स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच मीडिया बनता ‘सोशल किलर’

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रमेश यादव

रमेश यादव
रमेश यादव
भारतीय मीडिया स्त्री-पुरूष संबंधों को लोकतांत्रिक आज़ादी,अधिकार अौर स्वतंत्र अस्तित्व के नज़रिये की अपेक्षा,रूढ़िवादी नज़रिए से अधिक देखा है अौर उसका विश्लेषण भी करता रहा है ।

पति को ‘परमेश्वर’ अौर पत्नी को ‘सीता’ कहने में उसे अधिक सुख की अनुभूति होती है । पति-पत्नी अौर इस जैसे रिश्तों के प्रति मीडिया का नज़रिया एकदम पारम्परिक,जड़तावादी,सामंती, कुंठीत अौर मालिकाना हक़ वाला रहा है ।

इस तरह के रिश्तों के प्रति मीडिया ने सर्वमान्य सामाजिक नज़रिया विकसित करने में नाकाम रहा है । हां ! एेसे रिश्तों के बनने-बिगड़ने में वह ख़ासा दिलचस्पी रखता है । कई क़दम आगे बढ़कर निजी जीवन में ताकझांक करता है । निजता का ख़याल रखे वग़ैर,पब्लिक लाइफ़ में चटकारे लेने वाली ख़बरें परोसता है । उसके इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना क़दम से संबंधित व्यक्ति का न केवल निजी जीवन प्रभावित होता है,बल्कि उसकी सामाजिक छवि भी ख़राब होती है ।

किसी को जीवन साथी बनाने या उससे अलग होने या रहने का फ़ैसला किसी भी व्यक्ति का निहायत निजी अौर आपसी सहमति से किया गया फ़ैसला होता है । बिना इस रिश्ते के संवेदनशीलता को समझे वग़ैर,मीडिया TRP बटोरने,मज़ाक़ उड़ाने,सामाजिक तौर पर ज़लील करने अौर चरित्र हनन करने जैसे वाहियात रिस्क लेता हुआ दिखाई देता है ।

मुख्यधारा के मीडिया से दो क़दम आगे बढ़कर इन दिनों सोशल मीडिया ( जिसे हम सामाजिक संवाद के अभिव्यक्ति का खुला अौर लोकतांत्रिक मंच कहते हैं ) इस तरह के रिश्तों के मामले में ‘Social Killar’ साबित हो रहा है । इसके कई उदाहरण नज़रों से टकरा रहे हैं ।
एेसे मामलों पर ‘सोशल मीडिया’ पर किये जाने वाले पोस्ट का भाव,भाषा अौर भंगिमा,निहायत सामाजिक,अमर्यादित,असहनीय,असम्मानजनक,निर्मम,संवेदनहीन अौर चरित्र हनन करने वाला होता है ।

भारत का पुरूषसत्तात्मक समाज ‘विवाह’ जैसी संस्था को ‘पवित्र बंधन’ तो मानता है,लेकिन स्त्री-पुरूष की आज़ादी,अधिकार अौर स्वतंत्र अस्तित्व को ‘मंगल सूत्र’ के ‘पगहे’ से उसे अपने ‘खूँटे’ में आजीवन बाँधे रखना चाहता है । स्त्री की कोख पर अपना मालिकाना हक़ समझता है अौर उसे बच्चा पैदा करने की अत्याधुनिक क्षमतावाली मशीन समझता है ।

तमाम घटनाएँ इस बात की गवाह हैं कि हमारा समाज सामंती अौर पुरूषसत्तात्मक जड़तावाद के नींव पर खड़ा है । यह किसी के मिलन से जितना ख़ुश नहीं होता,उतना उसके जीवन में आये अलगाव का जश्न मनाता है । इस खलनायकी चरित्र को समाज के हर कोने में देखा जा सकता है ।

कुंठीत सामंती अौर जड़तावादी पुरूषसत्तात्मक समाज स्त्री-पुरूष के बीच वैचारिक अौर सैद्धांतिक रिश्ते को सिरे से ख़ारिज करता दिखाई देता है । एेसा समाज स्त्री को ‘जीवन बंदी’ बनाकर रखने का प्रबल अौर अंतिम तौर पर पक्षधर होता है ।

यह समाज स्त्री-पुरूष के बीच स्वतंत्रत चेतना,स्वतंत्र अस्तित्व,स्वतंत्र निर्णय,स्वतंत्र जीवन,आपसी सहमति से जुड़ाव अौर स्वतंत्र अलगाव को स्वाभाविक तौर पर हज़म नहीं करता । इस निर्णय का सम्मान अौर इज़्ज़त भी नहीं करता । इसके बदले में पूर्वाग्रह अौर बदले की भावना से पीड़ित अमर्यादित हमलावर की भूमिका में दिखाई देता है ।

किसी के जीवन में आये खटास के बाद आपसी सहमति से सम्मानजनक,किन्तु,स्वतंत्र अौर निर्भीक तरीक़े से चुने गये रास्ते को आदमी के जीवन जीने की आज़ादी अौर अधिकार के नज़रिए से देखने की जगह,उसे कुंठाग्रस्त अौर अश्लील नरजिए से व्याख्यायित करता है अौर चरित्र हनन करते हुए ‘रसशास्त्र’ का वाचन करता है ।

हर आदमी के जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं । आपसी सहमति अौर असहमति । आपसी मतभेद से शुरू होकर मनभेद तक पहुँचे रिश्तों में बहुतेरे लोग इसमें संतुलन बैठा लेते हैं,अधिकतर लोग नहीं बैठा पाते । जीवन एक जलधारा की तरह है । जब तक इसमें प्रवाह है,तब तक यह प्रवाहमय है । जब इसमें ठहराव आता है। आपसी संवेदनाएँ सुखने लगती हैं । भावनाअों की पत्तियाँ झड़ने लगती हैं । जीवन के बसंत में पतझड़ का आगमन होने लगता है । संतुलित जीवन,अचानक असंतुलित होने लगता है । यह किसी भी मनुष्य के जीवन में सदमा देने वाला पल होता है ।

एेसी स्थित में आपसी सहमति के साथ जीवन में नये प्रवाह की तलाश करनी चाहिए । इस क़दम को स्त्री-पुरूष के बीच में आपसी रज़ामंदी से अलग होने के निर्णय को उनकी आज़ादी,स्वतंत्रता,अस्तित्व अौर नये रिश्तों का चुनाव को जायज़ अौर प्राकृतिक न्याय के नज़रिए से देखा जाना चाहिए ।

इस पहलकदमी को लोकतांत्रिक सामाजिक अौर अादरपूर्वक स्थान देना चाहिए । जो एेसा नहीं करते,इसका मतलब है या तो वो स्त्री को ग़ुलाम बनाकर या क़ैद करके रखते हैं या बंदूक़ के नोंक पर ।

स्त्री को स्वतंत्र नागरिक का दर्जा देने की जगह उसे व्यक्तिगत संपत्ति मानकर उसपर मालिकाना हक़ ज़माने वाला पुरूषसत्तात्मक समाज दरअसल अभी भी स्त्री के स्वतंत्र पहचान का दुश्मन बना हुआ है ।

प्रगतिशील सोच वाले पुरूष जो स्त्री के स्वतंत्र निर्णय अौर अस्तित्व का क़द्र करते हैं अौर सामाजिक स्पेस देते हैं,एेसे लोगों पर यथास्थितिवादी निर्मम हमला करते हैं । जैसा इन दिनों देखने को मिल रहा है ।

स्त्री-पुरूष संबंधों पर मीडिया का हमलावर होना उसके नैतिक,सैद्धांतिक अौर विश्वसनीयता के क्षरण का संकेत है । किसी के निजी जीवन में अनैतिक दख़लंदाज़ी अौर उसके निजता में ताकझांक स्वस्थ्य समाज का परिचायक नहीं है । मीडिया को अपनी चाल,चेहरा अौर चरित्र को बदलना पड़ेगा,नहीं तो यह अौर भयावह भविष्य का संकेत दे रहा है ।
@ आत्मबोध |

(लेखक मीडिया शिक्षक हैं और वर्तमान में ‘इग्नो’ में शिक्षण कार्य कर रहे हैं)

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