राजदीप और आशुतोष पत्रकारिता के नाम पर कबतक अपना ज़मीर मारते रहेंगे?

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चंद्रशेखर सिंह

राजदीप सरदेसाई और आशुतोष : साथ - साथ
राजदीप सरदेसाई और आशुतोष : साथ – साथ
CNN-IBN और IBN7 से बड़ी संख्या में कई पत्रकार भाई निकाल दिए गए ये दिल को ठेस पहुंचाने वाला है। जब से ये खबर सुनी मन बेचैन और दुख से भर गया। आक्रोश इतना की पूछिए मत। दिल ये कहता है कि हमसे बेहतर तो मजदूर हैं जो अपने हक की लड़ाई के लिए कम से कम एकजुट तो हो जाते हैं। हम लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहे जाते हैं लेकिन हम स्तंभ ही बन कर रह गए हैं।

कॉर्पोरेट जगत की गोद में बैठे कुछ लोग स्वयं को पत्रकार तो कहते हैं लेकिन पत्रकारिता का एक गुण भी उनके अंदर नहीं दिखता। उल्टा वे बड़ी शान से कहते हैं कि हम मजबूर हैं। बड़े दुख की बात है कि जब जेट जैसे संस्थान से कुछ लोगों को नौकरी से निकाला जाता है तो वो देश की बड़ी खबर बन जाती है और उनके परिवारों की केस स्टडी दिखाई जाती है।

कहा जाता है कि फलाने की शादी होने वाली है उस पर क्या गुजर रही होगी, फलाने की बीवी, फलाने की बच्ची बीमार रहती है उसका क्या होगा। ये सवाल उन 300 परिवारों से कौन पूछेगा जिनके घर में चूल्हा नहीं जला होगा, जिनके बच्चे दुध के लिए मोहताज होंगे । उनके बूढ़े मां-बाप को कौन सहारा देगा।

आज हर खबर को आम जन तक पहुंचाने वाले लोग खुद खबर भी नहीं बन पाए। वजह है उन चंद कॉर्पोरेट की नाजायज औलादों का जो पत्रकार का चोला ओढ़े हम सब के बीच बैठे हैं।

राजदीप-आशुतोष जैसे पत्रकार अपने में मस्त हैं और संभवतः टी.वी. पर नेताओं से भ्रष्टाचार और शोषण पर सवाल पूछने की तैयारी में लगे होंगें या फिर किसी विषय के बहाने “प्रवचन” देने की तैयारी में। अगर ये सच्चे पत्रकार होते ते अपनी बेबसी का नहीं बल्कि हम सबके साथ खड़े दिखाई देते। सवाल ये है कि पत्रकारिता के नाम पर कब तक अपनी जमीर बेचते रहेंगे।

(साभार- एफबी)

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