विनीत कुमार
इंडिया टीवी ने कलेजा ठोककर हम दर्शकों को बताया कि नरेन्द्र मोदी पर बनायी उसकी डॉक्यूमेंट्री सबसे सच्ची और एक्सक्लूसिव है..लेकिन अभी देख रहा हूं कि इंडिया न्यूज की 'मेकिंग ऑफ मोदी' के व्ऑइस ओवर की एक-एक लाइन न केवल मिल जा रही है बल्कि एक के बाद एक फुटेज भी.
क्या सच्ची बात की भाषा इतनी एक सी होती है कि इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज के बीच न केवल फर्क खत्म हो जाए बल्कि नरेन्द्र मोदी खबर के बजाय विज्ञापन की शक्ल में लगातार दिखाए जाने लगे.
वैचारिकी के स्तर पर बात करुं तो आप फिर पिल पड़ेंगे लेकिन चैनलों की भाषाई दरिद्रता पर कुछ तो गौर कीजिए प्रभु..
एक-एक शब्द पेड न्यूज का हिस्सा लग रहा है और जैसे चैनल विज्ञापन की टेक्स्ट न बदलने की मजबूरी से बंधे होते हैं, वैसे ही आज नरेन्द्र मोदी की खबर को लेकर..
कल फिर आप हिन्दी के नाम की मर्सिया पढ़िएगा और "टेलीविजन की भाषा" जैसी किताब का चारण कीजिएगा जो हजार-बारह सौ शब्दों को टीवी के लिए पर्याप्त मानता है...
लेकिन सोचिए तो हमारे न्यूज चैनल उन दरबारी कवियों से कई गुणा बत्तर हैं जिनके पास चमचई और चापलूसी तक की अपनी भाषा नहीं है..
(विनीत कुमार के एफबी वॉल से )
इंडिया टीवी ने कलेजा ठोककर हम दर्शकों को बताया कि नरेन्द्र मोदी पर बनायी उसकी डॉक्यूमेंट्री सबसे सच्ची और एक्सक्लूसिव है..लेकिन अभी देख रहा हूं कि इंडिया न्यूज की 'मेकिंग ऑफ मोदी' के व्ऑइस ओवर की एक-एक लाइन न केवल मिल जा रही है बल्कि एक के बाद एक फुटेज भी.
क्या सच्ची बात की भाषा इतनी एक सी होती है कि इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज के बीच न केवल फर्क खत्म हो जाए बल्कि नरेन्द्र मोदी खबर के बजाय विज्ञापन की शक्ल में लगातार दिखाए जाने लगे.
वैचारिकी के स्तर पर बात करुं तो आप फिर पिल पड़ेंगे लेकिन चैनलों की भाषाई दरिद्रता पर कुछ तो गौर कीजिए प्रभु..
एक-एक शब्द पेड न्यूज का हिस्सा लग रहा है और जैसे चैनल विज्ञापन की टेक्स्ट न बदलने की मजबूरी से बंधे होते हैं, वैसे ही आज नरेन्द्र मोदी की खबर को लेकर..
कल फिर आप हिन्दी के नाम की मर्सिया पढ़िएगा और "टेलीविजन की भाषा" जैसी किताब का चारण कीजिएगा जो हजार-बारह सौ शब्दों को टीवी के लिए पर्याप्त मानता है...
लेकिन सोचिए तो हमारे न्यूज चैनल उन दरबारी कवियों से कई गुणा बत्तर हैं जिनके पास चमचई और चापलूसी तक की अपनी भाषा नहीं है..
(विनीत कुमार के एफबी वॉल से )
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Media Khabar
