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रवीश को भी पुण्य प्रसून की बीमारी लगी !

प्रीति के कजरारे मजबूरी में ही किया होगा रवीश ने

बतकही : पिछले साल टेलीविजन की भाषा पर एक किताब आयी थी. किताब के लेखक ने शुरूआती लाइनों में ही टेलीविजन की शब्द सीमा 1000 -1500 शब्दों तक में बाँध दी.

उन्होंने लिखा कि यदि आप इतने शब्द जान गए तो समझ लीजिए कि हिंदी के अच्छे टेलीविजन पत्रकार बन गए. हालाँकि ये बेहद विवादास्पद लाइनें हैं. लेकिन कई बार ये लगता है कि शायद सच भी है.

ऐसा हिंदी चैनलों के दिग्गज पत्रकारों के कारण लगता है. वजह इनका एक ही शब्द को बार – बार दुहराना है. ये शब्द इनका तकिया –कलाम बन गए हैं और इनकी आदत में कुछ ऐसे शामिल हो गयी है कि 50 मिनट के कार्यक्रम में एक – डेढ़ दर्जन बार तो बोल ही देते हैं.

बिहार के अखबारों ने तो काटजू साहब की खबर को ही सेंसर कर दिया

बिहार में मीडिया पर सेंसरशिप का सबसे बड़ा नमूना और सबूत यह है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की जांच टीम की रिपोर्ट आ चुकी है, लेकिन बिहार के दो सबसे बड़े अखबारों ने, जिन्हें नीतीश कुमार की सरकार विज्ञापन के रूप में मोटा माल देती है, राज्य की इस सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण ख़बर की एक पंक्ति तक नहीं छापी।

तीसरे अखबार ने चौदहवें पेज पर इस तरह छापा, जहां किसी की निगाह भी शायद ही जाए।

अब काटजू साहब बिहार में मीडिया को सेंसरशिप से क्या मुक्त कराएंगे, यहां के अखबारों ने तो उन्हीं की ख़बर को सेंसर कर दिया।

बिहार में पत्रकारिता के इस काले दौर के लिए हम शर्मिंदा हैं और लोकतंत्र-विरोधी इस सरकार की तीव्र भर्त्सना करते हैं।

(अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से)

सरकारी चक्रव्यूह में बिहार की मीडिया

नई दिल्ली : भारतीय प्रेस परिषद के एक दल ने बिहार में नीतीश कुमार की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह विज्ञापन देने के अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए प्रेस पर सरकार के ‘अघोषित मुखपत्र’ के तौर पर काम करने के लिए दबाव बना रही है। दल ने हालात की तुलना आपातकाल से की है।

प्रेस परिषद के दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘‘बिहार में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता को सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है जैसा हमारे देश में आपातकाल के दौरान देखा गया था। कुल मिलाकर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं और उनमें से अनेक अपनी बेबसी जता रहे हैं।’’ रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘आंदोलनों और जनता की चिंताओं से जुड़ी खबरों को अखबारों में जगह नहीं मिलती।’’ दल ने कहा कि मीडिया पर इस तरह का अप्रत्यक्ष नियंत्रण संविधान के अनुच्छेद 19 91) ए का उल्लंघन है।

मीडिया के मुद्दे पर लालू का नीतिश पर कटाक्ष

पटना : प्रेस परिषद के जांच दल द्वारा बिहार में प्रेस पर अघोषित सेंसरशिप की रपट दिए जाने पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने कहा कि मीडिया पर सेंसरशिप लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उन्होंने इस पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार के लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए।

पटना में बुधवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए प्रसाद ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों की जो स्थिति सरकार द्वारा बनाई गई है, वह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उन्होंने कहा कि यहां सरकार द्वारा कैसे मजदूरों, किसानों और युवाओं की बातों को दबाया जाता रहा है, यह रिपोर्ट से साबित हो गई है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के बाद सरकार के लोग मुंह दिखाने लायक नहीं हैं।

लालू ने कहा कि वह पहले भी कहते रहे हैं कि यहां अखबारों में लोगों की आवाज को कम स्थान मिल रहा है। उन्होंने कहा कि वह पूरी रिपोर्ट मंगवा कर अध्ययन करेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के लिए यह स्थिति विस्फोटक और घातक है। वह इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएंगे। उल्लेखनीय है कि प्रेस की आजादी के हनन की शिकायतों की जांच के लिए प्रेस परिषद का तीन सदस्यीय दल पिछले दिनों बिहार आया था। दल ने यहां से लौटकर अपनी रपट प्रेस परिषद को सौंप दी है। (एजेंसी)

रेडियो प्रेजेंटर ज्यादा मजाक करेंगे तो नप जायेंगे

नई दिल्ली : सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ निजी एफएम रेडियो स्टेशनों द्वारा लोगों को अवांछित फोन कॉल करके उनकी निजता भंग करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इन आपरेटरों से ऐसे मजाक से बचने को कहा है।

मंत्रालय ने यहां जारी एक परामर्श में कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संज्ञान में यह लाया गया है कि कुछ एफएम आपरेटर लोगों को अवांछित कॉल कर रहे हैं और उनकी पूर्व जानकारी या इजाजत के बिना उनकी निजता को आक्रामक टिप्पणियों और बातचीत से भंग कर रहे हैं।

मंत्रालय ने कहा कि ऐसे मजाकिया कॉल की की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि यह अनुमति करार में उल्लेखित कार्यक्रम नियमावली या विज्ञापन नियमावली में शामिल नहीं है। (एजेंसी)

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