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अंजना ओम कश्यप की बेहतरीन तस्वीरें – Anchor Anjana Om Kashyap best Images

anjana om kashyap
अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर

 

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अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर
अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर
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अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर
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अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर
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अंजना ओम कश्यप, टीवी एंकर और रिपोर्टर

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर फर्जी ख़बरों की भरमार

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर फर्जी ख़बरों की भरमार

चुनावों में सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा दुरूपयोग फर्जी ख़बरों को फ़ैलाने में होता है. दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही हुआ.

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए राष्ट्रीय राजधानी के 81 प्रतिशत मतदाताओं तक फर्जी खबरे पहुंचीं। गैर-लाभकारी संस्था सोशल मीडिया मैटर्स एंड इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेस, पॉलिसी एंड पॉलिटिक्स द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है।

परिणामों से पता चला है कि गलत सूचना का प्रसार सबसे अधिक फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से किया गया।

सोशल मीडिया मैर्ट्स के फाउंडर अमिताभ कुमार ने एक बयान में कहा, “फर्जी खबरों की महामारी हमारे लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को खतरे में डाल रही है। जब मतदाता लगातार असंगत जानकारी की स्थिति में हैं, तो ऐसे में उनसे एक सुसंगत सोच की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। एक राष्ट्र होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस पर अंत लगाएं।”

दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों के लिए 8 फरवरी को मतदान हुए थे। 11 फरवरी को घोषित हुए नतीजों में आम आदमी पार्टी (आप) ने 62 सीटों पर जीत हासिल की। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में मिली बड़ी जीत के बाद पार्टी एक बार फिर दिल्ली में सरकार बनाने जा रही है।

चुनावों पर सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाली फर्जी खबरों का प्रसार, प्रवेश और प्रभाव जानने के लिए सर्वे ‘दिल्ली-हैशटैग डोन्ट बी फूल’ में 400 लोगों से बात की गई।

चुनाव से पहले फैली अफवाहों में यह भी शामिल था कि शाहीन बाग में महिलाओं को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और प्रस्तावित नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए भुगतान किया जा रहा है।

इसके अलावा प्रसिद्ध व्यक्तियों ने चुनाव से पहले कुछ ट्वीट भी किए जो गलत थे। उदहारण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने आप नेता अमानतुल्ला खान का एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने गलत दावा किया कि खान ‘शरिया’ कानून बनाने की बात कर रहे थे।

लेकिन, सर्वे में 60 फीसदी लोगों ने यह भी कहा कि उन्होंने खबरों पर सीधे विश्वास करने के बजाए इनकी सच्चाई जानने के लिए गूगल, ट्विटर, फेसबुक जैसे मंचों का सहारा लिया।

(आईएएनएस)

जी न्यूज के बिछे रहने से कहीं ज्यादा असर आजतक के तनकर खड़े होने में है

जेएनयू हिंसा पर आजतक का स्टिंग

टीवी टुडे नेटवर्क के मालिक अरूण पुरी, जी मीडिया नेटवर्क के मालिक सुभाष चन्द्रा की तरह अदूरदर्शी और ठस्स मिजाज के नहीं हैं. वो मीडिया, मीडिया बिजनेस और चमचई इन तीनों में साफ-साफ फर्क जानते हैं. वो जानते हैं कि बाकी दो कम-ज्यादा होते रहेंगे लेकिन कारोबारी एक तरह से बना रहना चाहिए. करोड़ों रूपये का उनका मीडिया कारोबार सैलरी पर पल रहे दो-चार, दस मीडियाकर्मियों और स्क्रीन चेहरे का खिलौना नहीं है.दर्शकों का बड़ा समूह तटस्थ है और दिन-रात दिमागी विभाजन पसंद नहीं करता. ऐसे में एक तरह जी नेटवर्क आर्थिक मोर्चे पर जितनी बुरी तरह से हांफ रहा है, चैनल के एंकर दिन-रात उतनी ही ताकत से चिंघाड़ रहे हैं, सत्ता के विरूद्ध आवाजों को ललकार रहे हैं. अरूण पुरी अपने एंकरों को ऐसी सर्कस चलाने की अनुमति नहीं दे सकते.

वो ये बात अच्छी तरह जानते हैं कि जब हमारे एंकरों, मीडियाकर्मियों की आंखों में लोकतंत्र के सपने के बजाय अपना बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, विदेश यात्रा और सुरक्षित आर्थिक जीवन है तो चैनल के लिए उनसे किस तरह का काम लिया जा सकता है ? कैसे उनका इस्तेमाल करते हुए दर्शकों को लगातार भ्रम में रखा जा सकता है कि जिस बक्से या एलइडी स्क्रीन के आगे वो आंख गड़ाए बैठे हैं, वो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है.

5 जनवरी को जेएनयू कैंपस में जो सुनियोजित ढंग से गुंडागर्दी की गयी और छात्रों पर जानलेवा हमले किए गए, बुरी तरह कमरे में तोड़-फोड़ मचाते हुए उन्हें जख्मी किया गया, टीवी टुडे नेटवर्क ने कल उस पर स्टिंग ऑपरेशन जारी किया. मेरे बहुत परिचित जो कि आजतक से किसी भी तरह की पत्रकारिता की उम्मीद बहुत पहले छोड़ चुके हैं और यहां तक मानते हैं कि ये अपनी कवरेज, भाषा और कंटेंट के जरिए इस देश की लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर करता है, स्टिंग देखने के बाद थोड़े गड़बड़ा गए. उन्हें लगा कि चैनल पत्रकारिता की रहा पर लौट आया है. स्टार एंकर अंजना ओम कश्यप और राहुल कंवल उन्हें सैलरी के सिपाही के बजाय पत्रकार लगने लगे. इसका मतलब हुआ कि चैनल का काम हो गया. आजतक का शुरू से यही बिजनेस पैटर्न रहा है.

मैं टीवी टुडे नेटवर्क को इस देश का अकेला पेशेवर कॉर्पोरेट मीडिया मानता हूं. इस पर कभी विस्तार से लिखना होगा. फिलहाल ये कि ये नेटवर्क कभी भी पूरी तरह अपनी पुरानी ऑडिएंस का भरोसा नहीं तोड़ता. जब-जब वो सत्ता के चाटुकार के तौर पर कवरेज करता है, उसके तुरंत बाद ही ऐसी कोई कवरेज जरूर सामने रखता है जिससे कि ऑडिएंस इस भ्रम में रहे कि नेटवर्क सत्ता के खिलाफ जाकर भी नागरिकों के हितों की रक्षा करता है. वो अपने दर्शकों के हितों को ध्यान में रखता है.

नेटवर्क की ये रणनीति अब तक दर्शकों पर काम करती आयी है और इसका सबसे ज्यादा असर इस रूप में भी होता है कि जब ये सत्ता के आगे बिछ जाता है तब भी वो पत्रकारिता के दायरे की ही चीज लगती है और जब स्ट्रैटजी के तहत थोड़े वक्त के लिए उसके खिलाफ जाती है तब वो नागरिक के पक्ष में खड़ा नेटवर्क नज़र आता है. वो हमेशा अपने साथ निकास द्वार का विकल्प बनाए रखता है. प्रधानमंत्री की रैली को बिना कट और ब्रेक के लगातार प्रसारित करता है तो कन्हैया कुमार के भाषण को भी बिना रोक-टोक के जारी रखता है. ऐसे में आप चाहे जिस भी विचारधारा और पार्टी के समर्थक हों और चैनल पर आरोप लगाएं कि वो किसी खास का पक्ष लेता है, चैनल के पास इसका जवाब होगा. ये जवाब जी न्यूज, इंडिया टीवी और यहां तक कि एनडीटीवी तक के पास नहीं होगा.

आजतक-टीवी टुडे नेटवर्क को पता है कि वो जो कुछ भी प्रसारित कर रहा है, उससे ठीक उलट जाने की स्थिति कभी भी बन सकती है. पैसा और कारोबार इसी में है. उसका फॉर्मूला बहुत साफ है- आपकी जो भी विचारधारा रहे, प्राइम टाइम में थोड़े वक्त के लिए ही सही, आपको हमारे चैनल से होकर गुजरना होगा. जी न्यूज की रणनीति ऐसी नहीं है. यही कारण है कि वो पिछले छह साल से लगातार सत्ता की जी-हुजूरी में लगा है लेकिन धंधे के मैंदान में तेजी से पिछड़ रहा है, हांफ रहा है. दूसरा कि सत्ताधारियों को भी ये पता है कि जी न्यूज के बिछे रहने से कहीं ज्यादा असर आजतक के बिछने और फिर तनकर खड़े हो जाने में ज्यादा है. ऐसे में इस प्लेटफॉर्म से बात की जाय तो ज्यादा फायदेमंद होगा.

(मीडिया मामलों के जानकार विनीत कुमार के सोशल मीडिया वॉल से साभार)

पत्रकार आशुतोष कुमार सिंह की किताब का लोकार्पण

अँजुरी भर चाउर का पद्मश्री मालनी अवस्थी ने किया लोकार्पण,आशुतोष कुमार सिंह ने भोजपुरी में लिखी है किताब

नई दिल्ली आशुतोष कुमार सिंह की पहली भोजपुरी किताब ‘ अँजुरी भर चाउर ‘ का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला के थीम पवेलियन में लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, उमेश चतुर्वेदी एवं मनोज सिंह भाउक ने किताब के विविध आयामो पर प्रकाश डाला। अपने अध्यक्षीय संबोधन में मालिनी अवस्थी ने कहा कि इस किताब के शीर्षक में ‘चाउर’ शब्द का प्रयोग है जो की शुभता का प्रतीक है। साथ ही उन्होंने कहा की चाउर का हमारे संस्कार एवं संस्कृति में अहम योगदान है। भोजपुरी सहित तमाम आंचलिक भाषाओं को हिंदी की मां की संज्ञा देते हुए उन्होंने कहा कि भोजपुरी को किसी एक सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है। इसका विस्तार क्षेत्र बहुत लंबा है। भोजपुरी में दिए अपने उद्बोधन में उन्होंने लेखक आशुतोष कुमार सिंह की तारीफ करते हुए कहा कि लेखक ने भोजपुरी समाज से जुड़े सभी पक्षो को अपने लेखों में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा की समाज को लेखक जैसे और आशुतोष की आवश्यकता है। इस अवसर पर कवि एवं ग़ज़लकार मनोज भाउक ने कहा कि यह गद्य संग्रह 4 खंडों में है लेकिन भोजपुरी समाज कई खंड में विभक्त है। यह किताब भोजपुरी समाज की एका भाव को प्रमुखता से उठाने में सफल रही है।

अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि जनपदीय भाषाओ का विस्तार से ही हिंदी को खाद पानी मिलता है। वही उमेश चतुर्वेदी ने कहा की विश्व हिंदी दिवस के दिन दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला के थीम पवेलियन में भोजपुरी पर इतनी सारगर्भित चर्चा का होना भोजपुरी के लिए एक प्रस्थान बिंदु है। मंच संचालन भोजपुरी मैथिली अकादमी के सदस्य डॉ मुन्ना के पांडेय ने किया। इसके पूर्व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की निदेशक (मेला) नीरा जैन ने मालिनी अवस्थी एवं अन्य वक्ताओं को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर किताब के प्रकाशक जलज कुमार ने मोमेंटो देकर वक्ताओं का स्वागत किया। स्वस्थ भारत की ओर से प्रियंका सिंह ने मालिनी अवस्थी को शॉल देकर सम्मानित किया।

कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की ओर से पंकज चतुर्वेदी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। भोजपुरी में किताब न पढ़ने की बात अब झूठ है अक्सर यह कहा जाता है की भोजपुरी में लिखी किताबों कोई नहीं पधता है। लेकिन इस बात झूठ साबित कर दिया है आशुतोष कुमार सिंह की किताब अँजुरी भर चाउर ने।

विश्व पुस्तक मेला में लोकार्पित हुई किताब अँजुरी भर चाउर की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। इस किताब के बारे में बताते हुए लेखक आशुतोष कुमार सिंह ने बताया की उनकी दिली ख्वाहिस है की भोजपुरी में गद्य लिखा और पढ़ा जाए। यही कारण है की उन्होंने भोजपुरी गद्य का संकलन प्रकाशित कराया है। उन्होंने बताया की भोजपुरी में ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई गद्य संग्रह सचित्र प्रकाशित हो रहा हो। इस किताब के लिए रेखचित्र प्रसिद्ध कलाकार बंसीलाल परमार ने बनाया है। हर्फ़ प्रकाशन के निदेशक जलज कुमार ने बताया की हमारा प्रयास है की हम रीजनल भाषा की पुस्तकों को भी आगे बढ़ाने का काम करें। इसी कड़ी में अँजुरी भर चाउर का हम प्रकाशन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस किताब की खूब चर्चा हो रही है। संजू फ़िल्म फेम शेखर अस्तित्व, फ़िल्म इतिहासकार एवं गजलकार मनोज सिंह भाउक, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं मैथिली भोजपुरी अकादमी के सदस्य प्रो मुन्ना पांडेय, बॉलीवुड गायक टोची रैना, संगीतकार सरोज सुमन, बटला हाउस फेम अभिनेता अमरेंद्र शर्मा सहित दर्जनों सेलिब्रेटियों ने भी अपने वाल से इस पुस्तक को पढ़ने का आह्वान किया है।

लेखक आशुतोष कुमार सिंह मूल रूप से सीवान जिला के रजनपुरा गांव के रहने वाले हैं। उनकी पहचान एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में देश भर में रही है। दो बार उन्होंने भारत की यात्रा की है। हाल ही में उन्हें पॉजीटिविटी अवार्ड से दिल्ली में सम्मानित किया गया था। भोजपुरी ने एमए करने वाले आशुतोष कुमार सिंह भोजपुरी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।

दीपक चौरसिया और अजय कुमार ने राहुल गांधी का दिलचस्प इंटरव्यू लिया

rahul gandhi ka interview

विनीत कुमार, मीडिया विश्लेषक

ऐसे इंटरव्यू से मीडिया और राजनीति दोनों के प्रति चार्म बचा रहता है :

न्यूज नेशन के दीपक चौरसिया और अजय कुमार के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इंटरव्यू दिलचस्प है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू लेकर चैनल ने जो अपनी भद्द पिटवायी, इस इंटरव्यू में काफी हद तक डैमेज कंट्रोल होता नजर आ रहा है. इसकी एक वजह ये भी है कि दीपक चौरसिया की जितनी नजदीकी भाजपा से रही है, इस मुकाबले कांग्रेस से नहीं. लिहाजा, पूरी बातचीत में अपने पेशे के प्रति एक ठसक दिखती है जो कि जरूरी भी है. बस ये सब जगह बरकरार रह जाय,बस..

टीवी पर किसी भी कार्यक्रम को देखने का मेरा अपना तरीका है. मैं बोले गए शब्दों से पहले जो बोल रहे होते हैं, उनकी देहभाषा पढ़ने का कोशिश करता हूं जिसे कि बॉडी लैंग्वेज या गेस्चर कहते हैं. इस इंटरव्यू में लगा कि दोनों मीडियाकर्मी की हैसियत से बात कर रहे हैं जिसकी अपनी एक सत्ता है..नहीं तो आप इस चैनल पर नरेन्द्र मोदी से लिया गया इंटरव्यू दोबारा से देखिए, लगेगा दीपक चौरसिया जी हुजूर कहने की मुद्रा में हैं. आपको गोदान का दृश्य याद हो आएगा. खैर

पूरी बातचीत में सबसे अच्छी पंक्ति लगी जब दीपक चौरसिया ने एक से ज्यादा बार दोहराया- नहीं, आपने जो कहा है, उससे एक सेकण्ड भी कुछ एडिट नहीं होगा. राहुल गांधी ने नोटशीट पर कविता के अलावा क्या लिखा था कहकर चैनल की विश्वसनीयता को लेकर जो संदेह किया, ऐसा कहने के अलावा कोई चारा भी नहीं था. दीपक पुराने लोगों में से हैं. वो जानते हैं, मीडिया के प्रति लोगों का भरोसा कैसे बरकरार रखना है?

पूरे इंटरव्यू में जो सबसे अच्छा सवाल लगा वो अजय कुमार का- आपने संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गले लगाया. संसद में आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, आपके दिमाग में उस वक्त क्या चल रहा था ?

रही बात राहुल गांधी की तो पांच साल में बीजेपी ने एक ऐसे व्यक्ति को गहरे आत्मविश्वास से भर दिया जो खुद भी कभी इतना प्रभावशाली शायद नहीं पाता. इन्हें बोलना सिखा दिया.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के खाते में झोल नहीं है. एक से एक गड़बड़ियां है लेकिन राहुल गांधी के भीतर ये कला आ गयी है कि किस बात पर एक पंक्ति में अपनी /कांग्रेस की गलती मान लेनी है और किस मुद्दे पर मौजूदा सरकार की नाकामियों को सामने रखना है ?

इस तरह की बातचीत से गुजरने पर हम एक दर्शक के तौर पर खुद को ठगा महसूस नहीं करते, हमारे भीतर चालीसा और इंटरव्यू का स्वाद अलग-अलग समझने की क्षमता बची रहती है. बाकी मीडिया तो मंडी है ही…

(लेखक के फेसबुक वॉल से साभार)

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