एक रसिक संपादक के बहाने कुछ यूं ही …..

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महिलाओं के प्रति रसिकता क्या कोई अपराध है

मीडिया में महिलाओं का शोषण

 

अक्सर लड़कियों एवं महिलाओं की शिकायत होती है कि पुरूष उनसे शरीर को छूने का बहाना ढूंढते रहते हैं। जो पुरूष ऐसा करने की कोशिश करते हैं उन्हें नीच समझा जाता है। मीडिया एवं साहित्य में ऐसा अक्सर देखा जाता है। कई बार इसी आधार पर यौन प्रडताना का ममला बन जाता है और लोग नमक—मिर्च लगाकर उस पुरूष को नीच ठहराते हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि सभी पुरूषों की ऐसी लालसा होती है। यह स्वभाविक है। एक महिला ने फेसबुक पर एक पुरूष संपादक की आलोचना करते हुये लिखा है कि संपादक महोदय ने उनकी किसी दोस्त से कसकर हाथ मिला लिया। उसने कहा कि अगर वह महिला उसी समय उस संपादक के मुंह पर एक तमाचा लगाती या लोगों के सामने उनकी इज्जत उतारती तो आगे से वह किसी के सामने ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते। इस बात को पढ़ते ही कई पुरूषों ने उस संपादक की आलोचना में उतर पड़े। लेकिन मुझे लगता है कि यह पाखंड है। उनकी आलोचना करने वाले ऐसे पुरूषों को अपने अंदर भी झांकना चाहिये। यही नहीं अपने अंदर महिलाओं को भी झांकना चाहिये।

आपसे उम्र से बड़े या समान उम्र के किसी पुरूष से हाथ मिला लिया या किसी ने आपके न चाहते हुये भी छू दिया, किसी ने कंधे या सिर पर पर हाथ रख दिया तो क्या पहाड़ टूट पड़ा। कोई आपको बहला—फुसला कर, सही मायने में प्यार करके या प्यार का नाटक करके, नौकरी या शादी का लालच देकर या आपको पटा कर या आपसे दोस्ती करके आपकी सहमति से कोई कुछ भी कर ले — यौन संबंध स्थापित कर ले आपके शरीर से दिन—दिन खेलता रहे, आपको कोई फर्क नहीं पडता। लेकिन अगर अगर सहमति नहीं है तो किसी ने आपको छू लिया तो वह नीच और दुष्ट हो गया और आपके लिये इतनी बड़ी बात हो गयी कि आपने दिन रात का चैन खो दिया और द्रोपदी की तरह जब तक आपने उस आदमी को सबक नहीं सिखा दिया आपने आपनी तौहीन मान ली। कहा जाता है कि ऐसे कृत्य को सहन नहीं करना चाहिये, नहीं तो उसकी हिम्हमत बढ़ जायेगी और कल वह किसी का बलात्कार कर देगा। जो आदमी अपने जीवन के अंतिम पडाव में गया और वह अभी भी हाथ मिलाने या दबाने या ज्यादा कुछ नहीं कर पाया तो कैसे वह जीवन के बचे हुये दो चार वर्षों के भीतर किसी का बलात्कार कर देगा। उस बुजुर्ग संपादक महोदय का जिक्र करके कह रहा हूं।

जिसे बलात्कार करना होता है वो नाबालिक रहते हुये भी बलात्कार कर देता है और यह कानून कुछ नहीं करता। मैं उस संपादक महोदय के कृत्य का बचाव नहीं कर रहा हूं। उस संपादक महोदय या मीडिया में काम करने वाले अनेक संपादकों ने किसी महिला को छूने कर उस महिला को जितना नुकसान किया है उससे हजार गुना नुकसान उन्होंने महिला प्रेम के कारण साहित्य, मीडिया और व्यापक अर्थ में देश — समाज कर दिया है। लेकिन इस पर उन महिलाओं को आपत्ति नहीं है जो उनके महिला प्रेम के कारण आज उनकी गिनती शीर्ष कथाकारों/शीर्ष साहित्यकारों/शीर्ष मीडिया​कर्मियों में होती है। अगर ऐसे संपादक की इज्जत उतारनी है तो उनसे फायदा लेने वाली महिलाओं की भी इज्जत उतारी जानी चाहिये जो न जाने कितनी प्रतिभाओं को कुचलने का माध्यम बनी।

अब मैं फिर से पहले की बात पर लौटता हूं। कोई किसी महिला की हाथ दबा देता है तो उस महिला को क्या फर्क पड़ता बजाय कुछ देर दर्द होने के। हमारा भी किसी पुरूष से हाथ मिलाने का जी नहीं करता, या कोई इतनी जोर से हाथ दबा देता है कि हाथ में देर तक दर्द करता है। क्या हम उसकी इज्जत उतार दें या उसके बारे में सोचते रहें कि उसने ऐसा कर दिया तो बड़ा भारी अपमान कर दिया। जितनी जल्दी महिलायें अपने को छुई—मुई बना कर रखेंगी उन्हें उतनी ही दिक्कत होगी। मैं यह नहीं कह रहा कि आप सब कुछ बर्दाश्त करते रहिये, लेकिन इतना संवेदनशील होना भी क्या जायज है।

एक लड़की को मैंने एक संस्थान में नौकरी पर रखवाया था, जाहिर मैं मैंनं भी महिला प्रेम के कारण ही ऐसा किया था, क्योंकि उससे अधिक प्रतिभाशाली लड़कों की कमी नहीं है। मुझे बता ​रही थी कि मैंने जिस बास के माध्यम से उसे वहां रखवाया था वही बॉस उसके साथ कभी आमने सामने बैठकर हो रही बातचीत के दौरान उस लड़की का हाथ छूने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि यह बात उसने तब तक नहीं बतायी जब तक वह वहां काम कर रही थी। जब उसका वहां से कोई पंगा हो गया और तब उसने बताया। मतलब जब सब कुछ ठीक चल रहा हो तब कोई कुछ उंच—नीच कर दें तो कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि लड़की की बात में कितनी सच्चाई है, मैं नहीं जानता। मेरी उस बॉस से करीबी है और मैं उनके महिलाओं के प्रति आकर्षण से भी वाकिफ हूं। लेकिन फिर भी वह बहुत अच्छे आदमी हैं और उनका देश और समाज के लिये एक योगदान है, उनकी पहचान है और उनका रूतबा है।

जिस संपादक का यहां जिक्र हो रहा है उनके महिला प्रेम को मैं जानता हूं। आज से नहीं 30 साल से। यह भी जानता हूं कि किस तरह से महिला कथाकारों की रचनायें उनमें प्राथमिकता से छपती है। कई रद्दी महिलायें उस
ी पत्रिका में छप कर कथाकार बनने का रूतबा हासिल कर सकी, जबकि हम जैसे लेखकों ने स्थापित कथाकार बनने की हसरत को अपने सीने में दफन कर दिया। मुझे पक्का विश्वास है कि मैं महिला होता तो मैं आज प्रथम श्रेणी के कथाकार या साहित्कार में शामिल होता, लेकिन पुरूष होने की सजा यह मिली कि उस प​त्रिका में एक भी कहानी नहीं छपी जबकि हमारी कहानियों से रद्दी कहानियां केवल इसलिये छपी क्योंकि वे महिलाओं की लिखी हुयी थी। लेकिन इसके बाद भी उनके मुझे मलाल नहीं है, क्योंकि यह पुरूषों की कमजोरी है जो स्वभाविक है। मैं भी वहां होता तो शायद वही करता। प्रेमचंद ने वर्षों पहले रसिक संपादक नाम से कहानी लिखी थी।

हालांकि ऐसे संपादकों की भरमार हो गयी है, लेकिन हर पुरूष जब तक वह संपादक नहीं बन जाता वह भी ऐसे संपादकों को गलियाता रहता है। कई पुरूष ऐसे संपादकों के बहाने पूरी पुरूष जाति को गलियाने में आपनी शान समझते हैं, लेकिन यह पाखंड के अलावा कुछ और नहीं है। चाहे पुरूष अमरीका का राष्ट्रपति बन जाये या कुछ और उसकी लालसा वहीं रहती है, यह अलग बात है कि जो सफल होते हैं उन्हें सब कुछ मिल जाता है, जो उतने सफल नहीं होते उनकी लालसा अधूरी रहती है और वे हाथ मिलाकर ही अपनी लालसा को बुझाते हैं। लेकिन यह भी सच ​है कि महिलायें ज्यादा चालाक और धूर्त होती है। जब मुंबई में था तो मैंने देखका कि किस तरह से महिला पत्रकार जान अब्राहम और सलमान खान जैसे अभिनेताओं के साथ किस तरह से चिपट कर फोटो खिचाती थी। हम पुरूष पत्रकार किसी अभिनेत्री से ज्यादा से ज्यादा हाथ मिलाने की सोच सकते हैं, अगर उनसे चिपट जायें तो उसका अंजाम क्या होगा सबको पता है लेकिन लड़कियों किसी पुरूष से चिपटती है तो वह पुरूष अपना सौभाग्य मानता है। जॉन अब्राहम ने बताया था कि किसी तरह से कुछ लड़कियां उसकी शर्ट में हाथ डालकर सहलाती है और उनकी नाखून से उनकी पीठ छिल जाती है। क्या ऐसी हिम्मत कोई सामान्य पुरूष किसी महिला के साथ ऐसा करने की हिम्मत जुटा सकता है। यह तो लड़कियों एवं औरतों का सौभाग्य है कि उनका जन्म भारत जैसे देश में हुआ है जहां यौन कुंठा इतनी अधिक है कि उन्हें बेवजह महत्व मिलता है — जबकि अगर वे पुरूष होती तो कोई उन्हें पूछता नहीं। यह जरूर है कि महिला होने के खतरे हैं, लेकिन हर सिक्के के एक पहलू होते हैं। कहने को तो हर महिला कहेंगी कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है ​जब कोई पुरूष उन्हें घूरता है, लेकिन अगर वाकई पुरूषों ने महिलाओं को घूरना बंद कर दिया तो क्या उन्हें अच्छा लगेगा। सज—संवर कर बाहर निकला क्या प्रमाणित करता है। पुरूष बाहर निकलने के पहले महिलाओं की तरह क्रीम, लिपिस्टिक आदि क्यों नहीं लगाते। वे कपड़ों के प्रति क्यों गंभीर नहीं होते। एक लड़की को देखा कि उसने किसी को फोन किया, जो उसके दूर के चाचा लगते थे। लड़की को कुछ माह मैंने पत्रकारिता के एक संस्थान में कुछ पढाया था। इस नाते वह मेरी छात्रा थी और इसकारण मुझसे मिलने आती थी। वह गजब की सुंदर थी सामने होती थी तो उसकी देखने का मन करता था। वह हमसे काफी खुली हुयी थी इसलिये मेरे सामने मेरा कोई लिहाज नहीं करती थी। यह मैं शपथ पूर्वक कह रहा हूं कि इतना होने के बाद भी मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं पकड़ा। जबकि मेरे लिये उसके साथ कुछ भी करने का मौका था। लेकिन यह मेरी महानता नहीं थी। आज हालांकि उससे संवाद खत्म है। वह इतनी सुंदर थी कि उसे कोई मेकअप की कतई जरूरत नहीं थी। एक बार जब मेरे सामने बैठी हुयी थी तब उसने अपने परिचित व्यक्ति,जिन्हें उसने अंकल कहा था और उस उसके पिता की उम्र के थे। उनसे उसे कोई कागज लेने या देने के सिलसिले में मिलना था। उनसे मिलने के लिये जाने से पूर्व मेरे सामने ही उसने पर्स से मिरर निकाला और लिपस्टिक लगाया। चेहरे पर कोई क्रीम लगाया और बालों को सेट किया। क्या
यह अपने को दिखाने की लालसा नहीं है। कुछ पुरूष भी ऐसा करते हैं, खास कर जब उन्हें महिला से मिलना होता है, लेकिन यह हर पुरूष के साथ और हर समय नहीं होता। लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा हमेशा होता है। यह नैसर्गिक ललक है — महिलाओं को सुदंर दिखने की कोशिश करना और पुरूषों को महिला के प्रति आसक्ति रखना। कोई इस आसक्ति को गलत तरीके से जाहिर करता है कोई मर्यादित ​तरीके से और कोई इतने भाग्यवान होते हैं कि उन्हें ऐसी आसक्ति को जाहिर करने की जरूरत ही नहीं होती। लेकिन ऐसी आसक्ति रखने और ऐसी आ​सक्ति का इजहार करने वाला पुरूष लंपट हो, लुच्चा हो, नीच हो या अपराधी हो यह जरूरी नहीं। यह मेरा मानना है, आपकी राय भी यही हो यह जरूरी नहीं।

(लेखक पत्रकार हैं)

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