आजतक में जब उदय शंकर को गुस्सा आया तो अजीत अंजुम एक्शन-जैक्शन बन गए

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AJIT ANJUM WITH UDAY SHANKAR
आजतक का वो दौर , हमारा पी - 5 और उदय शंकर जैसा बॉस....

स्टार इंडिया के प्रमुख उदय शंकर को इम्पैक्ट पर्सन ऑफ द डिकेड का अवार्ड मिला. इसे लेकर मीडिया जगत से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है. इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमेन ‘अरुण पुरी’ समेत तमाम दिग्गजों की प्रतिक्रियाएं आ रही है.उसी संबंध में इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने भी अपने कुछ दिलचस्प अनुभवों को साझा किया है. पढ़िए अजीत अंजुम के यादों के झरोखे से ‘आजतक का वो दौर , हमारा पी – 5 और उदय शंकर जैसा बॉस’….

अजीत अंजुम,मैनेजिंग एडिटर,इंडिया टीवी

AJIT ANJUM WITH UDAY SHANKAR
स्टार इंडिया प्रमुख उदय शंकर(दायें) के साथ इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजीत्त अंजुम (बाएं)

साल 2003 के जनवरी -फरवरी का महीना रहा होगा . मैं उन दिनों ‘आजतक ‘ में सीनियर प्रोडयूसर था और मार्निंग शिफ्ट का इंजार्च था . सुबह का बुलेटिन रोल हो रहा था . मैं पीसीआर में था . एंकर टेंपररी तौर पर बनाए गए एक स्टूडियो में एंकर थी और शो लाइव था . किसी वजह से एंकर के कानों में पीसीआर का कमांड नहीं पहुंच पा रहा था . कोशिश नाकाम रही तो हमने उस एंकर को ड्राप किया और मेन स्टूडियो के एंकर के साथ मार्निंग बुलेटिन रोल कर दिया . पहली स्टोरी ऑन एयर ही हुई थी कि पीछे से एक तेज आवाज पीसीआर के बंद दरवाजे को चीरती हुई भीतर दाखिल हुई
” अजीत अंजुम , ये क्या हो रहा है ? तुमने दीप्ति ( नाम बदल रहा हूं ) से बुलेटिन रोल क्यों नहीं किया ? WHAT IS THIS ? ”

मैंने पलटकर पीछे देखा . शीशे के दरवाजे के पार चीखने वाला वो शख्स खड़ा था और इस पार मैं . मैं कुछ बोलता उससे पहले उस शख्स ने दरवाजा खोला और अधखुले दरवाजे के पास खड़े होकर फिर उसी तेवर -तल्खी के साथ कहा – “What is this ? What happened? Give me an answer .”
मैंने पलटकर देखा . पीसीआर में चार – पांच लोग थे . सब सन्नाटे में थे . जैसे सबको सांप सूंघ गया हो . अब जवाब देने की बारी मेरी थी .
मैंने अपने को नियंत्रित करते हुए कहा – ” एंकर का ऑडियो थ्रू नहीं हुआ था ”

AJIT ANJUM WITH UDAY SHANKAR
आजतक का वो दौर , हमारा पी – 5 और उदय शंकर जैसा बॉस….

उस शख्स ने उसी टोन में कहा – “एंकर सुबह पांच बजे से यहां आई हुई है . सुबह छह बजे का बुलेटिन है तो ऑडियो क्यों नहीं थ्रू हुआ .”
मैंने पीसीआर के स्वीचर और ऑडियो इंजीनियर की तरफ इशारा किया कि वो इसका जवाब दें लेकिन तब तक उस शख्स की तेज आवाज फिर गूंजी . मैं कुछ सुनना नहीं चाहता . तुम लोग प्लान नहीं करते . मैं कुछ तर्क देने की कोशिश करता रहा . 40-50 सेकेंड के संवाद के बाद वो शख्स बाहर चला गया . मैंने अपने को नियंत्रित किया . पीसीआर में तूफान के गुजर जाने वाली शांति जैसा माहौल बन गया. पैनल प्रोडयूसर के कांपते हाथों ने एंकर को कमांड देना शुरु किया . एक या दो पैकेज ही ऑन एयर हुए होंगे कि ये आवाज फिर गूंजी . इस बार वो शख्स जब पीसीआर में तीर की गति से दाखिल हुआ तो उसके हाथ में मोबाइल फोन ऑन था . फोन को मेरी तरफ बढ़ाते हुए उस शख्स ने कहा ..

” अजीत अंजुम ….बात करो दीप्ति से …वो कुछ कह रही है , तुम कुछ कह रहो हो . बुलेटिन का कबाड़ा कर दिया तुम लोगों ने …”
अब मुझ पर शनि सवार हो गया . मैं भूल गया कि वो कौन और मैं कौन . गलती मेरी थी नहीं और बिना गलती के दूसरी बार मैं ये झेलने -सुनने को तैयार था नहीं . मैं खीझ और गुस्से में कहा ” उदय शंकर जी , आप चार सौ लोगों के बॉस हैं , मैं भी कहीं चालीस – पचास लोगों की टीम का हेड था , यहां काम करने आया हूं लेकिन अगर आपको मुझसे अधिक किसी और की बातों पर भरोसा है तो रखिए अपनी नौकरी . मुझे नहीं करनी आजतक की नौकरी …मैं इसी वक्त जा रहा हूं …” तो ये उदय शंकर थे .

अब बारी पूरे पीसीआर के चौंकने की थी . सामने उदय शंकर जैसा कड़क और दबंग बॉस . जवाब देकर नौकरी छोड़ने का एलान करता मेरे जैसा एक सीनियर प्रोडयूसर . उदय शंकर एक ही वाक्य पूरा कर पाए थे शायद ..”YOU CANT BEHAVE LIKE THIS ? ”

मैं सुनने को कहां तैयार था . मैं उसी तेजी से पीसीआर से बाहर निकला जिस तेजी से उदय शंकर पीसीआर में दाखिल हुए थे . पीसीआर के बार दरवाजे के पास एक क्यूबिकल बना था , जहां मेरी सीट पर मेरा जैकेट रखा था . मैंने जैकेट उठाया और तेजी से बाहर निकल गया . एक – दो प्रोडयूसर ( जिनमें एक अखिल भल्ला भी थे ) मेरे पीछे दौड़े . अखिल सांतवे माले से नीचे जाने वाली लिफ्ट के दरवाजे तक आए . जब तक लिफ्ट नहीं आई , समझाते रहे कि यार ऐसा मत करो . छोड़ो …उदय कभी -कभी गुस्सा करते हैं . इसको इशू मत बनाओ. थोड़ी देर में वो खुद ही बात करेंगे . लेकिन मैं एक सेकेंड भी रुकने को तैयार नहीं था . मैं पार्किंग में पहुंचा . कार निकाली और घर के लिए चल पड़ा . लेकिन पार्किंग से सड़क तक पहुंचा ही था कि उदय का मेरे मोबाइल पर फोन आया . मैंने नहीं उठाया . पहला फोन ..दूसरा फोन ..तीसरा फोन ..मैंने नहीं उठाया . तभी दफ्तर से एक साथी के फोन की घंटी बजी . मैंने ड्राइव करते हुए उसका फोन उठाया . उसने एक ही लाइन कही -कहां हो आप ..उदय शायद आपसे मिलने नीचे तक गए हैं …मैंने उसका फोन काटा ही कि फिर उदय शंकर का फोन आया . इस बार मैंने फोन उठाया .

उदय शंकर की आवाज थी – ” तुम चुपचाप वापस आओ . मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं …और मैं नीचे हूं …” इस बार उदय की आवाज में अधिकार और प्यार दोनों था . मैं प्रतिरोध नही कर पाया . सिर्फ इतना कहा – ” सर , मैं घर जा रहा हूं . रहने दीजिए सर. ”
उन्होंने कहा -” चुपचाप वापस आओ . फालतू की बात नहीं . बाकी बातें हम यहीं करेंगे ”

शायद एकाध बार मैंने घर जाने की बात कही लेकिन उदय शंकर ने जिस ढंग से वापस आने का आदेश दिया , उसे मैं टाल नहीं सका . इस बार उदय बॉस नहीं , एक दोस्त से लग रहे थे .

मैं शायद आईटीओ के पास से वापस लौटा . इतनी देर में मैं नौकरी छूटने , उसके बाद तमाम तरह की चर्चाओं के तेज होने , कई महीने बेरोजगार होने …जैसे कई ख्यालातों से गुजर भी चुका था. ये भी सोच चुका था कि मीडिया में हल्ला होगा कि मैंने बास के साथ बकझक की है तो शायद आसानी से नौकरी नहीं मिले तो क्या – क्या करना पड़ सकता है . दस मिनट में ही दस विकल्प और दस तरह की स्थितियों की कल्पना कर चुका था , लेकिन शायद होना कुछ और था . मुझे आजतक में ही वापस लौटना था . उसी उदय शंकर के साथ रहकर इस मीडिया में बहुत कुछ करना था.

अगर मुझे ठीक से याद है तो उदय शंकर आजतक के वीडियोकॉन दफ्तर के नीचे मेरा इंतजार कर रहे थे . वो मुझे अपने साथ आठवें फ्लोर पर ले गए , जहां आजतक की कैंटीन थी . उदय शंकर दरअसल उन दिनों टीवी टुडे के अंग्रेजी चैनल हेडलाइंस टुडे को लांच करने की तैयारियों में जुटे थे , इसलिए वो सुबह छह बजे अक्सर ट्रैक शूट में ही दफ्तर आ जाते थे . दो -तीन घंटे बाद घर लौटते . फिर तैयार होकर सुबह दस बजे की मीटिंग के लिए वापस आ जाते थे . खैर, उदय मुझसे कैंटीन में काफी देर तक मुझसे बात करते रहे . उन्होंने अपनी कार से अपने ब्रेकफास्ट का डब्बा मंगवाया . हम दोनों ने साथ में ब्रेकफास्ट किया . उदय की बातों से साफ लग रहा था कि अपने व्यवहार को लेकर उन्हें अफसोस है . मैंने उनके व्यवहार में इतना अपनापन देखा कि मैं ही उनसे बार -बार कहता रहा – छोड़िए सर , रहने दीजिए . बात खत्म . उदय एक दोस्त की तरह बात करते रहे . दफ्तर की भी और इधर – उधर की भी . फिर उनके साथ ही मैं कुछ देर बाद सातवे फ्लोर पर न्यूजरुम में लौटा . उदय शंकर मेरे साथ आउटपुट तक गए और वहां मौजूद अखिल भल्ला से कहा – मैं इनको मनाकर ले आय़ा हूं …एक – दो बातें उन्होंने और कही और अपने अंदाज में मुस्कुराते हुए वहां से चले गए . मैं शर्मीला सा उनकी बातें सुनता रहा . मेरा गु्स्सा दफन हो चुका था लेकिन न्यूज रुम में मुझे पता चला कि कई लोगों को ताजा अपडेट के साथ यहां से फोन जा चुका है . उदय शंकर और अजीत अंजुम के तल्ख संवाद में एक्शन और मसाला तलाशने वाले भाई लोग सक्रिय हो चुके थे . ये वो दौर था , जब आजतक से कई लोग एनडीटीवी इंडिया और स्टार न्यूज जा चुके थे और जा रहे थे . उनमें से कुछ लोगों ने मुझे फोन किया . पूरा मामला जानने की कोशिश की . मामले को मसाला मिक्स बनाने की कोशिशें भी हुई . मुझे भी हैरत हुई कि कितनी तेजी से उदय शंकर और मेरे बीच विवाद की खबर तीन चैनलों तक पहुंच गई . उदयनिंदा रस के शौकीन पत्रकार भाईयों को मजा इसलिए भी आ रहा था कि अजीत अंजुम तो उदय शंकर के ही लाए हुए आदमी हैं और उन्हीं से उनकी नहीं पटी तो कहानी तो बनती है . खैर , मैं लगातार आ रहे फोन के बीच अपना काम करता रहा .

दोपहर करीब तीन बजे आशुतोष , सुप्रिय प्रसाद , अमिताभ , संजीव पालीवाल और मैं जब एक साथ जुटे तो फिर सुबह की घटना पर बात होने लगी . सबकी दिलचस्पी ये जानने में थी कि सुबह में हुआ क्या . किसने क्या कहा …उसी पीसीआर के दरवाजे के बाहर खड़े होकर हम पांचो बात कर रहे थे , तभी पीछे से उदय शंकर अचानक पहुंचे . मेरी पीठ पर हाथ रखा और बाकियों को संबोधित करते हुए कहा – ये भाई साहब , अपने पराक्रम के किस्से आप लोगों को सुना रहे होंगे न….अब शर्मिंदा होने की बारी मेरी थी ..मैं कहता रहा – अरे नहीं , हम लोग यूं ही बात कर रहे थे ..वो मेरी आंखों में आंखे डाले दो तीन मिनट तक देखते रहे और अजीत अंजुम ….अजीत अंजुम कहते रहे ..सब मुस्कुराते रहे . ये वो दिन था , जिस दिन मैंने मान लिया कि इस आदमी में वो बात है , जो औरों में नहीं . उस दिन के बाद से आजतक छोड़ने तक उदय शंकर ने कभी मुझसे तल्खी से बात नहीं की . बल्कि कई बार बड़ी गल्तियों पर भी सिर्फ समझाया या अपने गुस्से पर नियंत्रण करते हुए गल्ती को तुरंत सुधारने की सलाह दी और मैं हर बार अपनी शिफ्ट में हुई गलतियों के लिए शर्मिंदा ही हुआ . न्यूज चैनलों में अलग – अलग जगहों से ऐसी गलतियां हो जाती है . मुझे इसका भी अहसास था कि कई बार उनके पास भी AP या GK ( अरुण पुरी और जी कृष्णन ) के फोन आते थे . उन्हें भी उन बातों , गलतियों या लापरवाहियों के लिए सुनना पड़ता था , जिसके लिए वो कतई जिम्मेदार नहीं थे . कई बार वो दफ्तर से बाहर होते थे और उनका फोन आता – ” अजीत , कुछ ऐसा चला है क्या

…मैं कहता – हां , चला है ..गलती से चल गया …”

उनका जवाब होता – ” चलो , मैं देखता हूं ..और मैं समझ सकता था कि मैं देखता हूं कि उनके लिए मतलब क्या होता होगा ” . ये बात भी सच है कि उदय शंकर उन दिनों अपने गुस्से के लिए बहुत कुख्यात थे . हमलोग कई बार उनके गुस्से को लेकर उनकी आलोचना भी करते थे .लेकिन गुस्सा करना और मिनटों में पिघलना उनकी फितरत थी . हालांकि बाद के दिनों में वो काफी बदल गए . अपने गुस्से को लेकर खुद ही मजे लेने लगे थे . हालांकि मेरी सहयोगी साथी मेरे गुस्से को लेकर भी बहुत कहानियां सुनाते – बनाते रहे हैं . मैं भी गुस्सा करने के तुरंत बाद अफसोस से भर जाता हूं और 99 फीसदी मामलों में तुरंत माफी मांग लेता हूं . फिर भी मैं मानता हूं कि गुस्सा न करने वाला इंसान बन पाऊं तो मेरी जिंदगी की उपलब्धि होगी.

एक बार का वाकया मैं शेयर करना चाहता हूं . रात के रिपीट बुलेटिन में कोई गलत पैकेज चल गया . अरुण पुरी तब आधी रात को बुलेटिन देखा करते थे . उनके बारे ये कहा जाता था कि एपी के लिए रात बारह बजे से दो बजे के बीच का बुलेटिन ठीक से रन डाउन में लगा था . वरना , कुछ उल्टा -पुल्टा चल गया तो खैर नहीं . ऐसी ही एक रात किसी बुलेटिन में सांसदों को कंप्यूटर दिए जाने संबंधी किसी खबर में कुछ बड़ी गलती चली गई . मैं सुबह की शिफ्ट का इंचार्ज था . सुबह करीब ग्यारह बजे एक्सटेंशन पर मेरे पास उदय शंकर का फोन आया

” अजीत , रात के रनडाउन में देखो , ऐसा कुछ चला है क्या …”

जब उदय मुझसे ये पूछ रहे थे तो पीछे से एपी और जीके की आवाजें आ रही थी . एपी कह रहे थे – UDAY ..I HAVE SEEN THAT STORY …I HAVE SEEN THAT ..मैं समझ गया कि कुछ गड़बड़ हुई है . किसी की गर्दन कटने वाली है . मैंने रात का पूरा रनडाउन जल्दी -जल्दी में चेक किया और तुरंत उदय को मोबाइल पर फोन करके कहा – ” सर ऐसा तो कुछ नहीं चला है …”

उदय फोन काटने से पहले एपी और जीके को कह चुके थे – NO…WE HAVE NOT PLAYED THIS STORY..

लेकिन पता नहीं मुझे क्यों लगा कि मुझे फिर चेक करना चाहिए . मैंने दोबारा रात बारह बजे से दो बजे का बुलेटिन चेक किया . मेरे होश उड़ गए . अरुण पुरी को जिस स्टोरी पर एतराज था , वो एक बजे के बुलेटिन में चली थी . अब मुझे लगा कि उदय शंकर मेरे कहने पर अरुण पुरी को गलत साबित कर रहे होंगे और अगर रन डाउन चेक किया गया तो उनकी पोजीशन फाल्स होगी . मैंने तुरंत उन्हें फिर फोन किया . इस बार दबी जुबान से सिर्फ इतना कहा – सॉरी सर. देखने में गलती हुई . वो खबर रात को चली है और उसमें ब्लंडर हुआ है . उदय ने बहुत ठंढ़े ढंग से कहा – मैं देखता हूं . तुम रन डाउन से उस स्टोरी को उड़ा दो .उदय चाहते थे कि सबूत ही खत्म कर दो ताकि बात तुम पर या किसी प्रोडयूसर पर न आए . ( ऐसा कौन बास करता है . दूसरा कोई होता तो अपने चेयरमेन को खुश करने के लिए ये भी कह सकता था – अभी गधे को सस्पेंड करता हूं …और यकीन मानिए ऐसा करने वाले लोगों की कमी नहीं है ) .

आजतक ज्वाइन किए मुझे कुछ ही महीने हुए थे . मुझे समझ में नहीं आया कि अब क्या करुं . मैंने तुरंत एक दो लोगों को फोन किया . रन डाउन से स्टोरी को डिलीट किया और इंतजार करने लगा कि अब क्या होता है . कुछ ही मिनटों बाद अरुण पुरी , जीके के साथ उदय शंकर न्यूज रुम में थे . अरुण पुरी ने खुद अपनी आंखों से स्टोरी को देखा था तो वो कैसा मान लेते कि स्टोरी नहीं चली है और उदय शंकर मेरे गलत फीडबैक पर उन्हें कह चुके थे स्टोरी नहीं चली है . उदय चाहते तो आसानी से ये कह सकते थे कि शिफ्ट इंजार्ज ने गलत जानकारी दी है . फिर गलत जानकारी दिए जाने की सजा मुझे मिलती नहीं मिलती ये तो अलग बात है लेकिन रात की शिफ्ट में जो लोग थे , उन्हें एपी का कोपभाजन जरुर बनना पड़ता . उदय ऐसे बॉस थे , जो अपने बॉसेज के सामने कभी अपने जूनियर के माथे पर गलतियों का ठीकरा नहीं फोड़ते थे . वो भी तब , जब किसी के फंसने की नौबत आ जाए . मैं उदय की बेचैनी उनके चेहरे पर देख रहा था . अपने पर अफसोस भी हो रहा था कि मैंने जल्दी में उन्हें गलत क्यों बता दिया . पता नहीं अगर मैंने उन्हें सही बताया होता तो एपी या जीके का रिएक्शन नाइट शिफ्ट के इंचार्ज के लिए क्या होता . लेकिन गलत बताकर उदय को मैं फंसा चुका था . तभी मैंने एपी , जीके और उदय के साथ मैंने आजतक के टेक्नीकल डायरेक्टर राहुल कुलश्रेष्ठ को सर्वर रुम की तरफ जाते देखा ( तब लाइब्रेरी में वो जगह थी , जहां से आर्काइव डिलीट किए जाते थे ) . अरुण पुरी शायद राहुल कुलश्रेष्ठ की मदद से टेक्नीकल एनक्वायरी कर रहे थे कि रन डाउन से स्टोरी डिलीट कैसे हुई और कब हुई ? मुझे टेंशन इस बात की हो रही थी कि अब अगर ये पता चला कि ये मेरे टर्मिनल से उस वक्त डिलीट किया गया , जब मैं शिफ्ट इंचार्ज था , तो मेरी खाट खड़ी होगी . एक तरह से ये अपराध भी था . मैं लाइब्रेरी की तरफ गया . उदय वहां एपी , जीके के साथ मौजूद थे . राहुल कुलश्रेष्ठ कंप्यूटर पर कुछ कर रहे थे . उदय से मेरी नजरें मिली . वो मेरे पास आए . मैंने कहा – सर , गलती हुई मुझसे . उन्होंने बहुत प्यार कहा – अरे , कोई गलती नहीं हुई . जाओ ..अपना काम करो ..मस्त रहो . जो होगा …मैं देखूंगा …

मैं अपराध भाव लिए वहां से चला गया . अपराध भाव इस बात के लिए नहीं कि मैंने रन डाउन से वो स्टोरी क्यों डिलीट की थी . अपराध भाव इसलिए था कि मैंने उदय शंकर को गलत जानकारी क्यों दे दी. खैर उसके बाद उस दिन क्या हुआ , मुझे पता नहीं चला . न मैंने लिहाज में उदय से पूछा , न उन्होंने बताया .पता नहीं उदय शंकर ने अरुण पुरी को क्या समझाया होगा या कैसे पूरे मामले को मैनेज किया होगा लेकिन शाम को फिर हम सब मिले तो इसी मुद्दे पर बातें करते रहे ( तब मैं , सुप्रिय प्रसाद , आशुतोष , संजीव पालीवाल , अमिताभ ..पांचों आउटपुट में थे और अपने को P -5 कहते थे ) . कोई दूसरा बास होता तो अपनी किसी जूनियर को शहीद कर देता या फिर सस्पेंड कर देता ताकि चैयरमेन की नजरों में अपने नंबर बढ़ जाएं .
ऐसे कई किस्से हैं , जब उदय शंकर अपने साथियों – सहयोगियों के पीछे चट्टान की तरह खड़े हुए . कंटेट के स्तर पर काम करने और प्रयोग करने की आजादी दी . खबरों के जिस ट्रीटमेंट से वो खुद सहमत नहीं होते थे लेकिन हम में से कोई अगर उनसे जिद करता तो वो अपने मन मुताबिक करने की छूट ये कहकर दे देते कि जाओ , जैसे मर्जी हो करो . बाद में कई बार एतराज भी करते कि यार , तुम्हें ऐसे नहीं करना चाहिए था ..अक्तूबर 2003 में जब मैंने आजतक छोड़कर अपनी पुरानी कंपनी बीएजी फिल्मस जाने का फैसला किया तब मुझे हिम्मत नहीं हो रही थी कि उदय शंकर को ये बात कैसे बताऊं . मैंने उस समय के आऊटपुट हेड शाजी जमां को अपना इस्तीफा सौंपा . शाजी इस्तीफा स्वीकार न करने की बात करते रहे . फिर उन्होंने ही उदय को बताया . उदय शंकर के कहने पर उस समय के इनपुट हेड आलोक वर्मा मुझे समझाते रहे . मेरी प्रोफाइल बदलने की भी बात करते रहे लेकिन मैं छोड़ने का फैसला कर चुका था . किसी तरह हिम्मत जुटाकर मैं उदय के केबिन में गया . उदय ने बहुत अधिकार के साथ आजतक न छोड़ने की सलाह दी . मुझे समझाते रहे . मैं चुपचाप सुनता रहा और आखिर में ये कहकर निकल गया कि सर, जाने दीजिए . मेरा इस्तीफा काफी जद्दोजहद के बाद स्वीकार हो गया .

संयोग देखिए मैें बीजेपी फिल्मस के संपादकीय प्रमुख के तौर पर स्टार न्यूज के लिए प्रोडयूस किए जाने वाले कंटेंट पर ही काम कर रहा था , तभी अचानक एक दिन पता चला कि उदय शंकर अब स्टार न्यूज के हेड बन रहे हैं . मुझे थोड़ी आशंका हुई . लगा कि जिस ढंग से कुछ ही महीने पहले मैंने आजतक उन्हें नाराज करके छोड़ा है , यहां अब मुश्किल होगी . स्टार न्यूज के एडिटर से अच्छे रिश्तों के बगैर बीएजी में मेरा काम नहीं चलता , क्योंकि हम स्टार न्यूज के ही कंटेंट प्रोवाइडर थे . उदय को मैंने शुभकामना संदेश भेजा , जवाब में उनके मैसेज आए . फिर जब स्टार न्यूज के मुंबई दफ्तर में पहली बार उनसे मिला तो उन्होंने इतनी गर्मजोशी और अपनापन दिखाया , जो आज भी मेरे जेहन में दर्ज है . वो भी तब , जब आजतक छोड़ने के बाद चार – पांच महीने तक मैं उनके संपर्क में नहीं था . न कोई फोन , न कोई संदेश. स्टार न्यूज से बाहर रहकर भी उन्होंने मुझे स्टार न्यूज की कोर टीम का हिस्सा माना . तमाम तरह के शोज हमने बनाए . हर कॉल पर हमेशा वो उपलब्ध रहे . तमाम तरह के राजनीतिक दबावों के बावजूद वो हमेशा हमारे शोज के साथ खड़े रहे . न जाने कितनी कहानियां है …जो उस शख्स की शख्सियत को बयान करती है . हमने स्टार न्यूज के तमाम तरह के स्टिंग आपरेशन किए . पचासों स्टोरीज की . कई कार्यक्रम बनाए और ये सब इसलिए कर पाए क्योंकि उदय शंकर ने इसके लिए आजादी दी और हमेशा पीछे खड़े रहे. अगर किसी स्टिंग आपरेशन के लिए हमने दस लाख का बजट बताया तो बिना डिटेल पूछे , उन्होंने एक फोन पर अप्रूव कर दिया. कई बार ऐसा भी हुआ कि उदय शंकर किसी स्टोरी को स्टार न्यूज पर चलाने के लिए तैयार नहीं होते थे तो विनोद कापड़ी या मिलिंद खांडेकर या मैं उन पर दबाव बनाते थे ..वो ये कहकर मान जाते थे कि तुम लोग अब ग्रुप बनाकर मुझ पर दबाव बना रहे हो . चलाओ .

उदय शंकर ऐसे बॉस हैं कि आप उनसे लड़ सकते हैं , बहस कर सकते हैं , जमकर अपनी असहमति जाहिर कर सकते हैं . नाराज होकर इस्तीफा दे सकते हैं लेकिन न तो वो जाने देंगे , न हीं किसी बात का बुरा मानेंगे , बशर्ते कि आदमी काम का हो . मुझे याद कि विनोद कापड़ी उन दिनों जब मुंबई में स्टार न्यूज में एक्जीक्यूटिव एडिटर थे और किसी बात पर उन्होंने उदय से नाराज होकर उन्हें देर रात नौकरी छोड़ने का मैसेज भेज दिया था . उससे पहले शायद विनोद की उदय से दो – चार बार बात हो चुकी थी . उदय शंकर ने रात को बारह बजे मुझे फोन किया और कहा – अपने उस बेवकूफ मित्र को समझाओ . ये बात – बात में नौकरी छोड़ने की बात क्यों करता है . देखो , इतनी रात को उसने एसएमएस पर इस्तीफा भेजा है . बात करो उससे और मुझे बताओ.

मैंने विनोद को उसी वक्त फोन किया . मुझे विनोद के इगो का ख्याल रखते हुए बात करनी थी क्योंकि उस समय हम इतने खुले भी नहीं थे . तो मुझे लगा कि कहीं उसे ये न लगे कि उदय और उनके बीच मैं क्यों पंचायत कर रहा हूं . लेकिन विनोद को जैसे ही मैंने इस बारे में पूछा , वो फट पड़ा . विनोद थोड़ी चढ़ा भी रखी थी . ऐसी अवस्था में उदय के लिए जो भी उदगार वो व्यक्त कर सकता था , करता रहा . मैं समझाता रहा कि यार काम में ये सब चलता रहता है. तुम छोटी सी बात को दिल पर ले लेते हो . ये तो देखो कि वो तुम्हें कितना पसंद करते हैं और तुम्हारी कितनी परवाह करते हैं . लंबी बातचीत के दौरान जब मैंने उसे समझाया तो विनोद पर असर हुआ और वो शांत हुआ . मैंने उदय को उसी वक्त फोन करके बताया कि विनोद बाबू शांत हो गए हैं , अब आप सो जाइए. उदय निश्चिंत हुए . अगले दिन उदय से फिर उसकी बात हुई और विनोद अपने काम में लग गया . उदय विनोद को बहुत पसंद करते थे और उसकी काबिलियत की कद्र करते थे .

विनोद कापड़ी जरुरत से ज्यादा भावुक किस्म के इंसान हैं और भावुकता में ऐसे संदेश वो उदय को करते रहते थे , उदय विनोद को समझाने का जिम्मा मुझे सौंप देते . कभी ये काम मिलिंद खांडेकर भी करते होंगे . ये उदय की खासियत थी और है . लेकिन हम सब ये जानते थे कि उदय शंकर हम लोगों को हमारे काम की वजह से पसंद करते हैं , सार्वजनिक तौर पर तारीफ करते हैं .

उदय शंकर के साथ जिन लोगों ने भी काम किया है या करेंगे , वो उन्हें एक अच्छे बास और एक अच्छे साथी के रुप में जरुर याद करेंगे . चाहे सुप्रिय प्रसाद हों , मिलिंद खांडेकर हों , शाजी जमां हों , विनोद कापड़ी हों , अभिजीत दास हों , संजीव पालीवाल हों , सुनील सैनी हों या ऐसे ही कोई और ……इन सबके बनने में उदय शंकर की भूमिका है …

(लेखक के एफबी से साभार)

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