अरुण जेटली जी प्लीज FTII को आप अपनी पार्टी का दफ्तर मत बनाइये

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अरुण जेटली के नाम फिल्मकार पवन कु. श्रीवास्तव की खुली चिठ्ठी

आदरणीय अरुण जेटली जी ,

इस उम्मीद से ये ख़त लिख रहा हूँ कि सोशल मीडिया से गुजरते हुए ये ख़त शायद कभी आपतक भी पहुँच जाए और ये ख़त मेरे विरोध की आवाज भी हैं जो खामोश नहीं रहना चाहता .

अभी कुछ दिन पहले आपके मंत्रालय द्वारा गजेन्द्र चौहान जी को भारतीय फिल्म प्रशिक्षण संस्थान का चेयरमैन नियुक्त किया गया हैं . गजेन्द्र चौहान को हम सब जानते हैं हमने उन्हें टीवी और फिल्मों में देखा हैं और वो एक अच्छे कलाकार भी हैं लेकिन फिर भी मुझे ये कतई नहीं लगता कि उनमे इस संस्थान के चेयरमैन बनने की योग्यता हैं . सिनेमा में काम करना और सिनेमा की समझ होना, उसे एक दिशा देना दोनों एक दूसरे से बहुत अलग हैं .

सिनेमा एक ऐसा माध्यम हैं जो जनचेतना को बहुत प्रभावित करता हैं, हमारा देश सिनेमा से बहुत कुछ सीखता हैं इसका प्रभाव बहुत व्यापक हैं . ऐसे में सिनेमा के इस प्रतिष्ठित संस्थान से निकलने वाले छात्रों की सोच को व्यापक और सिनेमा को लेकर उनकी समझ को विकसित करने के लिए हमे ऐसे लोगों की ज़रूरत हैं जो सिनेमा के माध्यम को न सिर्फ समझते हों बल्कि इस माध्यम के लिए उनके अन्दर एक परिकल्पना भी हो जो इसे और व्यापक और सार्थक बना सके .

हम जिस दौर में जी रहे हैं इसमें सिनेमा और भी महत्वपूर्ण हो जाता हैं इसलिए ये हम सबकी ये जिम्मेदारी हैं कि हम सिनेमा के इस कला में कुछ योगदान कर सकें . ये संस्थान आपके मंत्रालय के अंतर्गत आता हैं इसलिए आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती हैं . लेकिन मुझे नहीं लगता हैं कि आपने इसे गंभीरता से लिया हैं वर्ना आपने गजेन्द्र चौहान जी को इस संस्थान का चेयरमैन कभी नियुक्त नहीं किया होता .

हमारे देश में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनकी ज़रूरत इस संस्थान को हैं और अगर आप इस संस्थान के इतिहास को पलट कर देखें तो पता चल जाएगा कि इस संस्थान के चेयरमैन में क्या योग्यता और कैसी समझ होनी चाहिए आपको चाहिए था कि आप इस परम्परा को और आगे बढाते लेकिन आपने ऐसा निर्णय लेकर इस संस्थान की सोच को संकुचित करने का काम किया हैं .

एक फिल्म संस्थान में किसी भी खास तरह के विचारधारा को थोपना उस संस्थान के साथ अन्याय हैं उसके मकसद के साथ खिलवाड़ हैं . किसी भी शिक्षण संस्थान की सोच व्यापक होनी चाहिए, क्यूंकि वहां छात्र सिखने के साथ-साथ अपने विचारों का निर्माण भी करते हैं .

आप इसे व्यापक बनाने की बजाये अपनी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रयोगशाला बना रहे हैं जो बहुत खतरनाक हैं . आपके लिए आपकी पार्टी की विचारधार सही हो सकती हैं लेकिन आपको कोई हक नहीं हैं कि आप उसे इस संस्थान के छात्रों पे भी थोपे . गजेन्द्र चौहान और उनके साथ हुई चार और नई नियुक्तियों को देखकर यही लगता हैं कि आपने इस संस्थान को अपनी पार्टी का दफ्तर समझ लिया हैं या उसे दफ्तर बना देना चाहते हैं . ये सबलोग आपकी पार्टी से जुड़े रहे हैं . उनका चयन करते समय आपके दिमाग में केवल सिनेमा होना चाहिए था लेकिन अफसोस, मुझे लगता हैं कि इनका चयन करते समय सिनेमा को छोड़कर बाकी सबकुछ दिमाग में रखा गया हैं .

किसी भी सरकारी संस्थान पर पूरे समाज का अधिकार होता हैं. इस स्पेस पर पूरे जनमानस का अधिकार होता हैं और आप इसपर अपनी विचारधारा थोप कर पूरे जनमानस के साथ अन्याय कर रहे हैं . आपने ये जरुर देखा होगा कि कैसे पूरे देश भर से सिनेमा और गैरसिनेमाई लोगों ने इसका विरोध किया हैं . ये महज एक विरोध नहीं हैं ये एक सवाल हैं जो आपके चयन पर उठाया गया हैं . मुझे पूरी उम्मीद हैं कि आप इस सवाल को गंभीरता से लेंगे और विचार करेंगे . आपके पास मंत्री रहते हुए भारतीय सिनेमा के विकास में कुछ योगदान करने का एक अवसर हैं. कृपया इस अवसर का सदुपयोग कीजिए .

आपका –
पवन कु. श्रीवास्तव
स्वतंत्र फिल्म निर्माता

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