संक्रमण के दौर से गुजर रहा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया – एनके सिंह

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एनके सिंह,वरिष्ठ पत्रकार

टीवी न्‍यूज चैनल : जन सरोकार पर सार्थक वापसी, पर मंथर गति

MK-CKONNCLAVE-2014-46वर्ष 2009 में देश के सभी बड़े न्यूज चैनलों के संपादकों ने मिल कर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनाया, जिसका उद्देश्य स्व-नियमन के जरिये विषय-वस्तु को अधिक से अधिक जनोपदेय बनाना था. जाहिर है एक तरफ बाजार की ताकतों से लड़ना मुश्किल था, तो दूसरी तरफ सत्ता के लोग नहीं चाहते थे कि जन मुद्दे से बना जनमत सरकारों पर सुधरने का दबाव बनाये. एक और दिक्कत थी जन-अभिरुचि को लेकर..

जनोपदेयता (पब्लिक डिलीवरी) में लगी हर संस्था आज आलोचना के घेरे में है. विधायिका हीं नहीं समूचा राजनीतिक वर्ग, निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च शिखर पर बैठी न्यायपालिका, मीडिया, पुलिस, डॉक्टर, राज्यपाल से लेकर अधिकांश संवैधानिक संस्थाएं, सभी जन-अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पायी हैं.

इन संस्थाओं में कुछ राज्य अभिकरण के रूप में हैं, तो कुछ प्रोफेशन के रूप में, लेकिन मीडिया ही एक ऐसी संस्था है, जो न तो राज्य से शक्ति लेती है, न ही ‘धन के लिए काम लेकिन नैतिक मूल्यों के साथ’ के रूप में है. संविधान निर्माताओं ने इसीलिए इसका स्पष्ट उल्लेख न करते हुए भी इसे 19(1)(क), जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है, में रखा न कि 19(1)(छ) में, जो किसी प्रोफेशन या व्यवसाय की स्वतंत्रता देता है. यदि मीडिया कारोबार होता तो 19(6) के र्निबध उस पर लागू होते, राज्य को शक्ति होती जनहित में इसे बाधित करने की.

सवाल यह है कि क्या मीडिया वह कर रहा है, जो इससे अपेक्षित है यानी प्रजातंत्र के मूल को मजबूत करने का कार्य. या यूं कहें कि जन सरोकार के मुद्दों को सही परिप्रेक्ष्य में जन धरातल पर रखना, फिर उस मुद्दे के पक्ष और विपक्ष के तथ्यों से जनता को बाबस्ता करना और फिर जनसंवाद से बने जनमत को सत्ता तक पहुंचा कर दबाव बनाना?

भूत-भभूत से बढ़ी टीआरपी

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लें. करीब 18 साल पहले प्राइवेट न्यूज चैनल आये. शैशवावस्था में गलतियां हुईं, जो करीब 10 साल चलती रहीं. भूत-भभूत, सांप-बिच्छू, बाबा और एलियन, क्रिकेट और क्राइम अचानक इसका मूल मंत्र हो गया. जनता को मजा आया तो टीआरपी भी आयी. मनोरंजन चैनलों को छोड़िये, न्यूज चैनल भी इसमें डूब गये. रात को राखी सावंत का डांस दिखा कर सुलाना और सबेरे आंख खुले तो सचिन का छक्का दिखा कर कर जगाना मीडिया का फुल-टाइम जॉब हो गया था.

पूरे समाज को मानो अफीम के नशे की तरह का डोज देकर जड़वत बनाया जाने लगा, ताकि वह अपने मसायल के बारे में सोच भी न पाएं. बस मॉल में जायें, डांस और क्रिकेट देख मात्र विचारविहीन उपभोक्ता बन जायें, और जो बाजारू ताकतें कहें, वही खरीद लें.

लेकिन जैसा सभी तार्किक समाज में होता है, एक बड़े तबके ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस रवैये की जबरदस्त निंदा करनी शुरू की. समाज में ‘टीवी चैनल वालों’ को खासकर संपादकों को तिरस्कार के भाव से देखा जाने लगा. यहां तक कि जो दर्शक रात में राखी सावंत का डांस देख कर सोता था, वह भी सबेरे न्यूज चैनलों को घटिया कंटेंट (विषय-वस्तु) परोसने वाला बताने लगा.

संपादकों का सामूहिक फैसला

करीब 12 साल बाद इस जन-अपमान की आंच से व्यथित संपादकों के एक वर्ग ने अपने को बदलने की कोशिश शुरू की. 2009 में देश के सभी बड़े न्यूज चैनलों के संपादकों ने मिल कर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनाया, जिसका उद्देश्य स्व-नियमन के जरिये विषय-वस्तु को अधिक से अधिक जनोपदेय बनाना था.

जाहिर है एक तरफ बाजार की ताकतों से लड़ना मुश्किल था, तो दूसरी तरफ सत्ता के लोग नहीं चाहते थे कि जन मुद्दे से बना जनमत सरकारों पर सुधरने का दबाव बनाये. एक और दिक्कत थी जन-अभिरुचि को लेकर. 2010 का एक किस्सा है. सभी बड़े न्यूज चैनलों के संपादकों ने सामूहिक फैसला लिया कि भारत का बजट पेश होने के दिन प्राइम टाइम में केवल बजट का विेषय  देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों के द्वारा स्टूडियो डिस्कशन के रूप में कराया जायेगा, ताकि जनता को पता चले सरकार ने कहां गलती की है, कहां सही.

एक चैनल इसके खिलाफ हो गया और जिस प्राइम टाइम पर सभी चैनल वादे के मुताबिक बजट को लेकर गंभीर चर्चा कर रहे थे उस चैनल ने माइकेल जैक्सन का डांस लगा दिया. अगले हफ्ते उस चैनल की टीआरपी आसमान पर पहुंच गयी.

लेकिन अगले एक साल के भीतर ही जन-अभिरुचि भी बदली और न्यूज चैनलों ने भी अपने को बदला. 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में मीडिया की खासकर न्यूज चैनलों की बड़ी भूमिका थी. समाज की सामूहिक सोच में पहली बार गुणात्मक परिवर्तन आया और भ्रष्टाचार को लेकर आम जनता शून्य-सहिष्णुता (जीरो टोलेरेंस) के मूड में आ गयी. सत्ताधारियों का आरोप था ‘अन्ना आंदोलन मीडिया ने पैदा किया है.’ हमें पहली बार लगा कि ऐसे आरोप लगने का सीधा मतलब है हम अपना काम कर रहे हैं.

दर्शकों को परोसने होंगे निरपेक्ष तथ्य

यह वह काल था जब जहां एक ओर मीडिया का झुकाव कुछ हद तक सरोकार की तरफ बढ़ा, वहीं जन-अभिरुचि भी डांस और क्रिकेट से हट कर असली मुद्दे के ओर बढ़ी. आज लगभग सभी बड़े न्यूज चैनल अपने प्राइम टाइम में उस दिन के जन-सरोकार से जुड़े सबसे बड़े मुद्दे को लेकर डिस्कशन करते हैं. इससे आम जनता के पास दोनों पक्षों के तथ्य पहुंचाते हैं, उनकी तर्क-शक्ति बेहतर होती है और प्रजातंत्र में जन धरातल पर संवाद की गुणवत्ता बढ़ती है. नतीजतन प्रजातंत्र पुख्ता होता है. न्यूज चैनलों के स्टूडियो डिस्कशन को अभी और बेहतर करने की जरूरत है और चैनलों को राजनीतिक ‘तू-तू, मैं-मैं’ से बचना होगा और निरपेक्ष तथ्य दर्शकों को परोसने होंगे, जिसके प्रयास चल रहे हैं.

यहां कुछ और प्रयासों का जिक्र करना समीचीन होगा. ऐश्वर्या राय बच्चन का प्रसव व बच्चा लड़का होगा या लड़की, किस दिन होगा, कितना प्रतापी होगा, यह मीडिया का भटकाव था. पहले भी ऐसे भटकाव रहे हैं, आगे भी होंगे लेकिन ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन (बीइए) ने अपने इन भटकावों को पहचानना शुरू किया है और मीडिया को पटरी पर लाने के सार्थक प्रयास किये हैं.

यह बीइए का ऐलान था कि ऐश्वर्या की प्रसूति जनसमाचार नहीं है, लिहाजा इस खबर को देने में क्या-क्या सतर्कता बरतनी चाहिए, इसकी सूचना सभी संपादकों ने अपने फील्ड स्टाफ को दी और सभी ने देखा कि पूरा राष्ट्रीय मीडिया इस पर कायम रहा. मीडिया के आलोचक इसे आधा खाली गिलास के भाव से देख सकते हैं और कह सकते हैं कि मीडिया के एडीटरों का मानसिक दीवालियापन है कि ऐश्वर्या के प्रसव पर भी एडवाइजरी जारी करनी पड़ती है.

सकारात्मक ढंग से आधा भरे गिलास के भाव में सोचेंगे तो पायेंगे कि कोई व्यक्तिगत गुण के शाश्वत भाव से उभरी सामूहिक सदाशयता इतनी प्रखर है कि बाजारी प्रतियोगिता को धता बताते हुए एक फैसले पर अमल करने का एक छोटा लेकिन सार्थक कदम था.

खबरों का शालीन पहलू

एक अन्य उदहारण लें. राम मंदिर-बाबरी मसजिद विध्वंस के आरोपियों पर अदालत का फैसला आने वाला था. शंका थी कि फैसले के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है. बीइए ने घंटों बैठ कर हर पहलू को ध्यान में रख कर एडवाइजरी जारी की थी कि किस तरह शालीनता के साथ इस फैसले को दिखाया जाये.

पूरे देश में इस प्रयास की तारीफ हुई. एक तीसरी घटना लें. जघन्य बलात्कार और हत्या की शिकार ‘निर्भया’ का शव विदेश से आना था और अंतिम संस्कार के लिए बलिया जिले के पैत्रिक गांव ले लाना था. अगर मीडिया इस अंतिम संस्कार को कवर करता तो उस निर्भया का असली नाम पूरे देश को पता चलता जो कानूनी रूप से गलत होता. बीइए के एडवाइजरी जारी होने के तत्काल बाद सभी संपादकों ने अपनी ओबी वैन वापस मंगवा ली.

लेकिन दिक्कत तब होती है जब शालीन कवरेज देख कर सत्ताधारी दबाव नहीं महसूस करता. एक उदाहरण देखें. एक बाबा पर बलात्कार का आरोप लगा. मीडिया ने शालीनता का परिचय देते हुए अगले तीन दिन तक औसत कवरेज दिया. बाबा के भक्त मध्य प्रदेश व राजस्थान में काफी तादाद में थे, जहां चुनाव होने वाले थे.

लिहाजा मध्य प्रदेश के एक नेता ने बाबा को क्लीन चिट दे कर भक्त-वोटरों को साधने की कोशिश की. वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री क्यों पीछे रहते. वहां की सरकार ने बाबा के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से मना कर दिया. तब मीडिया को अपनी आवाज तेज करनी पड़ी और नतीजा सामने है.

बाबा पिछले लगभग एक साल से जेल में हैं. हां यह जरूर है कि कुछ चैनल इसे टीआरपी का साधन बना कर आज भी उसी शिद्दत से लगे हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की निष्पक्षता पर चोट पहुंचती है.

संक्रमण के दौर से गुजर रहा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. इनमें कुछ स्थितियां इसकी बहबूदी और जनोपादेयता को मजबूत करेंगी, तो कुछ कमजोर. इनमें तीन प्रमुख हैं. पहला, न्यूज चैनलों के प्रबंधन ने बाजारू ताकतों द्वारा संचालित और नितांत त्रुटिपूर्ण 10 साल से चले आ रहे ‘टैम’ (दर्शकों की पसंद नापने की प्रक्रिया) नामक जुए को उतार फेंकना.

दूसरा, दर्शकों का रुझान घटिया मनोरंजन से हट कर कुछ-कुछ खबरों की तरफ बढ़ना. तीसरा, कानून के अनुपालन के तहत सभी चैनलों को अपने विज्ञापन समय को 12 मिनट प्रति घंटे तक महदूद करना यानी राजस्व में भारी गिरावट (या कुछ लोगों के अनुसार लाभ में कमी जबकि कुछ अन्य के अनुसार घाटे में).

इन तीनों स्थितियों के निरपेक्ष विेषण की जरूरत है. पहली और दूसरी स्थितियां भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया को प्रेरित करती हैं कि अपने कंटेंट (विषय-वस्तु) को और बेहतर और विश्वसनीय करे ताकि लोग क्रिकेट मैच की तरह न्यूज बुलेटिन देखना अपना धर्म मान लें.

अगर यह हो सका तो न्यूज चैनल सामाजिक और तज्जनित राजनीतिक विकृतियों को दूर करने में संवाहक की भूमिका में होंगे और वह दिन शायद विश्व मीडिया के इतिहास का स्वर्णिम दिन होगा. तीसरे को व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा.

(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं)

(प्रभात खबर से साभार)

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