आजाद भारत के मायने

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सुजीत ठमके

lalkilaमैं पिछले माह कुछ काम से बैंगलुरु गया था। बेंगलूर के रेलवे स्टेशन पर पैर रखा। एक नन्हा, मासूम, उम्र लगभग १२ साल होंगी। मेरे पास आया। रोत, बिलगते कहने लगा साहब बहुत भूख लगी है। कुछ भी पैसा नहीं चाहिए। केवल आप के पास रात का बचा हुआ बासा खाना होगा तो दीजिये। मै कुछ मिनिट स्तब्ध रहकर सोच में पड़ गया। आमतौर पर रेलवे स्टेशन, बस स्टाप, चौराहा, ट्रैफिक सिंगल आदि के इर्दगिर्द भीख मांगने वाले बच्चो का एक गिरोह होता है। यह गिरोह बच्चो से भीख माँग कर पैसा जमा करता है। दो जून की रोटी उनको देता है। और मोटी रकम डकार लेता है। ऐसी खबरे मैंने कई बार अखबारों में, टीवी चैनल्स में देखि थी। पढ़ी थी। बेंगलूर के मासूम १२ साल के नन्हे बच्चे को मैं स्टेशन के रेस्तरां में लेकर गया। रेस्तरां में खाना खाने के बाद उस नन्हे बच्चे ने मुझे कहा साहब जिंदगी में पहली बार ऐसा खाना मैंने खाया है। मैंने जिज्ञासा से पूछा आप जिस देश में रहते हो उस देश का नाम क्या है। बच्चे ने जवाब दिया साहब ……. पता नहीं। जी हां……… एक १२ साल के बच्चे को वो जिस देश में रहता है। जिस देश का नागरिक है। उस देश का नाम ही पता नहीं। मेरे जेहन कई गंभीर सवालो ने जन्म दिया। क्या यही है आजाद भारत के मायने ? जी नहीं …… . कोई भी संवेदनशील, जागरूक नागरिक, नेता, मंत्री, अफसर या आम आदमी को इस बात की पीड़ा जरूर होनी चाहिए।

ऐसे करोडो नन्हे बच्चे होंगे जिन्हे वो किस देश के नागरिक यह पता ही नहीं होगा। संवैधानिक अधिकार, राइट टू एजुकेशन, फंडामेंटल राइट्स, शिक्षा, रोजगार,स्वस्था आदि आदि आदि……. दूर की कौड़ी है। दरअसल मुद्दा राजनीति,नौकरशाही द्वारा बनाई जाने वाली योजनाओ के बेहतर परिणामो है। पिछले १० वर्षो से दिल्ली के लाल किले से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को सम्बोधित किया है। कई लोकप्रिय घोषणाओं का अम्बार लगाया। इस साल केंद्र में बीजेपी है। लाल किले से लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्बोधित करेंगे। किन्तु देश की त्रासदी देखिये। पिछले ६५ वर्ष में देश ने कई प्रधानमंत्री का कार्यकाल देखा एवं उनके सरकारी योजनाये भी। एकतरफ लोकप्रिय प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा तो दिया किन्तु इस योजनाका खाका ही तैयार नहीं किया। तो दूसरी तरफ यूपीए-०२ सरकार ने फ़ूड सेक्युरिटी बिल लेकर आई किन्तु जब की योजना को अमली जामा पहनाने का वक्त आता है तब दफ्तरशाही, नौकरशाह बीच बेहतर योजनाये दम तोड़ देती है। आज देश की आबादी १२५ करोड़ है। ३६ करोड़ बीपीएल में आते है। लगभग ७० करोड़ लोग महज एक समय ही भरपेट खाना खाते है। मतलब १२५ करोड़ में से केवल १०६ करोड़ लोग हाशिये पर है। जी हां…… १०६ करोड़ जनता हाशिये पर। मतलब १०६ करोड़ लोग एक देश के नागरिक को जो मूल अधिकार मिलने चाहिए उससे वो दूर है। यूपीए-०२ सरकार के पूर्व योजना आयोग के उपाध्यक्ष अहलूवालिया ने जो व्यक्ति ३६ रु. प्रति दिन कमाता हो वो गरीब नहीं है इस तरह गरीबी की परिभाषित किया था। कमोबेश इसी लकीर को गुजरात सरकार ने खींची थी। दरअसल देश की पीड़ा देखिये। अहलूवालिया जब गरीबी को परिभाषित कर रहे थे तब योजना आयोग के अध्यक्ष पूर्व प्रधानमन्त्री अर्थशास्त्री मनमोहन सिह थे। और गुजरात सरकाने जब गरीबी को परिभाषित किया था तब राज्य के मुखिया नरेंद्र मोदी थे। गरीबी को परिभाषित करने से या यु कहे आय के मापदंड को कम करने से मूल समस्या पर ना तो कोई बेहतर सोलुशन निकाल पाएंगे। ना ही इस समस्या से निजात पाएंगे। सरकार आते रहेंगी। जाती रहेंगी। कांग्रेस के ६५ साल की आलोचना बीजेपी करेंगी। और डिफेंस में कांग्रेस आएँगी। आलोचना और पलटवार के बीच मूल मुद्दे हाशिये पर चले जाएंगे। जिस दिन देश के उन करोडो बच्चो को हम भारत देश के नागरिक होने का एहसास होगा। उसी दिन आजादी के मायने भी बदलेंगे।

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