दरअसल दीपक चौरसिया पर व्यंग्य कर रहे थे सलमान-मनीष दूबे

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मनीष दुबे,डायरेक्टर-कंटेंट एंड एडिटर,यूटीवी स्टार्स




फिल्म पत्रकारिता की दुनिया में ‘मनीष दूबे’ एक जाना-पहचाना नाम है. आजतक,सहारा,स्टार न्यूज़ होते हुए आजकल ‘यूटीवी स्टार्स’ के जरिए बॉलीवुड स्टार्स और उनकी ख़बरों को दर्शकों तक पहुँचा रहे हैं. पेश है उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश:

मनीष दूबे से उनके पत्रकारिता के सफरनामे और फिल्म पत्रकारिता पर खास बातचीत :

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मनीष दूबे, डायरेक्टर,कंटेंट एंड एडिटर, यूटीवी स्टार्स

पुष्कर : पत्रकारिता के पेशे में आने की सबकी अपनी एक वजह होती है. आप इस पेशे में कैसे आ गए?
मनीष दूबे : महज इत्तेफाक . और कुछ नहीं. वैसे मैं अपने आप को पत्रकार नहीं बल्कि मीडिया प्रोफेशनल मानता हूँ.

पुष्कर : कैसा इत्तेफाक?

मनीष दुबे, फिल्म पत्रकार
मनीष दुबे, फिल्म पत्रकार

मनीष दूबे : इत्तेफाक …. ऐसे कि मैं मुंबई का एक लड़का था. जैसे की मुंबई शहर होता है. एक कल्चर सिखाता है कि स्कूल में ही आपको अपने पैरों पर खड़े होने की आदत होती है. दसवीं की पढाई पूरी हुई थी और यह था कि काम करना है. हाँ जिंदगी में कुछ ऐसे लोग जरूर मिले थे जिन्होंने कहा था कि जिंदगी में आगे बढ़ना है तो आपको अपने कदम आगे बढ़ाना होगा. ११ वीं से यानी कॉलेज के फर्स्ट इयर से ही छोटा – मोटा काम करना शुरू कर दिया था. मुझे याद है कि उस वक्त मैं साड़ियों के होलसेल मार्केट से रिटेल मार्केट तक साड़ियां और सैम्पल लाने – ले जाने का काम करता था. इससे एक चीज अच्छी हो गयी कि पैसे कमाने की एक आदत हो गयी. कॉन्फिडेंस बिल्ड अप होता गया कि आप कुछ कर सकते हैं. साथ में पढाई पूरी होती गयी. ग्रेजुएशन कम्प्लीट हुआ. वैसे पढाई करने के लिहाज से हरेक परीक्षा के पहले दो – तीन महीने की छुट्टी ले लेते थे और जमकर पढाई करते थे. इससे अच्छे से पास भी हो जाते थे. ऐसे ही सब ठीक चल रहा था. हाँ कॉलेज के दिनों से ही एक्स्ट्रा कैरिकुलम एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करने की बुरी लत लग गयी……….. (हँसते हुए)

क्रिकेट और दूसरे स्पोर्ट्स में भाग लेना. लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लेना. बोलने आदि में माहिर थे. यह सब जब खत्म हुआ तो अचानक पेपर में एक विज्ञापन आया था. दरअसल हमारे एक मित्र हैं मनोज सिंह. वो भी इसी फील्ड में हैं. उन दिनों मैं उतना अखबार नहीं पढ़ा करता था. अखबार पढ़ने की बजाये क्रिकेट के मैदान में रहना ज्यादा पसंद करता था. वह विज्ञापन मनोज सिंह ने देखा और मुझे कहा कि एक नौकरी आयी है.यह नौकरी एंकर –रिपोर्टर के लिए हैं. हिंदी अच्छी होनी चाहिए. क्यों नहीं हमलोग जाकर ट्राय कर लेते हैं. यह इन मुंबई की एड थी. वहां हमलोग इंटरव्यू देने गए तो एक – से – एक बुजुर्ग लोगों को बैठे पाया. हम किसी को जानते नहीं थे. लेकिन पूरे आत्मविश्वास से मैंने इंटरव्यू दिया और ट्रेनी रिपोर्टर बनकर लग गया. यहाँ से सफर की शुरुआत हुई और फिर पीछे पलटकर नहीं देखा. मेहनत करते गए और आगे बढते गए.

पुष्कर : पत्रकारिता के पेशे में आप इत्तेफाक से आये. लेकिन क्या फिल्म पत्रकार भी इत्तेफाक से ही बने? आपकी रुचि खेलों में थी तो आप खेल पत्रकार भी बन सकते थे.
मनीष दूबे : हाँ ये भी एक इत्तेफाक ही था. टेलीविजन में शुरुआती दौर में डेस्क पर काम किया. डेस्क पर काम करने का फायदा ये होता है कि आपको सारे क्षेत्र की एक बेसिक जानकारी हो जाती है. सो आप पॉलिटिकल, क्राइम आदि कर सकते हैं. डेस्क पर काम करने के दौरान यदि कोई रिपोर्टर नहीं आया तो डेस्क वालों को ही भेज दिया जाता था. उस वक्त मेरी दिलचस्पी चुकी स्पोर्ट्स में ज्यादा थी तो मैं ज्यादतर स्पोर्ट्स ही कवर किया करता था. दो साल तक इन मुंबई में काम करने के बाद लगा कि टेलीविजन को अब सीख लिया और अब कुछ नया करना चाहिए. अब इस काम में कोई एक्स्साईटमेंट नहीं रहा. अब फिक्सन में काम किया जाए. फिर मैंने सुरभि ज्वाइन किया. सुरभि दूरदर्शन पर आया करता था और सिद्धार्थ काक और रेणुका शहाने उसे एंकर करते थे. वहां मैंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करना शुरू किया. मैं न्यूज़ से आया था तो यहाँ का काम बहुत धीमा लगा. न्यूज़ में दिन में चार स्टोरी बनानी होती थी और यहाँ हफ्ते में एक-दो स्टोरी बनाती होती थी.दोनों में कोई तुलना ही नहीं थी. छह महीने काम करने के बाद जब सिद्दार्थ काक ने मुझे प्रोमोशन के साथ आठ हज़ार रुपये का चेक दिया. मैंने चेक लिया और साथ ही इस्तीफा देते हुए कहा कि दिया कि मैं दिल्ली जा रहा हूँ. यहाँ पर मन नहीं लग रहा. उसके बाद दिल्ली आया और रजत शर्मा जी के साथ काम शुरू किया. उस वक्त उनका चैनल नहीं आया था. वहां कुछ महीने काम किया , लेकिन दिल्ली समझ में नहीं आया. दिल्ली का खाना जरूर अच्छा लगा लेकिन बाकी थोडा गडबड लगा. सो वापस भागकर अपने शहर मुंबई आया. दो – तीन महीने बेरोजगारी में गुजरे. लेकिन फिल्म रिपोर्टिंग जैसी कोई चीज तबतक शुरू नहीं हुई थी. फिक्शन , डायरेक्शन थोडा बहुत जान गया था. उस वक्त के प्रोडक्शन हाउस प्लस चैनल नाम से हुआ करता था जो फिल्म से सम्बंधित कार्यक्रम बनाकर स्टार प्लस, दूरदर्शन आदि अलग – अलग चैनलों को दिया करता था. बजट की कमी की वजह से वह बंद हो रहा था. लेकिन उस समय भी दो शो ऑन एयर हो रहे थे. मुझे पता चला तो मैं वहाँ गया. उस समय एक पैकेज डील के तहत कार्यक्रम बनते थे जिसमें एक लंबी –चौड़ी टीम हुआ करती थी. उस प्रोडक्शन हाउस के मालिक अमित खन्ना थे जो बड़े फिल्म प्रोड्यूसर भी हुआ करते थे. उनसे मैंने कहा कि आप समय पर मुझे सैलरी दे दिया कीजियेगा , ये सारे शो में अकेले निकाल लिया करूँगा. सिनेमा – सिनेमा और जुबली नाम के दो शो हफ्ते में बनाना था. शो बनाने लगा. छह महीने यहाँ भी निकल गए. उसी दौरान फिल्म ‘मेला’ आयी थी और उसी सिलसिले में आमिर का इंटरव्यू लेने के लिए गया था. वहां पर मिलिंद खांडेकर से मुलाक़ात हुई. फिल्म से सम्बंधित इवेंट की कवरेज के लिए जब हम जाया करते थे तो कभी – कभार उनसे पहले भी मुलाकात हो जाया करती थी. इसलिए चेहरे से वे मुझे पहचानते थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि आजकल कहाँ हो? फिर कहा कि आजतक एक – डेढ़ साल में चौबीस घंटे का चैनल लाने वाला है. फिल्म रिपोर्टिंग करना चाहोगे. जाहिर सी बात है कि आजतक एक बेहतर विकल्प था तो मैंने हाँ कर दी. नकवी जी और जी कृष्णन ने इंटरव्यू लिया और आजतक में बतौर फिल्म रिपोर्टर भर्ती हो गयी. आजतक मुंबई की छोटी सी टीम थी जिसमें मेरे अलावा मिलिंद खांडेकर, मनोज थे और बाद में जीतेन्द्र दीक्षित भी आ गए. हालाँकि मेरी भर्ती फिल्म रिपोर्टर के तौर पर हुई थी लेकिन हमलोग आजतक के लॉन्च होने के पहले सबकुछ कवर किया करते थे. मैंने कई इंटरनेशनल मैच वगैरह भी कवर किये हैं. लेकिन आजतक लॉन्च होने के बाद पूरी तरह से फिल्म पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ.

पुष्कर : पत्रकारिता और फिर फिल्म पत्रकारिता में आप इत्तेफाक से आये. लेकिन जब फिल्म पत्रकारिता का सफर शुरू हो गया तो कभी सोंचा था कि सफलताएं इतनी जल्दी – जल्दी मिलते जायेगी और एक दिन आप सबसे कम उम्र के सिनेमा संपादक बन जायेंगे.
मनीष दूबे : फिल्म पत्रकारिता में आने के बावजूद मैंने ऐसी सफलताओं की कोई उम्मीद नहीं की थी. सच तो ये हैं कि उस ज़माने में मुझे फ़िल्में बिलकुल पसंद नहीं थी. मैं जहाँ रहता था वहीँ पर सवेरा टॉकिज नाम का एक हॉल हुआ करता था. तीन शो में वहां फ़िल्में चला करती थी. मेरे दोस्त फ़िल्में देखने जाया करते थे और मैं माँ से पूछता था कि लोग फ़िल्में देखने क्यों जाते हैं? फिल्म देखने के लिए लोग वक्त कैसे निकाल लेते हैं. फिल्म देख कर उन्हें हासिल क्या होता है. वह अमिताभ बच्चन हैं तो मैं भी तो वही हूँ. मतलब इंसान हूँ. दरअसल स्टारडम का क्रेज मुझे कभी रहा. कभी शूटिंग होते देख लोग देखने के लिए भागने लगते थे तो मेरी समझ में सवाल उठता है कि लोग ऐसे क्यों जा रहे हैं? आखिर शूटिंग और एक्टर को देखकर हासिल क्या होगा. उसमें इंटरटेनमेंट क्या है? बचपन से ही ऐसी मेरी सोंच रही. फायदा ये हुआ कि फिल्म कवरेज के पहले दिन से ही मैं किसी स्टार के स्टारडम के दवाब में नहीं आया. इसलिए कोई भी सवाल पूछना हो तो मैं बेहिचक पूछ लेता. चुकी अब फिल्म रिपोर्टिंग ही काम बन गया तो उसपर और मेहनत की. पढाई की और आगे का सफर जारी रहा. लेकिन यह मेरे लिए पैशन कभी नहीं रहा. हाँ मेहनत करते गए और सफलता मिलती चली गयी.




पुष्कर : आपने अभी कहा कि स्टारडम से प्रभावित नहीं होते थे और आपके मन में ये सवाल उठता था कि आखिर लोग स्टार के पीछे क्यों भागते हैं? अब जब अमिताभ बच्चन, आमिर, शाहरुख या सलमान खान जैसे बड़े सितारों से बातचीत करते हैं तो आपको नहीं लगता कि आप गलत थे?
मनीष दूबे : नहीं. मैं गलत नहीं था और न मेरी सोंच बदली है. हां सम्मान की दृष्टि से एक स्तर पर अमित जी के लिए मैं अंतर मान सकता हूँ. क्योंकि वे मेरे पिता के उम्र के हैं. मेरे पिता के भी सुपरहीरो हैं. इसलिए वे इकलौते ऐसे हीरो हैं जिन्हें मैं शाहरुख या सलमान नहीं कह सकता. मैं उन्हें हमेशा अमित जी ही कहूँगा. हालाँकि फिल्म पत्रकारिता में सिखाया जाता है कि यहाँ जी या श्री नहीं होता. इसलिए मेरे कभी शाहरुख जी या सलमान जी कभी नहीं थे. लेकिन अमित जी यक़ीनन थे. मैंने उन्हें अमिताभ बच्चन कभी नहीं होगा.यह एक अंतर है.


पुष्कर : आपने जैसा कहा कि फिल्म पत्रकारिता में जी या श्री की कोई परिपाटी नहीं है. लेकिन किसी स्टार के लिए सम्मानसूचक शब्दों का इस्तेमाल करना क्या गलत है? सलमान या शाहरुख को जी क्यों नहीं कह सकते?

मनीष दूबे : क्या हम सोनिया गांधी को सोनिया जी कहते हैं, क्या हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री मनमोहन जी कहते हैं? क्या लालू प्रसाद यादव को जी लगाते हैं? टेलीविजन पत्रकारिता में ऐसा ही होता है. बेसलाइन एकदम क्लियर होना चाहिए और उसमें एडजेकटीव नहीं होना चाहिए. फिर जब मनीष दुबे फिल्म पत्रकार शाहरुख या सलमान के सामने बैठा है तो वह सिर्फ मनीष दुबे नहीं है. वह एक संस्थान को रिप्रेजेंट कर रहा है और इस हिसाब से उसका कद सलमान या शाहरुख से कम नहीं. इसलिए यदि मैं शाहरुख को ‘जी’ बोलता हूँ तो शाहरुख को भी मुझे ‘जी’ बोलना चाहिए. यदि शाहरुख मुझे जी नहीं कहते तो मैं भी उन्हें जी नहीं कहना चाहूँगा. हाँ अमित जी (अमिताभ बच्चन) इसके अपवाद जरूर हैं. लेकिन आदर का भाव एक – दूसरे के प्रति जरूर होना चाहिए.

पुष्कर : मशहूर पत्रकार दीपक चौरसिया जब एबीपी न्यूज़ में हुआ करते थे तब उन्होंने सलमान खान का एक इंटरव्यू लिया था. उस इंटरव्यू में सलमान खान दीपक को बार – बार सर – सर कहकर संबोधित कर रहे थे. वैसे पत्रकारों के साथ रुखाई के लिए सलमान जाने जाते रहे हैं लेकिन दीपक को ………..
मनीष दूबे : दरअसल वह एक टॉन्ट था. आपलोगों को ऐसा लग रहा होगा कि सर बोल रहे हैं. लेकिन जो लोग सलमान को जानते हैं वो सर का मतलब आसानी से निकाल सकते हैं. दीपक मेरे दोस्त हैं. उन्हें ये बात बुरी लग सकती है. लेकिन जो सर था उसमें एक नाराजगी और खीज थी. सलमान ‘सर’ सिर्फ ‘सर’ कहने के लिए कह रहे थे.


पुष्कर : अब वापस आपके पत्रकारिता के सफरनामे पर वापस आते हैं. आप आजतक में सबसे कम उम्र के सिनेमा संपादक बन गए. उसके बाद जहाँ तक मेरी जानकारी है आप सहारा समय चले गए. क्या वजह रही?

मनीष दूबे : देखिए मैं कभी पत्रकार नहीं बनना चाहता था और न बनना चाहता हूँ. मैंने एक प्रोफेशन को चुना जो टेलीविजन था. मैं मीडिया प्रोफेशन अपने आप को मानता हूँ. लेकिन मैंने कभी नहीं सोंचा कि किसी चैनल को मैं हेड करूँगा. लेकिन आजतक छोड़कर सहारा में जाना मेरा ट्रांजिशन (transition) का पीरियड था. मैं बेहतर से बेहतर मीडिया प्रोफेशनल बनना चाहता था और एक जगह लगातार काम करके ऐसा होना संभव नहीं हो पाता. मेरा निजी तौर पर मानना है कि आपकी जो सोंच और रचनात्मकता है वह एक संस्थान में लगातार काम करते हुए एक जगह पर आकार रुक जाती है. अगर आपको अपना अनुभव बढ़ाना है तो आपको अलग – अलग जगह पर काम करना होगा. यही वजह रही कि मैंने आजतक में सिनेमा संपादक बनने के बाद सहारा में जंप लिया. वहाँ जाने की वजह साफ़ थी कि एक नया अनुभव हासिल करना और अपने आप को परखना कि मनीष दुबे सिर्फ फिल्म पत्रकार ही है या उसके आगे भी कुछ हूँ. क्या मैं चैनल लॉन्च कर सकता हूँ और उसे चला भी सकता हूँ ? ऐसे कई सवाल थे जिनका जवाब खुद मुझे भी जानना था. सहारा समय – मुंबई में जाने की यही वजह रही.

पुष्कर पुष्प: लेकिन लंबे समय तक आप सहारा में नहीं टिक सके. क्या वजह रही?
मनीष दुबे : सहारा का अनुभव अच्छा रहा. काफी कुछ सीखने को मिला. लेकिन कुछ ऐसी वजह रही कि मैंने फिर अलग होना ही ठीक समझा. फिर सहारा में मैं एक डेडलाइन लेकर ही गया था कि इतने लेवल तक ही एक्सपेरिमेंट करूँगा. वैसे भी एक एक स्तर के बाद आप अपने करियर से खिलवाड़ नहीं कर सकते. सहारा में काफी कुछ सीखा,लेकिन अब वहां प्रयोग करने की डेडलाइन पूरी हो चुकी थी. इसलिए सहारा छोड़कर स्टार न्यूज़ ज्वाइन करना पड़ा. साल-डेढ़ साल के बाद फिर आजतक में वापसी हुई. यूँ भी निजी तौर पर आजतक हमेशा से मेरे लिए घर की तरह रहा है. वहां एक नया बॉलीवुड शो लॉन्च किया. लेकिन दो-तीन साल बाद फिर वही सवाल आ खड़ा हुआ कि आगे क्या? तब बॉलीवुड चैनल लॉन्च कराने आ गए और अब ‘यूटीवी स्टार्स’ में हैं.

पुष्कर :पहले २४ घंटे के समाचार चैनल के लिए आपने बॉलीवुड कवर किया और अब २४ घंटे के बॉलीवुड चैनल के लिए बॉलीवुड कवर कर रहे हैं. दोनों के कवरेज में किसी तरह का अंतर पाते हैं?
मनीष दूबे :कवरेज के लिहाज से अंतर है. वहां पर मैं एक ट्रेन में बैठकर एक पेंटिंग बनाता हूँ. यहाँ पर मैं बड़े इत्मीनान से रिसर्च कर और अपनी पूरी क्रिएटिविटी लगाकर एक पेंटिंग बनाता हूँ. अब मुझे पता है कि मुझे ‘पुष्कर’ की आकृति बनानी है तभी मैं बनाता हूँ. न्यूज़ चैनलों में जो देखता था उसका सिर्फ रिफ्लेक्शन दिखाता था. समाचार चैनलों में राखी सावंत दिखाना एक मजबूरी थी लेकिन यहाँ पर राखी सावंत को दिखाना मजबूरी नहीं. यहाँ ब्रांड वैल्यू पर काम होता है और यदि इस ब्रांड में राखी सावंत या वीणा मल्लिक नहीं आती तो नहीं आती. कहने का मतलब है कि यहाँ नंबर के लिए नहीं बल्कि ब्रांड के लिए काम किया जाता है. वो ब्रांड जो लोगों को पसंद आए और उसे देखने के बाद ऐसा लगे कि उसने करण जौहर की फिल्म देखी है.

पुष्कर : ज़ूम और E24 के रूप में दो बॉलीवुड चैनल पहले से है. अब यूटीवी स्टार्स लॉन्च हुआ. प्रतिद्वंदिता कड़ी है. ऐसे में यूटीवी स्टार्स को दर्शकों से कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है? क्या दर्शक चैनल के कॉन्सेप्ट को पसंद कर रहे हैं?
मनीष दूबे : हाँ बिल्कुल. दर्शक यूटीवी स्टार्स को पसंद कर रहे हैं. क्योंकि हमारे जो चैनल का सुर है वो दूसरे चैनलों से बिल्कुल अलग है. ‘टच’,’फील’और ‘बिलीव’ का हमने जो दर्शकों से वादा किया है उसे पूरा कर रहे हैं और दर्शक इसे पसंद भी कर रहे हैं.

पुष्कर : क्या न्यूज़ चैनलों की तरह बॉलीवुड चैनलों की भी बाढ़ आ जाएगी?
मनीष दूबे : नहीं ऐसा नहीं होगा. बॉलीवुड की ख़बरों को न्यूज़ चैनलों के अलावा मनोरंजन चैनल, म्यूजिक चैनल आदि में भी समान रूप से तवज्जो दी जाती है. अब वेब और मोबाईल के रूप में एक नया माध्यम विकसित हो रहा है. सैटेलाईट चैनल पर जितना होना था हो चुका है.

पुष्कर :15 साल से आप टेलीविजन फिल्म पत्रकारिता में हैं? 15 साल पहले की फिल्म पत्रकारिता और अब की फिल्म पत्रकारिता में क्या अंतर पाते हैं?
मनीष दूबे :इतने सालों में कवरेज बदला है. अंदाज़ बदला है. व्यूअर का टेस्ट बदला है. लोगों का एप्रोच बदला है. फिल्म पत्रकारिता भी बदली है.

पुष्कर : फिल्म पत्रकारों पर ‘पीआरओ’ का कितना दवाब होता है?
मनीष दूबे : व्यक्तिगत स्तर पर मुझे ‘पीआरओ’ का ऐसा कोई दवाब नहीं दिखता. कम-से-कम मुझे ऐसा अनुभव नहीं हुआ. हाँ पर ऐसा भी नहीं है कि कोई दवाब ही नहीं होता. आपके अपनी संस्थान या फिर प्रोड्यूसर या एक्टर की तरफ से दवाब हो सकता है.

पुष्कर : अच्छा सोशल मीडिया का फिल्म पत्रकारिता पर क्या असर पड़ा है? क्या सोशल मंडिया ने पत्रकारों के दायरे को सीमित कर दिया है? बॉलीवुड स्टार्स ट्वीट करते हैं और फिल्म पत्रकार उसको फौलो करते हैं. क्या फिल्म पत्रकारों दायरा यही तक सीमित होकर रह गया है?
मनीष दूबे : बिल्कुल, सीमित कर दिया है. लेकिन यही पर आपके स्किल्स की परीक्षा होती है. अमिताभ या शाहरुख तो वही ट्वीट करते हैं जो उन्हें करना है. लेकिन पत्रकार की तो यह भूमिका नहीं. उन्हें इसके पीछे की सच्चाई को दिखाना और बताना है. उसे दिखाने के लिए किसी सोशल मीडिया की कोई जरूरत नहीं.

[box type=”info” bg=”#ffbb01″](यह इंटरव्यू काफी पहले लिए गया था. लेकिन ऑडियो रिकॉर्डर के गुम हो जाने की वजह से अबतक इस इंटरव्यू को प्रकाशित नहीं जा सका था. अब जब इंटरव्यू का ऑडियो हमें किसी तरह मिल गया है तो इसे प्रकाशित कर रहे हैं.)[/box]

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