राष्ट्रीय सुरक्षा की बढ़ती चुनौतियां और भारतीय मीडिया की जिम्मेदारी

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मोदी 'zee' के 'सुदर्शन' व्यक्तित्व के प्रभाव से 'आजतक' पूरा 'India' निकल ही नहीं पा रहा
मोदी 'zee' के 'सुदर्शन' व्यक्तित्व के प्रभाव से 'आजतक' पूरा 'India' निकल ही नहीं पा रहा

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी
संजय द्विवेदी

देश की असुरक्षित सीमाओं और साथ-साथ देश के भीतर पल रहे असंतोष के मद्देनजर राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल इन दिनों बहुत महत्वपूर्ण हो गया। आतंकवाद और माओवाद के मानवता विरोधी आचरण से टकराता राज्य अकेला इन सवालों से जूझ नहीं सकता। यह युद्ध समाज, मीडिया और आमजन की एकजुटता के बिना जीतना असंभव सा है। ऐसे में एकता, जागरूकता और राष्ट्रीयता के भाव ही हमें बचा सकते हैं। हमारे देश का युवा संवेदनशील है, किंतु देश के ज्वलंत सवालों पर न तो उसकी समझ है न ही उसे प्रशिक्षित करने के यत्न हो रहे हैं। युवा शक्ति को बांटने और लड़ाने के लिए भाषा, जाति, क्षेत्र, समुदाय के सवाल जरूर खड़े किए जा रहे हैं। राष्ट्रीयता को जगाने और बढ़ाने का हमारे पास कोई उपक्रम नहीं है। शिक्षण संस्थान और परिवार दोनों इस सवाल पर उदासीन हैं। वे कैरियर और सफलता के आगे कोई राह दिखाने में विफल हैं, जिनसे अंततः असंतोष ही पनपता है और अवसाद बढ़ता है।

कठिन है यह युद्धः दुनिया के पैमाने पर युद्ध की शक्लें अब बदल गयी हैं। यह साइबर वारफेयर का भी समय है। जहां आपके लोगों का दिलोदिमाग बदलकर आपके खिलाफ ही इस्तेमाल किया जा सकता है। पूर्व के परंपरागत युद्धों में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से संघर्ष करता था। यह संघर्ष शारीरिक और बाद में हथियारों से होने लगा। विकास के साथ दूर तक और ज्यादा नुकसान पैदा करने वाले हथियार और विनाशकारी संसाधन बने। आधुनिक समय में सूचना भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल हो रही है। सूचना भी एक शक्ति है और हथियार भी। ऐसे में ‘कोलोजियम आफ माइंड्स’ (वैचारिक साम्राज्यवाद) का समय आ पहुंचा है। जहां लोगों के दिमागों पर कब्जा कर उनसे वह सारे काम करवाए जा सकते हैं जिससे उनके देश, समाज या राष्ट्र का नुकसान है। अपने ही देश में देश के खिलाफ नारे, देशतोड़क गतिविधियों में सहभाग, हिंदुस्तानी युवाओं का आईएस जैसे खतरनाक संगठन के आकर्षण में आना और वहां युद्ध के लिए चले जाना, भारत में रहकर दूसरे देशों के पक्ष बौद्धिक वातावरण बनाना, अन्य देशों के लिए लाबिंग इसके ही उदाहरण हैं। लार्ड मैकाले जो करना चाहते थे, नई तकनीकों ने उन्हें और संभव बनाया है। कश्मीर में आतंक बुरहान वानी की मौत के बाद साइबर मीडिया में जो माहौल बना वह बताता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इस युद्ध के लड़ाके और आंदोलनकारी दोनों साइबर स्पेस पर तलाशे जा रहे हैं। एक ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें राज्य की हिंसा तो हिंसा ही है अपितु अलगाववादी समूहों की हिंसा भी जायज बन जाती है। ऐसे कठिन समय में हमें ज्यादा चैतन्य होकर अपनी रणनीति को अंजाम देना होगा।

अपने पड़ोसियों से हमारा एक लंबा छद्म युद्ध चल रहा है। चीन और पाकिस्तान ने अपने-अपने तरीकों से हमें परेशान कर रखा है। यह एक छद्म युद्ध भी है। इससे जीतने की तैयारी चाहिए। जैसे बंगलादेश में हमने एक जंग जीती किंतु नेपाल में हम वह नहीं कर पाए। आज नेपाल की एक बड़ी आबादी और राजनीति में भारतविरोधी भाव हैं। पाकिस्तान जो कश्मीर में कर पाया, वह हम पीओके, बलूचिस्तान या गिलगित में नहीं कर पाए। आजादी के सत्तर साल बाद कोई प्रधानमंत्री बलूचिस्तान के मुद्दे पर कुछ कह पाया? कश्मीर की आजादी के दीवानों ने न तो बलूचिस्तान देखा है, न पीओके और न ही गिलगित। चीन अपने विद्रोहियों से कैसे निपट रहा है, वह भी उनकी जानकारी में नहीं है। भारत को मानवाधिकारों का पाठ पढ़ा रहे देश खुद अपने देश में आम जन के साथ क्या आचरण कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

भारतीय मीडिया की जिम्मेदारीः भारतीय मीडिया को भी इस साइबर वारफेयर में जिम्मेदार भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर ईराक,अफगान युद्ध में पश्चिमी मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हुए यह जानना जरूरी है कैसे मीडिया ने सत्य के साथ छेड़छाड़ की तथा वही दिखाया और बताया जो ताकतवर देश चाहते थे। ऐसे कठिन समय में भारतीय मीडिया को भारतीय पक्ष का विचार करना चाहिए। मीडिया लोगों का मत और मन बनाता है। अभिव्यक्ति की आजादी की संविधान प्रदत्त सीमा से आगे जाकर हमें प्रोपेगेंडा से बचना होगा। वस्तुनिष्ठ होकर स्थितियों का विश्वलेषण करना होगा। अफवाहों, मिथ और धारणाओं से परे हमें सत्य के अनुसंधान की ओर बढ़ना होगा। इस साइबर वारफेयर, साइको वारफेयर के वैश्विक युद्ध में सच्चाईयों को उजागर करने के यत्न करने होंगे। देश की भूमि पर वैचारिक आजादी की मांग करने वाले योद्धा तमाम सवालों पर चयनित दृष्टिकोण अपनाते हैं। एक मुद्दे पर उनकी राय कुछ होती है, उसी के समानांतर दूसरे मुद्दे पर उनकी राय अलग होती है। यह द्वंद राजनीतिक लाभ उठाने और पोजिशिनिंग के नाते होता है। मीडिया को ऐसे ‘खल बौद्धिकों’ के असली चेहरों को उजागर करना चाहिए। कश्मीर में ‘ई-प्रोटेस्ट’ के जो प्रयोग हुए वे बताते हैं कि आज के समय में लोगों को गुमराह करना ज्यादा आसान है। सूचना की शक्ति और उसकी बहुलता ने आज एक नयी दुनिया रच ली है,जिसे पुराने हथियारों से नहीं निपटा जा सकता। 2002 में मिस्र के हुस्नी मुबारक ने अलजजीरा से तंग होकर कहा था कि “सारे फसाद की जड़ यह ईडियट बाक्स है।” तबसे आज काफी पानी गुजरा चुका है। न्यू मीडिया अपने नए-नए रूप धरकर एक बड़ी चुनौती बन चुका है। जहां टीवी से बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। सिटीजन जर्नलिज्म की अवधारणा भी एक नए अवसर और संकट दोनों को जन्म दे रही है। यह पारंपरिक मीडिया को एक चुनौती भी है और मौका भी। आप देखें तो नए मीडिया की शक्ति किस तरह सामने है कि ओसामा बिन लादेन की मौत और अमरीकी राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रेस के बीच दो घंटे 45 मिनट में 2.79 करोड़ ट्विट हो चुके थे। यह अकेला उदाहरण बताता है कि कैसा नया मीडिया इस नए समय में अपनी समूची शक्ति के साथ एक बड़े समाज को अपने साथ ले चुका है। सही मायने में भारतीय मीडिया को इस वक्त अपनी भूमिका पहचानने और आगे बढ़ने का समय आ गया है। वैचारिक साम्राज्यवाद और सूचना के साम्राज्यवाद के खिलाफ हमने आज जंग तेज न की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

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