जय मूर्छित लोकतंत्र की !

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पॉलिटिक्स की खबर पॉलिटिकल खबर पर
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लालू यादव के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में 1 मार्च 2007 को रिव्यु याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को राज्य सरकार की सहमति के बिना जांच का आदेश देने को क्षेत्राधिकार से बाहर बताया और कहा कि यह राजनीति से प्रेरित है | याचिका पर न्यायाधिपतिगण कबीर और दत्तु ने सुनवाई की और 17 फरवरी 2011 को निर्णय सुरक्षित रखा लिया | यह निर्णय 13 दिसंबर 2012 को घोषित किया गया और धारित किया कि उक्त आदेश सही था | यह विलम्ब इसलिए किया गया कि इस बीच होने वाले वाले चुनावों पर इसका राजनैतिक प्रभाव न पड़े | क्या न्यायाधीश राजनीति से मुक्त हैं ..? देश हित से ज्यादा किसी राजनेता का भविष्य इस महान भारत में ज्यादा महत्वपूर्ण है |

हाल ही आशाराम ने बीमारी के आधार पर जमानत मांगी तो उसे यह कहा गया कि उसे ऐसी कोई बीमारी नहीं है जिसके लिए ऑपरेशन करवाना पड़े या इलाज के लिए घर जाना पड़े | किन्तु प्रश्न यह है कि क्या यही प्रश्न राजनेताओं को जमानत के वक्त भी पूछा जाता है ? और संजय दत्त को तो उसकी बहन के प्रसव काल में मदद के लिए भी जमानत दे दी जाती है | संसारचन्द्र गंभीर बीमारियों से जूझता हुआ मर जाता है लेकिन उसे इलाज के लिए जमानत नहीं दी जाती |इसी तरह एक साध्वी गंभीर बीमारियों से जूझ रही है परन्तु जमानत नहीं मिली | अक्षरधाम के अभियुक्तों को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मुक्त किया है कि निर्दोष लोगों को फंसाया गया है किन्तु इस बीच लगभग अनुचित रूप से भुगती गयी जेल यातनाओं के लिए उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया है | आपराधिक मामलों में किसी को दोषी तभी ठहराया जाता है जब वह तर्कसंगत संदेह से परे दोषी पाया गया हो| तर्क संगत संदेह से परे दोषी पाए जाने और निर्दोष को फंसाए जाने में जमीन आसमान का अंतर होता है और इसे महज मत का अंतर ( Difference of opinion ) कहना सही नहीं होगा और न ही इसे कोई मानवीय भूल के आवरण से ढका जा सकता | इस प्रकरण में आपराधिक न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है व माना जा सकता है कि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं | कुछ विद्वान् यह भी कह सकते हैं कि अक्षरधाम के अभियुक्तों ने मुआवजा की मांग नहीं की थी किन्तु सुप्रीम कोर्ट तो पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी राहत स्वीकार कर सकता है और कई मामलों में बिना मांगी राहतें भी दी हैं | वैसे याची अपनी याचिका में परम्परा के तौर पर यह निवेदन भी करते हैं | इस प्रकरण में भी जिन अभियुक्तों ने अपील नहीं की थी उनको भी दोषमुक्त किया है | सुप्रीम कोर्ट भी मांगी गयी सभी राहतें स्वीकार नहीं करता तो फिर बिना मांगे राहत भी तो दी जा सकती है | दूसरी परंपरा यह है कि ज्यादा राहत माँगने पर सम्पूर्ण याचिका को भी खारिज कर दिया जाता है इसलिए इस अंदेशे से बचने के लिए पक्षकार ज्यादा राहतें माँगते भी नहीं हैं |
यदि ऐसा मानवीय भूल के कारण हो तो फिर आम नागरिक के पक्ष में और प्रभावशाली लोगों के हित के विरुद्ध ऐसी भूलें कभी क्यों नहीं होती | यदि मानवीय भूल क्षम्य हो तो फिर चिकित्सकीय लापरवाही के लिए भी दंड और मुआवजा क्यों दिया जाता है | अक्सर न्यायाधीशों के अनुचित फैसलों का यह कहकर बचाव किया जाता है कि अपील में उन्हें सुधारा जा सकता है और यही बात दोहराते हुए यदि अपीलीय न्यायालय अनुचित फैसला दे दे तो फिर न्याय किस स्तर और मंच पर मिलेगा | और यदि यही बात एक चिकित्सक कहे कि उसके द्वारा हुई मानवीय भूल को किसी अन्य चिकित्सक से इलाज करवाकर सुधारा जा सकता था तो फिर क्या इसे न्यायालय स्वीकार कर लेंगे |
हाल ही में पीके फिल्म पर रोक लगाने से इन्कार करते हुए भी कहा गया कि रोक लगाने से जो व्यक्ति इसे देखना चाहते हैं उनके अधिकार प्रभावित होंगे इसलिए रोक नहीं लगाई जा सकती | किन्तु यही तर्क फिर पोर्न फिल्मों और वेबसाइटों के विषय में भी तो लिया जा सकता है |राजस्थान सरकार ने एक सुनियोजित कूटनीतिक चाल के तहत पंचायत राज अधिनियम में एक अध्यादेश के जरिये संशोधन करके अशिक्षित लोगों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जिसके विरुद्ध अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी | अनुच्छेद 32 में याचिका दायर करना संविधान में मूल अधिकार बताया गया है किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को वापिस कर दिया और उच्च न्यायालय जाने को कहा जबकि उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 226 में याचिका स्वीकारना विवेकाधिकार माना जता है | यह समझ से बाहर है कि जब अनुच्छेद 32 में याचिका दायर करना मूल अधिकार है तो फिर सुप्रीम कोर्ट इससे मना कैसे कर सकता है |

आपराधिक मामलों में जमानत देने की शक्ति निचले स्तर के न्यायालयों , सत्र न्यायालयों और उच्च न्यायलयों में निहित है किन्तु तसलीमा नसरीन ने जमानत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दयार की और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे डाली और उसे यह कभी नहीं कहा गया कि वह पहले निचली सीढियां पार करके इस स्तर तक पहुंचे | दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन , सुधार और डॉक्टरों की कमीशन खोरी रोकने के लिए दायर की गयी किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस सम्बन्ध में सरकारी मशीनरी है इसलिए उनके पास जाएँ | प्रश्न यह है कि दिखावट के तौर पर सरकारी मशीनरी तो लगभग हर मामले के लिए है और उसे उनके अधिनस्थों कि कार्यशैली का ज्ञान होता है व होना चाहिए किन्तु वे कोई निराकरण नहीं करते | यदि सरकारी मशीनरी ही निराकण कर दे तो रिट याचिकाएं दायर ही क्यों होंगी जबकि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के लगभग 75% मामलों में सरकारें ही पक्षकार होती हैं |

बिहार में भागलपुर में पीठासीन सत्र न्यायाधीश पर पुलिसवालों ने व्यक्तिगत हमला कर दिया जिसके लिए अवमान का मामला दर्ज कर उन्हें 2 माह के भीतर ही सजा सुना दी गयी किन्तु अरुण शोरी द्वारा दिनांक 13.8.90 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित सम्पादकीय के विरुद्ध दायर अवमान याचिका पर आखिर 24 वर्ष बाद निर्णय देकर अभियुक्त को मुक्त किया गया है |जबकि न्यायाधीशों को यह मानना था कि यह प्रकाशन न्यायपालिका की अस्मिता पर आक्रमण है | कारण चाहे कुछ भी रहे हों किन्तु जनता के मन में न्यापालिका के प्रति संदेह होना स्वाभाविक है कि इतने विलम्ब के पीछे क्या छिपे हुए उद्देश्य रहे होंगे | जहाँ अनुकूल बेंच का इंतज़ार भारत में सामान्य बात मानी जाती है वहीँ न्यापालिका भी किसी के विरुद्ध अवमान का मामला लम्बे समय तक विचाराधीन रखते हुए उसे भयभीत रख सकती है और आगे भविष्य में न्यायपालिका के विरुद्ध कुछ भी विचार प्रकट रखने से रोक सकती है क्योंकि उसके सर पर तलवार लटकी हुई है इस प्रकार विलम्ब करके एक दूसरे को ब्लैकमेल करके दोनों लाभ उठा सकते हैं |अहमदाबाद के मजिस्ट्रेट ब्रह्मभट्ट पर आरोप था कि उसने चालीस हजार रूपये लेकर 4 प्रमुख व्यक्तियों के नाम वारंट जारी किये किन्तु एक सप्ताह में रिपोर्ट मिलने के बावजूद मामला में सुप्रीम कोर्ट में 10 साल से विचाराधीन है | मेरे स्वतंत्र मत में, अपवादों को छोड़कर ,सभी स्तर के भारतीय न्यायाधीश न तो विद्वान हैं और न ही भले हैं | भारत में न्याय के ये तो कुछ नमूने मात्र हैं , असली कहानी तो न्यायार्थी बेहतर जानते हैं |

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