पत्रकारिता के अवार्डो के लिए लाइजनिंग

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-वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार-

वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार
वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार

एक अख़बार के स्थानीय संपादक अपनी अक्षमता को छिपाने और मालिको पर अपना प्रभाव जमाने के लिए अवार्डो की शानदार लाइजनिंग की है। भले ही वह जिस अख़बार में हो वहां गलत तथ्य, त्रुटियां , बेमेल ले आऊट से अख़बार की प्रतिष्ठा गिरा दे, भले ही नेताओं के आगे मोर नृत्य करके पत्रकारिता को शर्मसार कर दे, भले ही अख़बार में आए दिन बडी गल्तियां होती रही हों, लेकिन इतना तय है कि यह स्थानीय संपादक जहां भी जाता है अपने राजस्थान के कनेक्शन से कुछ लोगों को एक प्रतिष्ठित अवार्ड दिला देता है। उस अवार्ड में कई लोगों का चयन होता है। जिसमें ये अपने कुछ नाम घुसा देता है।

अवार्ड प्रतिष्ठित है । और एक सम्मानित अख़बार के संस्थापक के नाम से जुडा है। लेकिन इस स्थानीय संपादक ने शायद वहां भी मालिकों को गुमराह कर निचले स्तर पर सेंध लगाई हुई है। मुख्यत यह स्थानीय संपादक कोई पत्रकार नहीं एक लाइजनर ही है। देहरादून के इस अखबार में आपने इनकी लिखी कोई खबर विश्लेषण टिप्पणी साक्षात्कार कभी नहीं पढा होगा। लेकिन नेताओ के आगे लाइजनिंग करने के लिए लोटन कबूतर बनने में इनका कोई जवाब नहीं। विशेषता यह है कि अपनी इसी लाइजनिंग के बल पर ये सब ऐडिटर से सीधे स्थानीय संपादक बने हैं। बीच के कामकाज और अनुभव से इनका कोई मतलब नहीं रहा। बस ये अपने मतलब के काम करतेजाते हैं।

शायद इसका उस अवार्ड में कोटा तय है। पिछले बार जब यह स्थानीय संपादक कानपुर में था तो वही इसकी पंसद के लोगों का चयन हुआ। इस बार यह देहरादून में है तो अवार्ड देहरादून तक पहुंच गए। देहरादून अगली बार ये कहीं और शहर में होगा तो उस शहर से कुछ नाम निकल कर आ जाएंगे।

हमारा संस्थान के मालिको से निवेदन है कि वो इसकी जरूर छानबीन करे कि प्रतिष्ठित पुरस्कार अवार्ड में इस तरह की दखल किस रूप में है। यह भी संज्ञान में लें कि किस तरह सूची से उस पत्रकार का नाम छोडा गया जिसने खबरों की खास एडिटिंग की थी। और कैसे एक नाम वो शामिल किया गया जो इस स्थानीय संपादक के साथ कानपुर से देहरादून चला आया।

क्या वास्तव में उसका इतना बड़ा योगदान है कि अंतराष्ट्रीय पुरस्कार केवल पेज बनाने के नाम पर दे दिया जाए। क्या वास्तव में इस खबर के साथ ऐसे अद्भुत पन्ने बने है जिसे उत्तराखंड के अखबारों में न कभी देखा गया न सुना गया। अंतरा्ष्टीय स्तर पर जिन पन्ने को पुरस्कार दिया गया क्या उसकी कुछ विशिष्टताओ को बताया जा सकता है।

वैसे जिन्हें पुरस्कार या अवार्ड मिला उन्हें बधाई दी जानी चाहिए। उनका काम अपनी जगह । पर क्या कानपुर और उत्तराखंड में इससे पहले कोई पत्रकारिता ही नहीं हुई। या इससे पहले पत्रकार ही नहीं हुए। अचानक इस स्थानीय संपादक के आते ही यह अवार्ड कनेक्शन कैसे जागा।

अजब यह भी कि इनकी सूची में वो नाम नहीं जो संबंधित खबरों को मुख्य एडिटिंग करते थे। क्योंकि वो अख़बार छोड चुके। और इनकी लाबी के नहीं। ये अपने साथ जिसे कानपुर से लाए उसका नाम इस सूची में घुसा कर उसे और पत्रकारिता को धन्य कर दिया। क्या देहरादून के अखबारों में पेज नहीं बने। यह स्थानीय संपादक जब किसी और जगह जाएगा तो ये बंदा साथ में वहां भी जाएगा । फिर देहरादून में आकर अवार्ड का गोता इसके लिए लगना ही था। हम यहां उन साथियों के काम को कम नहीं आंक रहे स बल्कि खुले मन से बधाई देते हैं। लेकिन अवार्डों के खेल के साथ किस तरह मीडिया के मालिक, समाज गुमराह होते हैं। उसे भी सामने आना बहुत जरूरी है।

शातिर चाल चलने वालों को बनकाब करना जरूरी है। अगर अपने ही शहर में हम यह न कर पाए तो पत्रकार किस बात के । पत्रकारों को सार्थक काम पर अवार्ड मिले तो प्रसन्नता होती है। सुशील बहुगुणा को जब प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला था तो अच्छा लगा । उन्हॆोने केदारनाथ आपदा में एनडीटीवी में अच्छी बहस चलाई और ग्लेशियर पर्यावरण पर उनका बेहतर काम है। अवार्ड के लिए जुगत लाइजनिंग पेंतरेबाजी हो तो सही काम की चमक भी धुंधली हो जाती है। कोई भी सम्मान सही रूप में सही हाथों में आना चाहिए। और उसकी सही पहल होनी चाहिए।

अगली कहानी – यह घटना केदारनाथ आपदा से जुडी है। एक अख़बार ने अपने उन पत्रकारों और फोटोग्राफरों को सम्मानित करने और दस दस हजार रुपए देने की घोषणा की जिन्होंने केदारनाथ आपदा के दौरान उत्कृष्ट काम किया था। लेकिन बहुत अफसोस के साथ कहना पड रहा है कि मालिक को जो सूची भेजी गई थी उसमें तीन चार नाम फर्जी थे। वे लोग मुश्किल हालातों में उन इलाकों में नहीं गए थे। उन्हें पुरस्कृत करना था इसलिए पेज बनाने और दूसरे बहाने से उन्हें सम्मानित कराया गया। केदारनाथ आपदा में जब स्टेट ब्यूरो में काम करने वाले बाहरी पत्रकारों ने मंदाकिनी घाटी जाने से साफ इंकार कर दिया था वहीं दिल्ली और दूसरी जगह में रहने वाले स्थानीय पत्रकारो ने खुद वहाँ जाने की इच्छा जताई। वे उन इलाकों में 45 दिन तक जिंदगी और मौत से लडते रहे। उन्होंने विकट परिस्थितियों में खबरें लिखी। चित्र भेजे। लोगों से संवाद किया। कई दिन भूखे भी रहे। लेकिन पत्रकारिता में उजाले की जगह ऐसा अँधेरा फैलाया गया कि उन दो पत्रकारों के नाम को ही छोड़ दिया गया।

उन्होंने पत्र लिखकर मालिक से सीधे इस गडबडझाले की शिकायत की। अख़बार के मालिक का बड़प्पन था कि उन्हें बुलाकर स्वीकारा कि वे वास्तव में सम्मान पाने के पहले हकदार थे। कोई पत्रकार अवार्ड या सम्मान के आपदा क्षेत्र में नहीं जाता। उस क्षेत्र का दर्द उसे खींच लाता है। लेकिन उसे पता लगे कि उसके काम को नजरअंदाज कर कोई लंपटग्री कर रहा है तो उस पत्रकार का दायित्व है कि पूरी बात मालिक के सामने उठाए। पत्रकारों ने अच्छा कदम उठाया, अपनी बात खुल कर सामने रखी।
जय उत्तराखंड जय भारत

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