भारत में इंटरनेट का प्रभावी रंग भगवा है तो नीला और हरा रंग भी फीका नहीं है

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दिलीप मंडल,प्रबंध संपादक,इंडिया टुडे

सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों/बात करने वालों की ट्रेडिशनल मीडिया से शिकायत समझ में आती है. परंपरागत मीडिया की सामाजिक संरचना उनके अनुकूल नहीं है.

लेकिन उन्हें यह भी देखना चाहिए कि मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और ट्विटर पर आंबेडकरी/सामाजिक न्यायवादी विचार वालों की करोंड़ों की मौजूदगी है. ये सक्रिय लोग हैं. इस संख्या का असर भारत में अब तक हुए सबसे बड़े ऑनलाइन पोल ‘द ग्रेटेस्ट इंडियन’ में दिखा, जब इस विचार वालों ने 15 लाख से ज्यादा अलग अलग IP address यानी अलग अलग नेट कनेक्शन से वोट डालकर बाबा साहब को नंबर एक पर पहुंचाया और मान्यवर कांशीराम तीसरे स्थान पर रहे. संघी वहां पीछे रह गए.

संघ ने नेट पर मौजूद अपने समर्थकों का राजनीतिक इस्तेमाल करके अपनी हवा बनाने की कोशिश की है. इसलिए नेट का रंग भगवा दिखता है. लेकिन बाकी विचार वालों को ऐसा करने से कौन रोकता है? इंटरनेट की पहुंच जब 20 करोड़ के आसपास हो रही है, तब इस मीडियम का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

(स्रोत-एफबी)

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