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सुधीर चौधरी ने भाजपा कार्यकर्ता की तरह योगी आदित्यनाथ का इंटरव्यू लिया

yogi aditynath interview

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ का आज जी न्यूज़ पर टीवी इंटरव्यू प्रसारित हुआ. इस इंटरव्यू को जी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी ने लिया. लेकिन इस इंटरव्यू में सवाल-जवाब का जो सिलसिला था वो बेहद निराशाजनक था. मतलब चुभने वाले सवालों की बड़ी कमी थी. दोस्ताना इंटरव्यू चल रहे थे. चुभने वाले काउन्टर सवालों का अभाव था. इसीलिए आईआईएमसी में सेमीनार के पहले यज्ञ कर विवादों में आए पत्रकार आशीष कुमार अंशु अपने एफबी वॉल पर लिखते हैं –

सुधीर चौधरी का योगी आदित्यनाथ के साथ साक्षात्कार देख रहा हूँ। ऐसा नहीं लग रहा कि कोई पत्रकार बात कर रहा है। सुधीर बीजेपी कार्यकर्त्ता की तरह बात कर रहे है।

बहरहाल देखिए इंटरव्यू और स्वयं ही निर्णय लीजिये.

विनोद कापड़ी का सवाल,क्या प्रधानमंत्री ऐसे गालीबाजों को फ़ॉलो करते हैं ?

वरिष्ठ पत्रकार विनोद कापड़ी ने फेसबुक और ट्विटर के जरिए एक अहम् सवाल उठाया है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर पर गाली-गलौज करने वालों को फ़ॉलो करते हैं? हालाँकि ये सवाल नया नहीं है. पहले भी कई वरिष्ठ पत्रकार सबूतों के साथ इस मसले पर पीएमओ और प्रधानमंत्री को टैग कर चुके हैं. लेकिन जवाब कभी नहीं आया.

दरअसल मामला गायक अभिजीत के ट्विटर एकाउंट के बंद करने से शुरू हुआ. इस खबर को विनोद कापड़ी ने शेयर किया तो कई लोग नाराज़ हो गए और उन्हें भद्दी-भद्दी गालियाँ देने लग गए. इनमें से कई ऐसे हैं जिनके प्रोफाइल पर दावा किया गया है कि उन्हें प्रधानमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह फ़ॉलो करते हैं. इन्हीं के स्क्रीन शॉट को शेयर करते हुए विनोद कापड़ी लिखते हैं.

महान भारत देश के अब तक के महानतम प्रधानमंत्री Twitter पर ज्यादातर ऐसे लोगों को फ़ॉलो करते हैं , जिनके लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल और गाली देना आम बात है। आप भी देखिए।

मीडिया का चश्मा ‘भारतीय’ नहीं रह गया है

ashutosh kumar singh
ashutosh kumar singh

आशुतोष कुमार सिंह

20 मई, 2017 पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा। भारत में रहकर अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और पाकिस्तान के राष्ट्रीयधारा के अनुकूल रिपोर्टिंग करने वालों की धौस, मौज और स्वार्थपरता को धता बताते हुए पहली बार ब्यापकता एवं सार्थकता के साथ मीडया की वर्तमान स्थिति पर विचार-विमर्श किया गया। इसका गवाह भारतीय जनसंचार संस्थान बना।

सुबह -सुबह यज्ञ का आयोजन किया गया। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यज्ञ के बहुत से फायदे हैं। आज जब पूरा विश्व मानसिक रूप से अस्वस्थ होता जा रहा है, वैसे में यज्ञ और योग ही उसे समष्टिगत रूप से स्वस्थ रख सकता है। इस लिहाज से आयोजन पूर्व यज्ञ का होना सकारात्मकता को बढ़ाने जैसा है। कुछ छात्र इस यज्ञ का विरोध कर रहे थे। उन्हें शायद नहीं मालूम की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, जहाँ पर सभी नागरिकों को अपने धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा करने का मौलिक अधिकार मिला हुआ है। विरोध कर के वे भारतीय संविधान की मूल आत्मा पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, यह भान उन्हें शायद नहीं था। इन्हें आप भटके हुए युवा कह सकते हैं। अतः इनके साथ नरमी और प्यार से पेश आने की जरुरत है। साथ ही हमें अपनी उस कमी पर भी चिंतन करने की जरुरत है, जिसके कारण हम इन युवाओं में भारतीय संविधान और भारतीय संस्कृति के प्रति सकारात्मक भाव नहीं भर पाएं हैं।

मीडिया और मिथ विषय पर पूरे दिन चले चर्चा परिचर्चा में यह बात निकल कर आई की मीडिया का चश्मा भारतीय नहीं रह गया है।ऐसे में एक गंभीर सवाल यह भी है की मीडिया का भारतीय चश्मा कहीं खो गया है?, या कभी भारतीय चश्मा बना ही नहीं! दोनों ही स्थिति भारत के हित में नहीं है। ऐसे में जरुरत इस बात की है की मीडिया के चक्षुदोष की जाँच किसी विशेष आँख वाले चिकित्सक से कराइ जाये और दोष के अनुरूप उसके चश्मे की संख्या दी जाये। अगर उसका आँख भारतीय सन्दर्भ को बिलकुल ही देखने में असमर्थ है तो किसी भारतीय नेत्रदाता की शरण ली जाये।

यहाँ यह समझना जरुरी है की भारत में जन्मा प्रत्येक जन भारत के नागरिक हैं। उनके प्रत्येक कृत्य-कुकृत्य का असर भारत की पहचान से जुड़ती है। अगर आप भारतीय हैं और राष्ट्रीयता के भाव के विपरीत आचरण कर रहे हैं तो यह चिंतनीय स्थिति है। यह बात भारत की मीडिया पर भी लागू होता है। अगर आप भारत में रहकर, भारत के आवरण में साँस लेकर, उसी आवरण को दूषित करने का काम करते हैं तो निश्चित रूप से राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणा से आप कोसों दूर हैं। आपको यह दूरी कम करने की जरुरत है।इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय जनसंचार संस्थान में #मीडिया_स्कैन द्वारा आयोजित यह परिसंवाद बहुत ही सार्थक दिशा देगा।

आशुतोष कुमार सिंह
सदस्य, संपादक मंडल, मीडिया स्कैन
संयोजक-स्वस्थ भारत अभियान
संपर्क 9891228151

IIMC के बाहर हुए प्रदर्शन का वीडियो

IIMC में यज्ञ के नाम पर कम-से-कम पर्यावरण और संस्कृति का तो ख्याल रखते

IIMC
IIMC में यज्ञ

IIMC में हुए यज्ञ की तस्वीरें देखी. सहमति-असहमति से हटकर यहां सिर्फ और सिर्फ यज्ञ किए जाने के पारंपरिक तर्क पर टिककर भी इस तस्वीर से गुजरें तो मन उदास हो जाता है और उतना ही चिंतित भी.

बहुत ही छोटे स्तर पर किए गए इस यज्ञ में( खबर चाहे भले ही राष्ट्रीय बन गयी हो) भी चारों तरफ पॉलिथीन,डिस्पोजल ,प्लास्टिकऔर तो और मोबाईल पडे हैं. कहीं कोई द्र्व्य नही .स्वाभाविक है कि बाकी चीजें पॉलीथीन में ही आएंगी लेकिन क्या इन्हें केले के पत्ते, पत्तियों के दोने बनाकर नहीं रखे जा सकते थे ? परिसर में इन सबकी कमी तो नहीं होगी ? और जिस सज्जन ने सामने टिकाकर मोबाईल रख दिया, वो थोडी देर के लिए व्हॉट्स अप मैसेज न देख पाने के लोभ का संवरण नहीं कर सकते थे.

यज्ञ एक श्रमसाध्य अनुष्ठान है. इसकी तैयारी में कई-कई दिन लग जाते हैं. याद कीजिए राम की शक्ति पूजा और वो पंक्ति- माता कहती थी मुझे राजीवनयन. एक सौ आठवें कमल की चोरी हो जाने पर राम ने अपनी एक आंख अर्पित करने का मन बना लिया. ये थी यज्ञ के प्रति आस्था.

लेकिन तस्वीरें कोताही की कहानी साफ शब्दों में बयान कर रही हैं. मीडिया संस्थान में कपडे को रिप्लेस करके अखबार बिछाए जाने से आपकी धार्मिक और पत्रकारीय भावना तो आहत होगी ही.

यज्ञ के प्रति आस्था- अनास्था के सवाल में न भी जाएं तो पर्यावरण के प्रति सचेत रहना तो केन्द्रीय चिंता होनी ही चाहिए. जिस अंदाज में हंगामा हुआ( आयोजक और इनसे असहमति दर्ज करनेवाले दोनों ओर से ) लगा कि संस्थान परिसर में यज्ञ के बहाने हिन्दू संस्कृति की भव्यता को इस अंदाज में पेश किया जाएगा कि घोर नास्तिक भी रंगों की विविधता और प्रकृति के प्रति लगाव को देखकर थोडे वक्त के लिए ही सही, भावुक हो उठेगा. लेकिन

लोहे के बने छोटे से पोर्टेबल कुंड से उठते धुएं को देखकर मैं बुरी तरह आहत हो गया. अपनी विराट संस्कृति का ये लघु रुप देखकर कोई भी उदास हो जाएगा. गांव-घर में सत्यनारायण स्वामी की कथा मे भी जो कि परिवार के स्तर पर की जाती है, कई गुना ज्यादा तैयारी, प्रकृति और सांस्कृतिक रंगों के प्रति सजगता रहती है. इसमें कहीं से अतीत की ओर लौटने के चिन्ह नजर नहीं आते. हां महानगर के दवाबों के बीच खानापूर्ति का सेट पैटर्न की मौजूदगी जरुर है.

ऐसे में जितने लोग आईआईएमसी जैसी जगह में यज्ञ कराने से जितने लोग आहत हुए, उससे कहीं ज्यादा यज्ञ की तस्वीरें देखकर दुखी होंगे. टीवी दर्शक के दिमाग में यज्ञ की जो छवि बनी है वो बुरी तरह ध्वस्त होगी.

होना तो ये चाहिए था कि यज्ञ के नाम पर जितना हंगामा हुआ, कम से कम उनकी तस्वीरों से गुजरते हुए लोग कह पाते- व्हाय प्रोग्रेसिव माइन्ड्स वर सो स्कर्ड ऑफ, इट्स सो कलरफुल एंड एंगेजिंग न !

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