ख़बर पहुँचाने वालों की जान की कीमत क्या हो सकती है ?

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कासिद हुसैन, पत्रकार

एक और साल अपने अंत की ओर है। इस ख़त्म होते साल में कई घटनाएं महतवपूर्ण और दुखद रहीं। लेकिन इस जाते हुए साल में उन लोगों की बात करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है जिनके कारण हम दुनिया की खबरें जान पाते हैं। “पत्रकार”। वर्त्तमान में हम लगातार अपने देश में नक्सलियों या माओवादियों द्वारा पत्रकारों की हत्या के बारे सुनते रहते हैं। लेकिन सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के देशों में कई पत्रकार अपनी जान अपने काम के दौरान खो देते हैं। कई पत्रकारों के मौत का तो हमें पता भी नहीं चलता। साल 2013 में दुनिया भर में सत्तर पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान मारे गए। जिनमें सबसे असुरक्षित क्षेत्र मध्य पूर्व साबित हुआ। “कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नालिस्ट” संस्था के अनुसार अकेले सीरिया में 29 पत्रकार मारे गए ,इसके अलावा इराक में फिर शुरू हुए सांप्रदायिक हमलों में 10 पत्रकारों ने अपनी जान गँवाई। मिस्र की क्रांति के दौरान भी छ: पत्रकार अनजानी मौत का निशाना बने। संस्था की ओर से बताया गया है कि पिछले साल 74 पत्रकार मारे गए थे। लेकिन इस ऐसे 25 और पत्रकारों को अभी इनमे शामिल नहीं किया गया और ये जांच की रही है की क्या ये रिपोर्टिंग क दौरान ही मारे गए थे या नहीं।

फिलीपींस, भारत ,पाकिस्तान ,ब्राज़ील बंगलादेश ये ऐसे देश सामने आये हैं जिन्हे पत्रकारों के संवेदनशील बताया गया है। ये फेहरिस्त और भी लम्बी है। लेकिन यहाँ इस बात पर ग़ौर किया जाना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि किसी भी देश की सरकार की तरफ से इस मामले में कोई भी कदम नहीं उठाया गया है और न ही ऐसे कोई उपाए किये गए हैं जिससे पत्रकार सुरक्षित महसूस कर सकें। अफ़ग़ानिस्तान ,पाकिस्तान और कश्मीर, यहाँ कई विदेशी पत्रकारों की हत्या 90 के दशक में की गयी। और समय के साथ साथ इन घटनायों का दायरा बढ़ता ही गया। भारत में भी और विश्व में भी। भारत के नक्सल प्रभावित राज्यों से अभी कुछ ही दिन पहले खबर आयी थी कि वहाँ के पत्रकारों ने नक्सलियों की किसी भी खबर का बहिष्कार कर दिया है। इसे एक हल के रूप में देखा जा सकता है ? नहीं। और इसके अलावा कुछ महीने पहले एक भारतीय पत्रकार पाकिस्तान गए। जहाँ उन्हें धमकियाँ और चेतावनी मिली कि “वापस चले जाओ” उन्हें बहुत ही हड़बड़ी में बिना काम किये वापस आना पड़ा। सुरक्षा की गारंटी के बिना कोई भी ऐसा ही करेगा। और पाकिस्तान वैसे भी तालिबान की वजह से बदनाम है।

ख़ैर एक पाकिस्तानी पत्रकार का भी थोड़ा सा ज़िक्र कर दूं। जिन्हें देश के एक प्रधानमंत्री ने उनके चैनल से ही निकलवा दिया था। वजह थी उनके भ्रष्टाचार का बहंडाफोड़ करना। इसके अलावा जब उन नेता की कुर्सी गयी और दुसरे नेता के आने पर उन्होंने दोबारा चैनल में काम करना शुरू किया तब हालात ये आ गए की उनके चैनल पर हमला करवा दिया गया और 2013 में तालिबान ने उनकी कार में बम रखवा दिया। खुशकिस्मती से वे बच गए। वे पत्रकार हैं जियो चैनल के ”हामिद मीर” । हर कोई उन जैसा नसीब वाला नहीं होता इसी का अंजाम है कि हमने कई भारतीय और विदेशी पत्रकार बीतते साल में खोये। सवाल उठता है कि आखिर किसी सरकार ने अपने देश देश में इनकी सुध क्यों नहीं ली और क्या भविष्य में किसी सकारात्मतक की उम्मीद की जा सकती है। ज़ाहिर है इस सवाल का जवाब यूँ ही नहीं मिल सकता। होना तो ये चाहिए कि इस पर भी “यूनाइटेड नेशन” में एक क़ानून बनना चाहिए ,एक संधि होनी चाहिए और प्रत्येक देश को ऐसी किसी भी घटना के लिए जवाबदेह होना चाहिए। क्योंकि पत्रकार की जान आज के दौर में सस्ती नहीं है।

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