एक बेहतर समाज की कल्पना एक पेशेवर पत्रकार होकर भी की जा सकती है. शोषित,दबे-कुचले और हाशिए के समाज की बात उसी न्यूजरुम के भीतर से की जा सकती है जहां से मीडिया संस्थान की बैलेंस शीट दुरुस्त होती है.
जरुरी नहीं कि बेहतर समाज के नाम पर कोई पत्रकार मसीहा का, देशभक्त का, प्रवक्ता का अतिरिक्त चोला ओढकर किसी अखाडे में जम जाए. न्यूजरुम को यज्ञशाला में तब्दील करने का नकली उपक्रम रचे. पाठक/दर्शक को जागरुक नागरिक के नाम पर पाखंडी और मॉब में तब्दील कर दे.
एक पेशेवर पत्रकार की पक्षधरता बिल्कुल स्पष्ट होती है- अपना अस्तित्व बचाए रखने, जीने के लिए जरुरत भर के संसाधन और समाज की जरुरत के अनुसार पत्रकारिता. उसका काम सिर्फ रिपोर्ट नत्थी करना भर नहीं, रिपोर्ट के माध्यम से समाज को और ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाना है.
इस अर्थ में टीवी ग्लैमर का नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही का माध्यम है. इस टीवी और चैनलों के प्रभाव से यदि नागरिक और लोकतंत्र कमजोर होने लग जाए और मीडियाकर्मी ताकतवर महसूस करने लगें तो समझिए एस पी सिंह की पत्रकारिता की मौत हो गयी है.
एस पी सिंह की पत्रकारिता से गुजरते हुए हमने यहीं सीखा, समझा. उसी के आसपास करने की कोशिश करते हैं, करते रहेंगे. आज जरुरत इस बात की ज्यादा है कि हम उस पत्रकारिता को कितना बचा पाते है ?
हिंदी पत्रकारिता में जिस श्रद्धा और आदर से अपने नायकों को याद किया जाता है,अंग्रेजी पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता
राहुल देव,वरिष्ठ पत्रकार
राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार
आज स्वर्गीय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की स्मृति में मीडिया खबर और उसके अनथक, जबर्दस्त संचालक पुष्कर पुष्प की नौवी परिचर्चा में इस बात को रेखांकित किया कि जो कई अन्तर हैं हिन्दी पत्रकारिता और अंग्रेजी पत्रकारिता में, और दोनों समाजों में भी, उनमें एक पर आज ही ध्यान गया और वह यह है कि हिन्दी में अपने बड़े संपादकों, पत्रकारों को जिस हार्दिकता से, श्रद्धा से, आदर से याद किया जाता है ऐसे कार्यक्रमों के जरिए वह अंग्रेजी पत्रकारिता में देखने को नहीं मिलता।
ऐसा नहीं कि अंग्रेजी में बहुत बड़े, महान पत्रकार-संपादक नहीं हुए। खूब हुए हैं। लेकिन हिन्दी समाज और पत्रकारिता से जुड़ी संस्थाएं और पत्रकार जिस प्यार, आस्था और उत्साह के साथ प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर, एस पी सिंह, राहुल बारपुते, कर्पूर चंद कुलिश आदि को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर जितने कार्यक्रमों के माध्यम से याद करते हैं वह अंग्रेजी के संपादकों को शायद नसीब नहीं होते।
इसका कारण दोनों समाजों की प्रकृति में अन्तर के साथ साथ दोनों भाषाओं की पत्रकारिता के चरित्र के अन्तर में भी है। हिन्दी समाज, और हर भारतीय भाषा का समाज, अंग्रेजी समाज की तुलना में ज्यादा भावुक, व्यक्तिसापेक्ष, और अपने नायकों से गहरे लगाव वाला समाज है। इसको यूं भी कह सकते है कि अंग्रेजी समाज भाषा-भाषी समाजों की तुलना में ज्यादा तर्कशीलता, तटस्थता और भावना की बजाए बुद्धि के साथ चीजों और व्यक्तियों को देखता और उनसे जुड़ता है।
भाषा-भाषी समाज इसके विपरीत पश्चिमी व्यावसायिकता यानी प्रोफेशनलिज़्म के दोटूकपन और कामकाजी संबंधों पर नहीं निजीपन, घरेलूपन और भावनात्मक संबंधों पर चलता है। इस अन्तर को हम भाषाई अखबारों, संस्थानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की भीतरी कार्य संस्कृति और आपसी संबंधों में देख सकते हैं। इस अन्तर से कार्यकुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है वह एक अलग प्रश्न है लेकिन एक दूसरे से और,अपने नायकों से जुड़ाव की प्रकृति, उनको उनके जाने के बाद याद करने के तरीकों में प्रतिबिम्बित होती है।
एस पी की याद में आयोजित मीडिया खबर एस पी सिंह स्मृति परिचर्चा की सुबह थोडे देर के लिए हम बेहद भावुक तो जरुर हो जाते हैं, न्यूज चैनलों की वास्तविक सच्चाई से छिटककर नॉस्टैल्जिया में चले जाते हैं लेकिन स्थिति है बिल्कुल अलग. चारों तरफ जब लोगों की परिकल्पना पर नजरें दौडता हूं कि आज एसपी होते तो क्या होते तो सीधा सा जवाब ध्यान में आता है- वो या तो लगातार ट्रोल किए जाते या फिर उनकी आंखो के सामने उनके प्रतिमान ध्वस्त हो जाते.
सवाल सिर्फ एसपी के होने और मौजूदी दौर के बीच की संभावना नहीं है. सवाल इससे ज्यादा बडे और गहरे हैं कि कोई आज एसपी जैसी पत्रकारिता करना चाहे तो उसकी कितनी संभावना है ? व्यक्ति से इतर एक स्कूल के तौर पर वो कहां तक टिक पाते ? उनके स्कूल से निकले लोग उसे कहां ले जा रहे हैं ?
मीडिया खबर द्वारा हर साल आयोजित इस परिचर्चा में हम इन्हीं सवालों के बीच होते हैं. तो आइए, आज एक बार फिर..
इस देश में जितने लफंगे, बदमाश, दलाल ब्लेकमेलर शातिर लुच्चे लाइजनर थे उनमें कई पत्रकार बनकर उत्तराखंड आ गए( इनमें राज्य के कुछ लफंगे भी शामिल है) । खासकर देहरादून आ गए। कुछ तो दलाल हैं पर बडे कहे जाने वाले मीडिया संस्थानों से पत्रकारिता का सर्टिफिकेट लिए हुए हैं। उनसे निपटने तो समाज ही आगे आएगा। लेकिन छोटा सा देहरादून और दो हजार पत्रकार। कहां के लिए काम कर रहे हैं ये किसके लिए काम कर रहे हैं ये। बमुश्किल पूरे उत्तराखंड में दो सौ पत्रकार है, जिनका वाकई अपने पेशे से कोई नाता है। या जिन्होंने इस पेशे में आकर उसे सीखा है। बाकी सबका ज्यादा नहीं दो या तीन साल पुराना इतिहास टटोलिए। खतरनाक है ये सब । जो भी मुख्यमंत्री इस हालात की अपने स्तरं पर जाँच नही कराएगा वो दम ठोंककर नहीं कह सकता कि उसने साफ सुथरा प्रशासन दिया। मछली वाला, पकोडी वाला, तारपीन तेल वाला, हर माल पाँच रुपए में बैचने वाला शादी की वीडियो बनाने वाला, बैंड पार्टी मे लाइट लेकर चलने वाला सब उत्तराखंड में आकर या रहकर पत्रकार बन गए हैं। गढी कैंट देहरादून में पत्रकार बने बल्कि ब्यूरो प्रमुख बने ब्लेकमेलर के जरिए दलाली करने और दुकानदार को गंभीर रूप से घायल करने की सूचना मिली है। कई लफंगे टुच्चे तो टाइकोट पहनकर डब्बे नुमा टीवी चैनल में अतराष्ट्रीय विषयों पर बहस भी करवा रहे हैं। ट्रंप, मोदी ,योगी से नीचे की बात पर वो बहस नहीं करते। कैबिनेट मंत्री से ऐसे बात करते हैं मानो उनकी विधानसभा सीट में पाँच छह हजार वोट इन्होंने ही डलवाए हो। संभव है इंटर की डिग्री भी उनके पास न हो। ये उत्तराखंड में हर चीज के विशेषज्ञ हैं। किसी भूगर्भशास्त्री को डांट सकते हैं। किसी लोक कलाकार को सीट से उठाकर अपमान कर सकते हैं ।आईएएस के केबिन में जाकर उसके वरिष्ठ कर्मचारी को हडका सकते हैं। परिजनों को घुमाने के लिए डाकबंगले मांग सकते हैं। आईआईटी किए इंजीनियर इनके सामने पानी भरे, आखिर लोकनिर्माण मंत्री से करीबी ताल्लुक हैं इनके। मेहनत से एमबीबीएस किए डाक्टर इनको देखकर झेंपने लगे। आखिर स्वास्थ्य मंत्री के दोस्त होते हैं ये। डीएम इनके लिए कुछ नही क्योकि चीफ़ सेक्रेटरी या अपर सचिव को साथ का मान लेते हैं । मोदी प्रणव ऐसे कहते हैं जैसे पड़ोसी मित्र को पुकार रहे हों। डीएम का नाम ऐसे लेते हैं जैसे अपनी फैक्ट्री का कोई पुराना कर्मचारी हो। सूचना विभाग को ऐसे समझते हैं जैसे ससुरजी ने सूचना विभाग दहेज मे दिया हो एक लफ़ंगे का देहरादून में स्थानांतरण हुआ तो किसी होटल में रुकने के बजाय सरकारी बीजापुर गेस्टहाउस को ही ठिकाना बना दिया, आवाज़ नही उठती तो अभी तक वहीं रहता
सबसे पहले मुख्यमंत्री जांच कराए कि मीडिया चैनल और अखबारों ने जिन लोगों को पत्रकार होने के कार्ड परिचय पत्र बांटे हैं , वो कौन है उनका विगत परिचय क्या है। कैसे जिस राज्य में गिनती के अख़बार पत्र पत्रिकाएं मीडिया चैनल है वहां अकेले देहरादून में दो हजार से ज्यादा पत्रकार है। कई चैनलों पत्र पत्रकाओं ने चालू टाइप लोगों को मीडिया कार्ड बाँटे हुए हैं जब चैनल मालिक संपादक इलाक़े में जाते है तो ये सब सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं ।
मुख्यमंत्री जी अब गौर करें और फूल माला के कार्यक्रमों से निजात पाकर थोडा इस तरफ ध्यान दे। वरना पत्रकारों का सोना गाछी जैसा बन जाएगा देहरादून । यहां हर पाँच आदमी में एक आदमी पत्रकार नजर आ रहा है। कुछ ऐसो भी है कि राज्य से बाहर बदली होने पर भी नहीं जाते। भले उनका यहां कुछ न हो। न मौसा , न फूफा , न साढ़ू। न साली न घर ,न ठिकाना पर रहना उत्तराखंड में हैं क्योंकि काली कमाई यहीं हैं। प्रमोशन ठुकरा दिए भाई लोगों ने। नजाकत भरे शहर ठुकरा दिए भाई लोगों ने। नौकरी छोड देते हैं फंडा यही कि रहना देहरादून में है, क्योंकि दलाली यही हैं। सच राजधानी बनने के बाद दून शहर दलालों का हो गया है। नाम पत्रकार का और काम दल्लेग्री का । हमारा राज्य की जनता से अनुरोध अगर पत्रकारिता के नाम पर ऐसा कोई ब्लेकमेलर, लफंगा , लुच्चा आपको तंग करता है, धौंस देता तो आप खुलकर इस बात को उठाए हमारे पास आएं हम ऐसे लोगों को बेनकाब करेंगे। जैसे कि एक मसूरी में एक नेता ने एक संपादक और उसके साथ आए ब्यूरो प्रमुख को इस बात पर डांट कर घर से भगाया कि वह मंदिर के नाम पर जगह चाहता था। हां आप गलत नहीं होने चाहिए। जहां गलत है, अपने पहाड़ को उत्तराखंड को बचाने के लिए उसका विरोध कीजिए। उत्तराखंड की पत्रकारिता बेहतर अच्छा करने में नेता भले हमारा साथ न दें, लेकिन उत्तराखंड की मातृशक्ति और युवा शक्ति आगे आएगी और आ रही है।
शायद यही राजनीति की नरेंद्र मोदी शैली है। राष्ट्रपति पद के लिए अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले श्री रामनाथ कोविंद का चयन कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर बता दिया है कि जहां के कयास लगाने भी मुश्किल हों, वे वहां से भी उम्मीदवार खोज लाते हैं। बिहार के राज्यपाल और अरसे से भाजपा-संघ की राजनीति में सक्रिय रामनाथ कोविंद पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में हैं, जिन्होंने खामोशी से काम किया है। यानि जड़ों से जुड़ा एक ऐसा नेता जिसके आसपास चमक-दमक नहीं है, पर पार्टी के अंतरंग में वे सम्मानित व्यक्ति हैं। यहीं नरेंद्र मोदी एक कार्यकर्ता का सम्मान सुरक्षित करते हुए दिखते हैं।
बिहार के राज्यपाल कोविंद का नाम वैसे तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच बहुत चर्चा में नहीं था। किंतु उनके चयन ने सबको चौंका दिया है। एक अक्टूबर,1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में जन्मे कोविंद मूलतः वकील रहे और केंद्र सरकार की स्टैंडिंग कौसिल में भी काम कर चुके हैं। आप 12 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। भाजपा नेतृत्व में दलित समुदाय की वैसे भी कम रही है। सूरजभान, बंगारू लक्ष्मण, संघ प्रिय गौतम, संजय पासवान, थावरचंद गेहलोत जैसे कुछ नेता ही अखिलभारतीय पहचान बना पाए। रामनाथ कोविंद ने पार्टी के आंतरिक प्रबंधन, वैचारिक प्रबंधन से जुड़े तमाम काम किए, जिन्हें बहुत लोग नहीं जानते। अपनी शालीनता, सातत्य, लगन और वैचारिक निष्ठा के चलते वे पार्टी के लिए अनिवार्य नाम बन गए। इसलिए जब उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया तो लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। अब जबकि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं तो उनपर उनके दल और संघ परिवार का कितना भरोसा है , कहने की जरूरत नहीं है। रामनाथ कोविंद की उपस्थिति दरअसल एक ऐसा राजनेता की मौजूदगी है जो अपनी सरलता, सहजता, उपलब्धता और सृजनात्मकता के लिए जाने जाते हैं। उनके हिस्से बड़ी राजनीतिक सफलताएं न होने के बाद भी उनमें दलीय निष्ठा, परंपरा का सार्थक संयोग है।
कायम है यूपी का रूतबा
उत्तर प्रदेश के लोग इस बात से जरूर खुश हो सकते हैं कि जबकि कोविंद जी का चुना जाना लगभग तय है,तब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों पदों पर इस राज्य के प्रतिनिधि ही होगें। उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी जिस तरह सिमट रही है और विधानसभा चुनाव में उसे लगभग भाजपा ने हाशिए लगा दिया है, ऐसे में राष्ट्रपति पद पर उत्तर प्रदेश से एक दलित नेता को नामित किए जाने के अपने राजनीतिक अर्थ हैं। जबकि दलित नेताओं में केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत भी एक अहम नाम थे, किंतु मध्यप्रदेश से आने के नाते उनके चयन के सीमित लाभ थे। इस फैसले से पता चलता है कि आज भी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री की नजर में उत्तर प्रदेश का बहुत महत्व है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय ने उनके संबल को बनाने का काम किया है। यह विजययात्रा जारी रहे, इसके लिए कोविंद के नाम का चयन एक शुभंकर हो सकता है। दूसरी ओर बिहार का राज्यपाल होने के नाते कोविंद से एक भावनात्मक लगाव बिहार के लोग भी महसूस कर रहे हैं कि उनके राज्यपाल को इस योग्य पाया गया। जाहिर तौर पर दो हिंदी ह्दय प्रदेश भारतीय राजनीति में एक खास महत्व रखते ही हैं।
विचारधारा से समझौता नहीं
रामनाथ कोविंद के बहाने भाजपा ने एक ऐसा नायक का चयन किया है जिसकी वैचारिक आस्था पर कोई सवाल नहीं है। वे सही मायने में राजनीति के मैदान में एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिसने मैदानी राजनीतिक कम और दल के वैचारिक प्रबंधन में ज्यादा समय दिया है। वे दलितों को पार्टी से जोड़ने के काम में लंबे समय से लगे हैं। मैदानी सफलताएं भले उन्हें न मिली हों, किंतु विचारयात्रा के वे सजग सिपाही हैं। संघ परिवार सामाजिक समरसता के लिए काम करने वाला संगठन है। कोविंद के बहाने उसकी विचारयात्रा को सामाजिक स्वीकृति भी मिलती हुयी दिखती है। बाबा साहेब अंबेडकर को लेकर भाजपा और संघ परिवार में जिस तरह के विमर्श हो रहे हैं, उससे पता चलता है कि पार्टी किस तरह अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने के लिए बेचैन है। राष्ट्रपति के चुनाव के बहाने भाजपा का लक्ष्यसंधान दरअसल यही है कि वह व्यापक हिंदू समाज की एकता के लिए नए सूत्र तलाश सके। वनवासी-दलित और अंत्यज जातियां उसके लक्ष्यपथ का बड़ा आधार हैं। जिसका सामाजिक प्रयोग अमित शाह ने उप्र और असम जैसे राज्यों में किया है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति चुनाव भाजपा के हाथ में एक ऐसा अवसर था जिसके वह बड़े संदेश देना चाहती थी। विपक्ष को भी उसने एक ऐसा नेता उतारकर धर्मसंकट में ला खड़ा किया है, एक पढ़ा-लिखा दलित चेहरा है। जिन पर कोई आरोप नहीं हैं और उसने समूची जिंदगी शुचिता के साथ गुजारी है।
राष्ट्रपति चुनाव की रस्साकसी
राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एकत्रित हो रहे विपक्ष की एकता में भी एनडीए ने इस दलित नेता के बहाने फूट डाल दी है। अब विपक्ष के सामने विचार का संकट है। एक सामान्य दलित परिवार से आने वाले इस राजनेता के विरूद्ध कहने के लिए बातें कहां हैं। ऐसे में वे एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसे उसके साधारण होने ने ही खास बना दिया है। मोदी ने इस चयन के बहाने राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ दिया है। अब विपक्ष को तय करना है कि वह मोदी के इस चयन के विरूद्घ क्या रणनीति अपनाता है।