क्या ABP न्यूज के 7RCR में चेतन भगत की बजाए हिंदी का कोई लेखक नहीं हो सकता था?

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अभिरंजन कुमार

अगर हिन्दी चैनल बेचना चाहें, तो हिन्दी के लेखक नहीं बिकेंगे?

CHETAN BHAGAT 7RCRयूं तो Ajit Anjum मेरे “बड़े भाई” हैं, लेकिन यह उनकी पहचान नहीं है। उनकी पहचान यह है कि वे “बड़े आदमी” और “बड़े पत्रकार” हैं। न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर हैं।

संदर्भ यह है कि मैं कुछ दूसरे कामों में व्यस्त था और टीवी पर ABP News लगाकर छोड़ रखा था। मैंने देखा कि चैनल पर पिछले एक-डेढ़ घंटे में कम से कम 8-10 बार बतौर “हेडलाइन” और “टीज़र” यह विज्ञापन चल चुका था कि आज रात दस बजे मशहूर लेखक चेतन भगत के साथ देखिए “7 RCR”. चेतन भगत ख़ुद भी अमूमन हर ब्रेक में आकर अपना विज्ञापन कर रहे हैं कि मेरे साथ देखिए हर शनिवार “7 RCR”.

ABP ने चेतन भगत को उतना स्पेस दे रखा है, जितना शायद हिन्दी के किसी लेखक को आज तक नहीं दिया। ABP के बहुत सारे पत्रकार मेरे परिचित हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं, लेकिन मेरे मन में एक सवाल उठा तो मैंने फेसबुक पर इन शब्दों में रख दिया-

“हिन्दी के चैनलों पर भी अंग्रेज़ी के लेखक ही बेचे जाएंगे? यूं तो यह सवाल हिन्दी के सभी समाचार चैनलों से है, लेकिन आज इसका जवाब क्या ABP News के हमारे साथी देंगे?”

इसका जवाब पोस्ट लिखने तक ABP से तो नहीं आया, लेकिन अजीत अंजुम जी (News 24) से आया और एक छोटी बहस शुरू हो गई। कुछ अन्य मित्र भी बाद में चर्चा में कूद गए। चूंकि यह बहस सार्वजनिक मंच पर चल रही थी, इसलिए इसे आप सब लोगों के बीच रख रहा हूं, ताकि आप सब अपने-अपने विचार इसपर रख सकें।

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Ajit Anjum ज़बरदस्ती का मुद्दा बना पहले हैं आप
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Abhiranjan Kumar Ajit जी, मुद्दा नहीं बना रहा हूं, बस एक सवाल पूछ रहा हूँ। अगर संतुष्ट कर सकेंगे तो मेहरबानी होगी। आख़िर आप ही लोगों के बीच का आदमी हूं। आप ही का एक छोटा भाई हूं।
लगभग एक घंटा पहले · पसंद

Ajit Anjum जो बिकता है वो दिखता है
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Abhiranjan Kumar हिन्दी का चैनल बिकता है और हिन्दी के लेखक नहीं बिकते हैं? यह क्या कह रहे हैं आप अजीत जी? यह आपकी व्यक्तिगत राय है या फिर NEWS 24, जिसके आप मैनेजिंग एडिटर हैं, उसकी पॉलिसी है?
लगभग एक घंटा पहले · पसंद

Ajit Anjum फ़ेसबुक पर मैं चैनल की पॉलिसी नहीं बघारने आया हूँ . दुर्भाग्य से हिन्दी के लेखक कितने बिकते हैं , ये आप जानते होंगे
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Abhiranjan Kumar हा हा हा… ये तो सवाल का जवाब नहीं हुआ Ajit जी। मैं ये जानता हूं कि बेचने से जब कूड़ा-करकट-गुंडे-मवाली सब इस देश में बिक रहे हैं, तो हिन्दी के लेखक क्यों नहीं बिकेंगे? हिन्दी का साहित्य क्यों नहीं बिकेगा? पहले हम अपनी सोच तो बदलें।
लगभग एक घंटा पहले · पसंद · 1

Ajit Anjum चलिए इस पर हम मातम मना सकते हैं लेकिन जो सच है सो है
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Ajit Anjum बड़े बड़े लेखक दो हज़ार बिक जाएँ तो जश्न और बेस्ट सेलरी मान लिए जाते हैं .यही दुर्भाग्य हो तो क्या करें
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 2

Ajit Anjum बेस्ट सेलर पढ़ें
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Abhiranjan Kumar तो अजीत जी, आपके हिसाब से सच है कि हिन्दी में चेतन भगत के स्तर का या उनसे बेहतर कोई लेखक मौजूद नहीं है? क्या आपके इस सच से Geeta Shree (मेरी भाभी) भी सहमत हैं?
लगभग एक घंटा पहले · पसंद · 1

Ajit Anjum मैंने न तो ये कहा न ही इतना मूर्ख हूँ . हिन्दी में एक से एक लेखक हैं लेकिन अंग्रेज़ीयत में लेखक सेलिब्रिटी हो जाते हैं .
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 2

Abhiranjan Kumar अरे सर, आप बेस्ट सेलर के चक्कर में क्यों पड़े हैं? क्या आपको यह नहीं मालूम कि प्रतिदन हम मीडियाकर्मी और चैनल वाले ढेर सारा कूड़ा-करकट भी बेच ले रहे हैं, फिर हिन्दी का साहित्य और हिन्दी का लेखक बेचने की कोशिश क्यों नहीं करते? सोच तो बदलिए, पहल तो करिए। मेरा सिर्फ़ इतना कहना है। न मैं मुद्दा बना रहा हूं, न मातम मना रहा हूं।
लगभग एक घंटा पहले · पसंद · 2

Ajit Anjum मैं सच बता रहा हूँ बंधु अपनी सोच नहीं ़. आप तो मुझे ऐसे समझा रहे हैं जैसे आप हिन्दी के समर्थक और मैं विरोधी , मैं तो खाँटी हिन्दी वाला हूँ
लगभग एक घंटा पहले · नापसंद · 1

Abhiranjan Kumar बड़े भाई, मैं भी यही कह रहा हूं कि जो आप कह रहे हैं, वो सच नहीं, सोच का मामला है। घिसी-पिटी लीक पर जर्नलिज्म कब तक? अब तो समाज और सियासत में भी घिसी-पिटी चीज़ें नहीं चल रहीं। घिसी-पिटी सोच और फ़र्ज़ी सच अगर चल रहा होता, तो आज केजरीवाल इतने बड़े हीरो नहीं हो गए होते।
लगभग एक घंटा पहले · पसंद · 1

Pawan Kumar जब हिन्दी के एंकर सेलिब्रेटी बन सकते है तो इसके लेखक क्यो नही ..हिन्दी चैनल शायद ही हिन्दी लेखक को वो स्पेस देते है..
59 मिनट पहले · नापसंद · 1

Shriniwas Oli अभिरंजन जी, हिंदी चैनलों के कई बड़े अधिकारी (संपादकीय व प्रबंधन, दोनों) अक्सर हिंदी में हो रही बातचीत को “ज्यादा मजबूती” देने के लिए अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं। Ajit Anjum सर ने बिल्कुल ठीक कहा कि जो बिकता है वो दिखता है। लेकिन अंग्रेजी की “उजली चादर” को हिंदी की “बंजर जमीन” पर बिछाकर बेचने की मजबूरी भी कुछ इशारे तो करती ही है। चर्चा में अनधिकृत रूप से कूद पड़ने के लिए माफी के साथ…
54 मिनट पहले · संपादित · पसंद

Abhiranjan Kumar Ajit जी, देश में चीज़ें बदल रही हैं। हिन्दी भाषा, साहित्य और उसके लेखकों के मामले में भी सोच बदलिए। आज आप उन्हें बेचना शुरू कर देंगे, तो कल वे अंग्रेज़ी लेखकों से ज़्यादा बिकाऊ लगेंगे आपको। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूं कि अगर हिन्दी के चैनल अंग्रेज़ी चैनलों से ज्यादा देखे जा सकते हैं और अगर हिन्दी के अखबार अंग्रेजी के अखबारों से ज्यादा बिक सकते हैं, तो हिन्दी की किताबें भी भारत की सरहद के अंदर अंग्रेज़ी की किताबों से ज़्यादा बिक सकती हैं और हिन्दी के लेखक भी अंग्रेज़ी के लेखकों से ज़्यादा बिक सकते हैं।
58 मिनट पहले · पसंद · 1

Abhiranjan Kumar Ajit जी, सच्चाई यह भी है कि हम ज़्यादातर हिन्दी के पत्रकार अपने ही बीच के लोगों (लेखकों) से ईर्ष्या करते हैं, उन्हें आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते। हमारा कोई अपना भाई चेतन भगत के पैरेलल खड़ा हो जाए या उनसे आगे निकल जाए, यह ख़ुद हमीं नहीं पचा पाएंगे। हम हिन्दी के आला मीडियाकर्मी ईर्ष्यालु और संकीर्ण सोच वाले लोग हैं। सॉरी।
53 मिनट पहले · पसंद · 2

Abhiranjan Kumar Ajit Anjum जी, अगर आप खांटी हिन्दी वाले हैं, तो फिर आपकी सोच और मेरी सोच…. आपके सच और मेरे सच में यह उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव जैसा फ़र्क़ क्यों है?
44 मिनट पहले · पसंद

Rajeev Ranjan Jha सोचा तो मैंने भी कि इस बीच बहस में कुछ लिखूँ। फिर हिचक गया कि पता नहीं अजीत जी इसे अनधिकार प्रवेश मान लें। पहले उनकी मित्र सूची में था, आजकल नहीं हूँ…
43 मिनट पहले · नापसंद · 1

Pawan Kumar सच्चाई तो यह है की हिन्दी चैनलो ने कभी इस दिशा मेँ छोटा सा प्रयास भी नही किया ..2000 वाली बेस्टसेलर की कहावत अब बहुत घिसी पिटी पुरानी ठाकुर वाली फिल्म की संवाद की तरह लगता है..क्या किसी नये बदलाव की थोड़ा सा भी जोखिम नही लिया जा सकता..
31 मिनट पहले · नापसंद · 1

Ravindra Kumar Jo ham bechte hai,Wahi bikta hai….
2 मिनट पहले · नापसंद · 1

Nalin Chauhan हिंदी के समाचार चैनल मीडिया की मंडी में अपना एक नया ‘शब्दकोश’ ही गढ़ने में लगे है । यह प्रवृति अंग्रेजी चैनलों के बरगद के नीचे उगने वाले हिंदी के बोन्साई समाचार चैनलों में ज्यादा नज़र आती है जहाँ हिंदी समाचार पत्रिकाओं और चैनलों के नाम भी अंग्रेजी में होते है तो फिर उनसे ‘भाखा’ कि उम्मीद रखना मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं।

(स्रोत-एफबी)

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