबकी शुभकामनाओं का नतीजा है। हमने इस दौरान बाबा रामदेव की कोरोनिल का इस्तेमाल किया। मित्र संत समीर Sant Sameer की सलाहें भी खूब काम आईं। प्रसिद्ध होम्योपैथ डॉक्टर आशीष राजेंद्र लगातार संपर्क में रहे, उनकी दवाएं रामबाण साबित हुईं। मेरी दुआ ही नहीं विश्वास भी है कि आशीष जी इलाज और शोहरत में अपने पिता और हमारे बड़े भाई सरीखे मित्र डॉक्टर राजेंद्र सिंह से भी कहीं आगे जाएंगे।

इसके अलावा मैं धन्यवाद करूंगा योगी सरकार और गाजियाबाद प्रशासन का भी। जी हां गाजियाबाद हेल्पलाइन से दिन में रोजाना तीन बार फोन आता था। टेंपरेचर और ऑक्सीजन लेवल नोट करते थे, हाल पूछते थे और सलाह भी देते थे। हर फोन के अंत में कहा जाता था कि आप 24 घंटे कभी भी फोन कर सकते हैं। हर कॉल पर डॉक्टर हाजिर थे। सरकारी दवा भी दूसरे दिन पहुंच गई थी। इसके अलावा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से रोज दो बार फोन आता था, बताया जाता था कि कोई भी दिक्कत हो तो फौरन सूचना दीजिए।

मैं किसी चीज के लिए किसी को मना नहीं कर पाता। कोरोना को भी शायद ये पता था तो वो भी मेहमान बनकर आ गया। दो हफ्ते रहा, फिर निकल लिया। नए साल में ईश्वर से प्रार्थना है कि कोरोना विदा हो जाए। सब कुछ पटरी पर आ जाए। आप सभी को आने वाले साल की ढेर सारी शुभकामनाएं। स्वस्थ रहिए अपने आसपास के लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखिए। हंसते रहिए, हंसाते रहिए।

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