उत्तराखंड सरकार ने फेंके टुकड़े, चैनलों ने जुबान बंद कर ली

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उत्तराखंड में आयी बाढ़ से तबाही में मरनेवालों की संख्या हजारों में है लेकिन टेलीविजन स्क्रीन पर ये संख्या सवा सौ के आंकड़े तक जाकर सिमट गयी है. इक्का-दुक्का करके ये संख्या बढ़ रही है लेकिन अब हरियाणा सरकार के पानी छोड़े जाने के कारण यमुना के जलस्तर बढ़ने पर खबर उत्तराखंड में बाढ़ की जगह दिल्ली में शिफ्ट होती जा रही है. जाहिर है उत्तराखंड में जिस बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, उसके मुकाबले दिल्ली में आशंका ज्यादा है, दुर्घटनाएं बहुत ही कम लेकिन टीवी स्क्रीन पर अब दिल्ली ही दिल्ली है और देखते रहिए, एकाध दिन के भीतर उत्तराखंड गायब ही हो जाएगा.

जो लोग उत्तराखंड की खबर पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, उन्हें ये सब किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा होगा और ऐसे में टीवी चैनलों की इस पूरी ट्रीटमेंट को किसी रियलिटी शो या आइपीएल के पैटर्न से अलग नहीं मान रहे होंगे लेकिन इस चमत्कार के पीछे के सच को जानने के बाद आप इन चैनलों और सरकार के घिनौनपन पर अफसोस जाहिर करने के अलावे कुछ नहीं कर सकते. आपको ये समझने में बिल्कुल परेशानी नहीं होगी कि पैसे के दम पर मरनेवालों की संख्या न केवल घटायी जा सकती है बल्कि आदमी के मरते जाने के बीच सिर्फ मंदिरों,घाटों,गुंबदों के ध्वस्त होने की खबर को लीड स्टोरी बनाकर पूरे उत्तराखंड को देवताओं की रियल इस्टेट में तब्दील किया जा सकता है..इस राज्य की ऐसी तस्वीर पेश की जा सकती है कि जो भी तबाही हुई है वो निर्जीव मंदिरों, पत्थरों से जुटाए चबूतरों और हिन्दू धर्मस्थानों की हुई है, इनके बीच इंसान कहीं नहीं है. पिछले तीन-चार दिनों से पावरोटी की तरह भसकरकर गिरती इमारतों के बीच आपके मन में भी कभी तो सवाल आया होगा कि इनमें रहनेवाले लोगों का क्या हुआ होगा..लेकिन नहीं.अगर आप ये सब जानने की कोशिश करेंगे औऱ वो भी न्यूज चैनलों के जरिए तो आपको बहती धार में शिव की मूर्ति के टिके रहने के अलावे कोई दूसरी फुटेज नहीं मिलेगी. इसकी वजह ये बिल्कुल नहीं है कि जब उत्तराखंड में हजारों की जानें जा रही है तो नोएडा फिल्म सिटी के मीडियाकर्मी सीसीडी में बैठकर कॉफी पी रहे हैं, दर्जनों मीडियाकर्मी वहां मौजूद हैं लेकिन उन्हें पूरी तरह निर्देशित कर दिया गया है कि चाहे कुछ भी दिखाओं, लोगों को मत दिखाओ. ऐसा करने के लिए चैनलों के मुंह में लाखों रुपये पहले से ठूंस दिए गए हैं.

उत्तराखंड से प्रकाशित लोकजन टुडे( सांध्य दैनिक) के अभिषेक सिन्हा ने इस संबंध में विस्तार से रिपोर्टिंग की है जिसे कि अखबार ने शर्म करो सरकार शीर्षक से प्रकाशित किया है. अभिषेक सिन्हा ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जब उत्तराखंड के लोग बिना पानी के, खाना के, छत के भटक रहे हैं, मरने की स्थिति में थे तो वहां कि सरकार ने इन बुनियादी सुविधाओं पर पैसे खर्च करने के बजाय क्षेत्रीय चैनलों का पेट लाखों रुपये देखकर भरने का काम किया. रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान सरकार ने क्षेत्रीय चैनलों को अपना मुंह बंद रखने के लिए कुल 1 करोड़ चौदह लाख के विज्ञापन दिए. मरनेवालों की संख्या और भारी तबाही की वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग न करने के बदले सरकार का गुणगान करने के लिए कुल चार विज्ञापनों का प्रसारण शुरु हुआ जिसे कि बाद में दो को बंद कर दिया गया. ऐसी आपदा के बीच सरकार का काम विज्ञापन के पीछे पानी की तरह पैसे बहाने का नहीं होना चाहिए था लेकिन छवि निर्माण की राजनीति के बीच उसे ये काम ज्यादा जरुरी लगा और लोगों की वाजिब चिंता करना नहीं. नतीजा, हमारे सामने है…

टेलीविजन स्क्रीन पर चली रही खबरों पर थोड़ी सावधानी से नजर डालें तो सहज ही अंदाजा लग जाता है कि उत्तराखंड में बाढ़ की खबर पूरी तरह मैनेज है. ऐसा कैसे हो सकता है कि इतनी बड़ी-बड़ी इमारतें, धार्मिक स्थान और मंदिर स्वाहा होते जा रहे हों और मरनेवालों की संख्या एक-दो करके बढे. इंडिया न्यूज से लेकर एबीपी,आजतक,इंडिया टीवी जैसे चैनल क्यों लगातार सिर्फ हिन्दू धार्मिक स्थलों के टूटने,तबाह होने ी खबर दिखाते आ रहे हैं और पूरे उत्तराखंड को इस तरह से दिखा-बता रहे हैं जैसे कि यहां हिन्दुओं के तीर्थ स्थल के अलावे कुछ है ही नहीं. तथ्यात्मक रुप से ये अगर सही है कि विज्ञापन देने का काम सिर्फ क्षेत्रीय चैनलों को किया गया, राष्ट्रीय चैनलों को नहीं तो ये अटकलें लगाना कि वो भी मैनेज हैं, सही नहीं होगा. लेकिन बिजनेस के लिहाज से देखें तो खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है कि कहावत यहां ज्यादा सटीक बैठती है. राष्ट्रीय स्तर के चैनलों के ब्यूरो के बीच जब ये खबर लगी कि क्षेत्रीय चैनलों को सरकार की छवि बेहतर करने और बाढ़ की खबर को मैनेज करने के लिए लाखों रुपये बांटें जा रहे हैं तो बेहतर है कि ये काम हमें पहले ही शुरु कर देने चाहिए. वैसे भी चैनलों के लिए राजनीतिक पार्टियां लोकतंत्र का हिस्सा बाद में, बिजनेस क्लाइंट पहले है. इधर, दिल्ली में लगातार बाढ़ की तबाही बताकर खबरें तेज करने के पीछे की रणनीति हो सकती है कि पूरे देश में दिल्ली और बाढ़ को इस तरह से पोट्रे करो कि सरकार सांसत में पड़ जाए. जाहिर है जिस तरह आज चैनलों ने वोट में बिठाकर लाइव रिपोर्टिंग की है, आजतक जैसे चैनल ने यमुना से लाइव जैसे फैशन परेड अपने संवाददाताओं से कराए हैं, उसके पीछे पैनिक माहौल पैदा करके सरकार को इस मनोदशा में लाना है कि वो भी उत्तराखंड सरकार जैसी रणनीति अपनाए. जाहिर है, दिल्ली में फिलहाल उत्तराखंड जैसी स्थिति नहीं होने जा रही है..ऐसे में जैसे ही दो-तीन दिनों के भीतर स्थिति सामान्य होगी, उल्टे चैनल लगातार कवरेज का असर की पट्टी चलाकर क्रेडिट लेने से नहीं चूकेंगे.

विनीत कुमार, मीडिया विश्लेषक
विनीत कुमार, मीडिया विश्लेषक

गौर करें तो राष्ट्रीय चैनल उत्तराखंड में जहां क्षेत्रीय चैनलों की देखादेखी आप ही मैनेज हो रहे हैं तो वहीं दिल्ली की खबर पर शिफ्ट होकर उस मध्यवर्ग की आंडिएंस का ध्यान अपनी ओर खींचने में लगे हैं जिनका सरोकार दिल्ली जैसे शहर से उत्तराखंड के मुकाबले ज्यादा है. इस शहर के साथ किसी भी खबर के जुड़ने का मतलब खबर का राष्ट्रीय होना है तो वही दूसरी तरफ सरकार की अंटी से झटकने के अवसर भी..मौत की रेलमपेल के बीच भी चैनल किस तरह संवेदना और तथाकथित अपने सरोकारों का धंधा करते हैं, दर्द,कराह,चीख के बीच से राजस्व पैदा करते हैं, ये सब जानकर आप अपने चौथा खंभे के प्रति उतनी ही हिकारत करेंगे, उतनी ही नफरत करेंगे जितना कि हिन्दी सिनेमा के खलनायक को देखकर करते हैं.

एक स्थानीय अखबार में छपी रिपोर्ट
एक स्थानीय अखबार में छपी रिपोर्ट

1 COMMENT

  1. My Cousin was there in Kedarnath with her 2 children. we finally found her today. she explained there are dead bodies all around more than stones. everywhere you see there are deadbodies. Channels barking there were 200+ dead only whereas the actual figure is more than 10000 certainly.

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