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चार लाख में एक ‘पत्रकार’ से मीडिया मैनेज कराती उत्तराखंड सरकार

ramesh bhatt anchor news nation
रमेश भट्ट (Photo Credit - News Nation)

वेद उनियाल – बेबस, लाचार और समस्याओं से घिरे राज्य मे। चार लाख पर मीडिया सलाहकार का केवल अय्याशी का पद। वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट जी के इस लेख को जरूर पढ़िए। और महसूस कीजिए किस तरह उत्तराखंड कौ हर बार की तरह इस बार भी रौंदा जा रहा है। कुछ भी अलग नही

योगेश भट्ट-

सरकार और पत्रकार एक ऐसा रिश्ता ,जो साथ चलें पर मिल ना पायें । सही मायनों में यही इस रिश्ते की सुचिता भी है । लेकिन लगता है ना सरकार और ना हम खुद इसे कायम रखने को तैयार हैं । सरकार पत्रकार को अपना ‘भोंपू’ बनाना चाहती है तो पत्रकार भी सत्ता सुख और सरकारी ‘मलाई’ की फिराक में है । सरकारें तो चाहती ही नहीं कि पत्रकार अपनी हद में रहें, अपने पवित्र पेशे की सुचिता बनाये रखें । आज सरकार चाहती है कि पत्रकार उसके लिए मीडिया मैनेज करे, अभी तक तो यह ‘खेल’ पर्दे के पीछे का था पर अब तो खुला खेल है । किसी पत्रकार को सरकार सलाहकार नियुक्त करे अच्छा है, फीड बैक और फ्लानिंग के लिहाज से यह बात तो समझ में आती है । मगर एक पत्रकार को मीडिया सलाहकार बनाए जाने की बात समझ से परे है। यूं तो जब-जब सरकार सलाहकार नियुक्त करती है, तब-तब सवाल उठते ही हैं, लेकिन कुछ दिन पहले जब सरकार ने एक मीडिया सलाहकार की नियुक्ति की तो उस पर सोशल मीडिया में अच्छी-खासी प्रतिक्रियाएं आईं।

सरकार ने उत्तराखंड मूल के दिल्ली में कार्यरत एक पत्रकार रमेश भट्ट को मीडिया सलाहकार बनाने का फैसला किया। मीडिया सलाहकार यानी मीडिया मैनेजर ,आश्चर्य इस बात को लेकर है कि कोई ‘पत्रकार’ सरकार को मीडिया मैनेजमेंट संबंधी क्या सलाह दे सकता है ? सच तो यह है कि सरकार का पत्रकार को मीडिया एडवाइजर बनाना यानी एक तीर से कई निशाने साधने जैसा है । यह एक पत्रकार को खत्म करना तो है ही , बाकी बिरादरी के लिए मैसेज भी है। सोचनीय यह है कि कोई पत्रकार, खासकर मुख्यधारा से जुड़ा रहने वाला पत्रकार आखिर किस तरह सरकार के लिए मीडिया को मैनेज कर सकता है? बतौर मीडिया एडवाइजर जो भी लोग अभी तक सरकारों के लिए काम करते रहे हैं, उनका काम यही तय करना रहा है कि किस पत्रकार को ‘सरकार’ से मिलाया जाए और किसे नहीं। क्या छपवाया , रुकवाया जाए और क्या चलवाया जाए ? किस मीडिया समूह के लिए रेड कार्पेट बिछाई जाई, किसको हतोत्साहित किया जाए। अगर कहीं स्थितियां मुख्यमंत्री के पक्ष में नहीं हैं तो साम,दाम,दंड,भेद करके सब कुछ कंट्रोल में कैसे किया जाए। किस समूह, किस पत्रकार को कितना और किस-किस तरह से उपकृत किया जाए? किसे विज्ञापन दिया जाए, किसे डराया-धमकाया जाए। सवाल यह है कि कोई खांटी पत्रकार क्या इस पर खरा उतर सकता है? जो व्यक्ति लंबे वक्त तक सक्रिय और जनसरोकारी पत्रकारिता करता रहा हो, वह तो किसी भी सूरत में ऐसा नहीं कर सकता।

सच यह है एक पत्रकार यदि सरकार का मीडिया एडवाइजर बन जाए तो फिर या तो वो उस भूमिका में नाकाम होगा या अपने सिद्धातों के साथ अन्याय करेगा। पत्रकारों को मैनेज करने की ही बात की जाए तो आज के दौर में यह भी कम मुश्किल टास्क नहीं है। पत्रकारों के बीच जिस तरह की गुटबाजी है , मीडिया हाउसों की प्रतिद्वंदता है, उसे देखते हुए किसी भी मैनेजर के लिए सबको संतुष्ट करना बेहद मुश्किल है। सरकार की कृपा आंकाक्षी पत्रकारों का हाल यह है कि आपस में वह एक दूसरे को फूटी आंख पसंद नहीं सुहाते । पिछली सरकार के कार्यकाल में यह साबित भी हो चुका है। तब किसी एक पत्रकार को उपकृत किए जाने की खबर चलाकर सरकार ने पत्रकारों का खूब तमाशा कराया। बताईये ऐसे में क्या कोई पत्रकार मीडिया सलाहकार की भूमिका निभा सकता है? यह अपने आप में बड़ा सवाल है । मंशा सही हो तो पत्रकारों के अनुभवों का लाभ सरकार तमाम दूसरी जिम्मेदारी देकर ज्यादा बेहतर कर सकती है , पर नहीं सरकार तो पत्रकार से सिर्फ ‘खेलना’ चाहती है। सवाल यह है कि एक पत्रकार को मीडिया एडवाइजर बना कर ही सरकार क्या संदेश देना चाहती है? सच यह है कि पत्रकार को पत्रकारों को मैनेज करने का जिम्मा देकर सरकार चाहती है कि मीडिया आपस में ही उलझता रहे ,और सरकार अपना उल्लू सीधा करती रहे।

मुंबई के रिपोर्टर की बारिश, जीतेन्द्र दीक्षित की कविता

jitendra dixit abp
jitendra dixit abp

जीतेन्द्र दीक्षित,टीवी पत्रकार, एबीपी न्यूज़

मुम्बई के रिपोर्टर की बारिश
( मुम्बई में पड़ी बारिश की बौछारों के मद्देनज़र कई साल पहले लिखी ये कविता आज फिर एक बार पोस्ट कर रहा हूँ।
इस कविता में मुंबई की बारिश पर व्यंग भी है और रिपोर्टरों का दर्द भी।)
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आई आई आई जमकर बरसात,

छाता, रेनकोट अब ले लो साथ,

बूम माईक को टोपी पहनाओ

पाकिट, मोबाइल पर प्लास्टिक चढवाओ

पानी भरने कि खबर जो आये,

ट्रेन, सडक जब बंद हो जाये

निकल कर औफिस से सरपट भागो

हिंदमाता, परेल पर ओबी मांगो

कुर्ला, सायन भी छूट न जाये

मिलन सबवे को भी दिखलायें

भीग भीग कर करो रिपोर्टिंग

काले बादलों से हो गई है सेटिंग

बाकी ख़बरों का टेंशन नहीं आये

जब बादल रिमझिम कृपा बरसाये

खाओ गर्मागरम वडापाव, भजिया प्लेट

संभल कर रहना गडबड न हो पेट

भीगने में आता है खूब मजा

तबियत को मिल जाती है खराब होने की वजह

जब सर्दी, खांसी, सिरदर्द सताये

विक्स, बाम और ब्रांडी काम आये

यहां गिरी बिजली, वहां उखडा पेड

लगातार चेक करते रहो फायर ब्रिगेड

अगर बडी कोई बिल्डिंग गिर जाये

दिन और रात एक हो जाये

“मीठी नदी” बडी है कडवी

नजर रहे उसकी सरहद भी

लाईव चैट और वाक थ्रू गिरवाओ

वक्त मिले तो पैकेज कटवाओ

बीएमसी, सरकार को बचने न देना

2005 की जुलाई याद कर लेना

वीकेंड पर पिकनिक को जाना

झरनो में फिर खूब नहाना

भीगा भागा सा है न्यूज रूम

सभी रिपोर्टरों को हैप्पी मानसून

-महाकवि जीतेन्द्र दीक्षित।

सहारनपुर में ठाकुर को खोजते दिल्ली के टीवी रिपोर्टर !

abhishek srivastav
अभिषेक श्रीवास्तव

अभिषेक श्रीवास्तव,वरिष्ठ पत्रकार

गांव-देहात में दिल्ली के पत्रकारों की स्थिति देखने में बड़ी मनोरंजक होती है। हाथ में माइक लिए गांव की गली में टहल रहा टीवी रिपोर्टर सबसे ज़्यादा इस बात से परेशान रहता है कि कुछ कवर करने लायक क्यों नहीं दिख रहा। उसे यहां लेकर आया सरदार टैक्सीवाला गालियां दे रहा होता है जबकि हर आधे घंटे पर नोएडा से कॉल कर रहा बॉस एक ही सवाल दागे जाता है- कुछ मिला?

कल एक गांव में एक गाड़ी आकर रुकी। अपने ब्रांडेड कपड़ों से पहचाना जा रहा रिपोर्टर पूरी ठसक में बाहर आया। दाएँ देखा, बाएँ देखा, और पुलिस से आंख मिलाए बगैर सीधे चल दिया। दोनों तरफ टूटे-फूटे जले हुए मकान थे दलितों के। थोड़ा ठिठका, ‘कोई है?’ के अंदाज़ में भीतर झांका, फिर आगे बढ़ लिया। बहुत देर चहलकदमी करने के बाद भी जब माइक उठाने की नौबत नहीं आई और भीषण गर्मी में टमाटर की तरह पक चुके लाल गालों वाले कैमरामैन ने उसे खोदा, तो रिपोर्टर ने उजबक की तरह बैठे एक गांववाले से पूछा, ‘भाई साहब, ये ठाकुर का घर किधर है?’

उसके सवाल पर ग्रामीण सकपका कर तन गया। उसने कुछ आवाज़ लगाई। तीन-चार युवक इकट्ठा हो गए। रिपोर्टर से सवाल जवाब होने लगा। उसने माइक दिखाया। लोगों को शक था कि वह ठाकुरों का आदमी है। वह समझाने की असफल कोशिश कर रहा था कि उसे ठाकुरों की बाइट लेनी है, और कुछ नहीं। लेकिन उस वाल्मीकि बस्ती में इस मजबूरी को समझने वाला अभी तक पैदा नहीं हुआ था।

ख़ैर, किसी तरह उसे समझाया गया कि यह दलितों का टोला है, ठाकुर आगे रहते हैं। वह तेजी से आगे बढ़ा कार की तरफ, लेकिन ड्राइवर नदारद था। उसने फिर दाएँ देखा, बाएँ देखा और सीधे देखने से पहले फोन की घंटी घनघना उठी, ‘कुछ मिला?’ उसने जवाब दिया, ‘ठाकुर का पता मिल गया है!’ उधर से आवाज़ आई, ‘गुड। भाग के सहारनपुर कलेक्टरेट जाओ। वहां से एसएसपी का एक बाइट भेजो। क्विक!’ सरदार ने जो गाली रिपोर्टर को दी थी, वही गाली फ़ोन काटने के बाद रिपोर्टर ने अपने बॉस के लिए हवा में उछाल दी। सिर झुकाया और सामने देखा, तो सरदार ड्राइवर आम चूसते हुए मुस्कुराता खड़ा पूछ रहा था- ‘इब कित्थे चलना है पतरकार साहब?’

माँ के लिए आज भी हैं अजीत अंजुम ‘बुतरू’ !

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Photo Credit - Ajit Anjum wall

दुनिया के लिए आप कितने ही बड़े क्यों न हो जाए, लेकिन माँ की नज़र में बच्चे-बच्चे ही होते हैं. माँ की यही ममता उसे तमाम रिश्तों से अलग और विशिष्ट बनाती है. इसी पर वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने माँ के साथ अपनी तस्वीर साझा करते हुए भावुक अंदाज़ में लिखा –

ajit anjum with mother 2

अजीत अंजुम-

माँ के लिए आज भी मैं बुतरू हूँ …बुतरू ठेंठ बिहारी शब्द है , जिसका मतलब होता है बच्चा …माएँ छोटे बच्चे को प्यार से बुतरू कहती हैं …आज किसी बात पर माँ ने कहा – हमर बुतरू खैलकै कि नय ? मतलब मेरा बच्चा खाया या नहीं ?

पचास पार कर चुका हूँ लेकिन माँ के लिए आज भी बच्चा ही हूँ ..बहुत दिनों बाद बेगूसराय से दिल्ली आई है ….जब भी घर में होता हूँ , उसका पूरा ध्यान मुझपर होता है ..खाया कि नहीं ..क्या खाया ? इतना कम क्यों खाया ? रात में दूध क्यों नहीं पीया ?

रात को दफ़्तर से घर लौटने पर सो चुकी होती है लेकिन कॉल बेल पर उठती है और ममता भरी नज़रों से देखती है कि बेटा इतना थककर दफ़्तर से आया है ..कभी ज़िद कर देती है कि माथा में तेल लगा देती हूँ ..कभी पैर की मालिश करने की ज़िद कर देती है ..कभी बैठा होता हूँ और चुपके से तेल लेकर सीधे मेरे माथे में डालकर मालिश करने लगती है …तों चुपचाप बैठें न ..करै दे मालिश ..माथा म तेल लगइला स आराम मिलतौ….भीतर से इच्छा होते हुए भी मैं मना करता हूँ लेकिन फिर हथियार डाल देता हूँ कि उसे ख़ुशी तभी मिलेगी , जब वो मेरे सिर में तेल लगा देगी ..

जो काम मुझे करना चाहिए , वो काम वो करने लगती है ..खाते समय उसकी नज़र मेरी प्लेट पर रहती है ..इतना कम क्यों खाते हो ? दूध -दही लो …एक रोटी और लो …ये सब्ज़ी और लो …एक दम ऐसे जैसे मैं छोटा बच्चा हूँ …
माँ आख़िर माँ होती है …

संकट में हैं रोहित सरदाना जैसे तमाम एंकर !

rohit sardana news anchor
rohit sardana news anchor

ये सिर्फ न्यूज एंकर रोहित सरदाना का संकट नहीं है

जी न्यूज के मीडियाकर्मी रोहित सरदाना ने सहारनपुर में मोबाईल नेटवर्क पर रोक लगा दिए जाने और जियो को तब भी बहाल रखने पर जो कुछ भी लिखा है, वो वही है जो कि एक मीडियाकर्मी को लिखना चाहिए. लेकिन

rohit sardana tweetएकतरफा कवरेज, पत्रकारिता और चारण लेखन-वाचन में फर्क कर देने से लोगों के बीच उनकी साख इस कदर मिट्टी में मिल चुकी है कि लोगों को उनका लिखा स्वाभाविक नहीं लग रहा. किसी को लग रहा है, जी न्यूज में उनके दिन लदनेवाले हैं. कोई अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए मालिक से जोडते हुए गरिया रहा है. अफसोसनाक ये है कि कल तक जिनके पक्ष में एकतरफा होते रहे, वो कहीं ज्यादा आक्रामक भाषा में कमेंट कर रहे हैं.

एक मीडियाकर्मी के लिए इससे ज्यादा दयनीक स्थिति क्या हो सकती है कि समर्थक गाली-गलौच पर उतर आए, कल तक अहमत रहनेवाला अपने मुताबिक बोले जाने पर शक करने लगे और लिखे को कहीं से पत्रकारीय कर्म न माने.

रोहित सरदाना ने इसी तरह दो-चार ट्वीट कर दिए तो वोलोग ज्यादा अभद्रता पर उतर आ सकते हैं जिन्होंने अब तक पलकों पर बिठाकर रखा है. ऐसा इसलिए कि एकपक्षीय पत्रकारिता करते-करते उन्होंने अपना पक्ष छोड दिया है. वो पक्ष जो एक मीडियाकर्मी के पास हर-हाल में सुरक्षित रहना चाहिए. सरदाना इसकी कोशिश करते हैं तो आगे देश विरोधी उपमा से नवाजे जाएंगे.

बिडंबना देखिए कि एक ही दिन वो अपने को नंबर वन बनाने के लिए लोगों का शुक्रिया अदा करते हैं और घंटे भर के अन्तराल में लोग उन पर शक करने लग जाते हैं. आपने दरअसल टेलिविजन के जरिए लोगों को दर्शक के बजाय मनोरोगी में, मॉब में बदल दिया है. अब वो आपके लिए भी उतने ही घातक हैं.

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