ट्रेन से दिल्ली आते समय जब आप गाजियाबाद क्रॉस करते हैं तो बड़े – बड़े अक्षरों में आपको एक खास तरह का विज्ञापन दीवालों पर लिखा मिलेगा. ये विज्ञापन तरह –तरह के नीम हकीम और उनके नुस्खे से संबंधित होते हैं जो मर्दानगी से निपटने के उपाय बताती है.
मर्दानगी, शीघ्रपतन से लेकर बेटा पैदा करने की दवाई तक होने का ये दावा करते हैं. लेकिन अब ऐसे विज्ञापन गाजियाबाद की दीवारों तक ही सीमित नहीं रह गए हैं. उनका दायरा बढ़ गया है.
वे शक्ल बदलकर टीवी स्क्रीन तक आ धमके हैं और अपना जाल बखूबी फैला रहे हैं. इसका नमूना तब दिखाई पड़ता है जब रात 12 बजते ही ‘पावर प्राश’ के रूप में न्यूज़ चैनलों पर इनका विज्ञापन चलने लगता है.
"बड़ी " खबर क्या होती है?
“बड़ी ” खबर क्या होती है? क्या उसे बार-बार ” बड़ा” कहने से उसका आकार वाकई इतना बढ़ जाता है। टीवी न्यूज पुनरावत्ति की शिकार बनती जा रही है।
उससे खबर की गंभीरता, उसका आकार और उसकी मह्त्ता बढ़े न बढ़े, वह खीज का रूप लेने लगती है।
खबर की कमी के बीच अलग तरह की किसी भी घटना का घट जाना और फिर उसे महाकाय बनाकर शब्दों की जुगाली करते जाना मीडिया के उत्तेजित होते स्वभाव पर मोहर लगाती है और उन सबके बीच जब राजनीतिक प्रवक्ता भी राग-विराग में शामिल हो जाते हैं तो कई बार न खबर छोटी रहती है न बड़ी, वो तो खुद ही कहीं खो जाती है.
(डॉ. वर्तिका नंदा के फेसबुक वॉल से)