क्या बिना विवाद के फिल्म नहीं बन सकती भंसाली साहब?

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-गिरीश पंकज-

आक्रमणकारी बादशाह खिलजी ने अनेक आक्रमण औरतों के चक्कर में ही किए.एक बुजर्ग इतिहासकार जहूर भी आज टीवी पर बता रहे थे। पदमनी भारतीय नारी की अस्मिता बन कर उभरी और अनेक महिलाओं के साथ जौहर करके अपनी जान दे दी. वह हमलावर खिलजी के हाथ नहीं आई।

अनेक ‘विद्वान’ पद्मिनी को काल्पनिक चरित्र बता रहे हैं। चलो, मान भी लेते हैं कि वह काल्पनिक है (है नहीं ) फिर भी श्रुतियों में उसके आत्मसम्मान की जौहरवाली गाथा प्रचलित है। राजस्थान का बच्चा-बच्चा उसे जानता है, तो उसके उस सम्मान की रक्षा जरूरी है। अगर कोई मूर्ख उसे खिलजी की प्रेयसी बताने की गुस्ताखी करेगा तो भला कौन बर्दाश्त करेगा?

जब करणी सेना के लोग पहुंचे तो भंसाली को सच बताना चाहिए था कि हम रानी पद्मावती के जौहर-रूप को ही पेश कर रहे हैं, प्रेयसी वाले रूप को नहीं। प्रदर्शनकारी जब पहुंचे तो भंसाली के लोगों ने हवाई फायर क्यों किया? क्या उस वक्त लोग जाते रिपोर्ट करने कि देखो साब, वो गोली चला रहा है? ऐसी स्थितियां निर्मित ही क्यों हों? क्या बिना विवाद के फिल्म बन सकती?

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