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नजमा हेपतुल्लाह से माजिद मेनन तक एंकर कादम्बिनी शर्मा से खफा !

ndtv india एक घंटे का प्रोग्राम हो. एंकर मिलाकर कुल आठ लोग बोलने वाले हो. बोलने वालों में नेता, वकील और अध्यापक भी हो तो सबको बोलने के लिए वाजिब समय मिले, ये जरूरी नहीं.

ऐसे में यदि एंकर रवीश जैसा जब्बर किस्म का न हो तो दो नेता ही आपस में बतकही कर स्क्रीन की बहस को संसद के हंगामे में तब्दील करके पूरा समय खपा देते हैं और पैनल के दूसरे लोग स्क्रीन पर बस मूर्तिवत बैठे रह जाते हैं.

ऐसे में खीजना स्वाभाविक है. शनिवार को एनडीटीवी पर प्रसारित ‘प्राइम टाइम’ में ऐसा ही हुआ जब नजमा हेपतुल्लाह और मशहूर वकील माजिद मेनन खीज गए और लाइव के दौरान ही एंकर कादम्बिनी शर्मा से अपनी नाराजगी जता दी.

एनडीटीवी हिन्दुस्तान का चैनल है या पाकिस्तान का ?

ndtv india

कल एनडीटीवी-इंडिया पर एक बहस में भाजपा के मुख़्तार अब्बास नक़वी आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर डॉ अपूर्वानंद के विचार सुनकर इतने भड़के कि अपूर्वानंद के विचारों को पाकिस्तानी एजेंसी आइएसआइ का और आतंकवादियों तक का बता डाला।

उन्होंने कहा, प्रोफेसर देशद्रोहियों के प्रश्रय की बात कर रहे हैं। “ये हिन्दुस्तान का चैनल है या पाकिस्तान का” कहकर वे बीच बहस उठकर जाने भी लगे, जैसे एक बार करण थापर के कार्यक्रम से नरेन्द्र मोदी उठ गए थे।

अपूर्वानंद ने बहुत सहज स्वर में यह कहा था कि अफजल को न्याय नहीं मिला, नए तथ्यों की रोशनी में उसकी अपील फिर सुनी जानी चाहिए थी।

हिंदी के पत्रकार अंग्रेजी के ‘BUT’ पर फ़िदा

हिंदी के पत्रकार, एंकर और चैनल संपादक आदि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं लेकिन कई बार ये प्रयोग गैरजरूरी होता है. इसी विषय पर वरिष्ठ पत्रकार ‘राहुल देव’ टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर लिखते हैं –

किस किस को कहें…हिन्दी के कई पत्रकार, एंकर, चैनल संपादक धड़ाधड़, एंकरिंग करते हुए बट बोलते हैं पर, किन्तु, लेकिन के लिए।

उन्हें पता ही नहीं चलता वह हिंग्लिश के इतने आदी हो गए हैं कि कब हिन्दी के घोर परिचित और आम शब्द उनकी ज़ुबान से बाहर हो गए और अंग्रेजी के शब्द ही नहीं पूरे के पूरे वाक्यांश और अभिव्यक्तियां आकर बैठ गई हैं।

आप भी ध्यान से सुनिए – गिनिए कितने हिन्दी वाले बट बोल रहे हैं। मुझे तो लगता है कम से कम दिल्ली में तो लगभग 80 प्रतिशत।

चैनलों के लिए निर्मल बाबा समाजसुधारक और आशीष नंदी समाजविरोधी !

गंभीर विषयों पर सस्ता उपन्यास रचते समाचार चैनल

ashish nandi and news channels

आशीष नंदी के ‘विचारों का गणतंत्र’ पर अपनी बात रखने के बाद शुरू हुए प्रतिबंध के पखवाड़े में मीडिया का उत्साह देखने लायक था। उन्होंने भ्रष्टाचार और जातिगत अवधारणाओं को लेकर जो कुछ कहा, आनन-फानन में वह ‘बयान’ हो गया और उसे देश के दर्शक-श्रोता के सामने इस तरह पेश किया गया कि जैसे आशीष नंदी ने एक समाजशास्त्री के नाते प्रबुद्ध समाज के सामने विमर्श नहीं, बल्कि किसी चुनावी रैली को संबोधित किया है।फिर शाहरुख खान के लेख पर ऐसा ही माहौल बनाने की कोशिशें हुर्इं। उस लेख के लिए भी ‘बयान’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम्’ पर प्रतिबंध लगाए जाने की घटना तक आते-आते तो चैनलों की सक्रियता चरम पर थी।

संसद को मंदिर बनाने पर क्यों तुले हैं चैनल ?

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शब्दों के कई मतलब होते है. यह समय, परिस्थिति और उसके प्रयोग पर निर्भर करता है. ठीक उसी तरह अलग – अलग प्रतीकों का अपना – अपना महत्त्व होता है. एक प्रतीक से दूसरे प्रतीक की तुलना गैरवाजिब है. आज जब अफजल गुरु को फाँसी दे दी गयी तो समाचार चैनलों पर सुबह से ही ख़बरें चलनी शुरू हो गयी. चूँकि मामला संसद भवन पर हमले का था तो संसद का जिक्र आना लाजमी था और इसमें कोई बुराई भी नहीं. लेकिन बाद में चैनलों पर लोकतंत्र के प्रतीक के लिए ‘मंदिर’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा. मीडिया विश्लेषक ‘विनीत कुमार’ ने इसे गैरवाजिब करार देते हुए कुछ टिप्पणियाँ की हैं जिसे सवाल की शक्ल में हम यहाँ पेश कर रहे हैं :

संसद को लोकतंत्र का मंदिर क्यों ?

चैनलों ने दिनभर संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा, जी हां मंदिर. मस्जिद नहीं, न ही गिरिजाघर और प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए गुरुद्वारा. क्या संसद के लिए मंदिर का प्रयोग सही है. मेरे ख्याल से लोकतंत्र की जमीन इसी तरह के रुपक से कमजोर होती है. आखिर हमारे मीडियाकर्मी धार्मिक शब्दों के प्रयोग से अलग क्यों नहीं सोच पाते, उनकी परवरिश क्या इस तरह से हुई है कि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, सब हिन्दुओं का है ?

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