ये च्यवनप्राश पत्रकारिता का काल है.

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1. ये च्यवनप्राश पत्रकारिता का काल है. कोशिश है कि किसी तरह कड़ाके की ठंड के बीच गर्माहट पैदा हो. मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए मोहन भागवत और आसाराम बापू जैसों के अंट-शंट बयान मुलेठी,दालचीनी का काम कर रहे हैं. इन सभी बुद्धि-दूहन में होड़ इस बात की है कि मुलेठी,अदरक से निकलकर अश्वगंधा कौन बने.

आप सबों से अपील है कि आजतक, जी न्यूज और एबीपी च्यवनप्राश के बजाए घर के बने च्यवनप्राश का सेवन करें. अर्थात् खबर अगर धंधा है तो प्लीज खबरों की कुटीर उद्योग की तरफ लौटिए और ऐसी वाहियात बयानबाजी से एफबी की दीवारें रंगने के बजाय इन्हें इग्नोर कीजिए. बिना वजह इन्हें जातिवाचक से व्यकितवाचक संज्ञा न बनाएं.

2.क्या मीडिया में व्यक्तिगत स्तर की ईमानदारी की कोई जगह नहीं होती ? मीडिया संस्थान अगर खुद ही इतने घोटालों,बेईमानी,धोखाधड़ी,चालबाजी और शोषण के अड्डे के रुप में आरोपों से घिर चुका है तो वहां साफ-सुथरी छवि के मीडियाकर्मी के होने-न होने के कोई खास मायने नहीं होते. आप सवाल करेंगे कि जब वो सिस्टम को सुधार ही नहीं सकता तो हम उनकी ईमानदारी का अचार डालेंगे ?

तब सवाल तो ये भी है कि मीडियाकर्मी अपनी ईमानदारी को खपाए कहां ? आपको एतबार है नहीं, चैनल में पैकेज में उसकी खपत हो नहीं सकती, परिवार के लोग शायद ही इसे समझ सकें और उस हिसाब से चलें ? तो अंत में एक बदनाम चैनल का मुखौटा बनने के अलावे दूसरा रास्ता क्या है ? मीडिया मंडी की एक डंडी बनकर धंसा रहे जो धंधे और सरोकार के बीच संतुलन बनाता दिखाई दे. टेल मी समथिंग प्लीज. (विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से )

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