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अनायास ही नहीं उपजती असहिष्णुता की स्थिति

कोई सत्ताधारी पार्टी का सांसद यों ही नहीं किसी जाति या वर्ग को भरी सभा में सूअर के बच्चे कहकर अपमानित कर देता | यों ही नहीं कोई केंद्रीय मंत्री दो मासूमों की दुर्दांत मौत की तुलना किसी कुते की मौत से कर देता | यों ही नहीं कोई प्रदेश का वरिष्ठ मंत्री जिले की एक महिला आइ पी एस पुलिस कप्तान को अधिकारियों की मीटिंग में गेट आउट बोल देता |

पच्चीस नवम्बर को भारतीय जनता पार्टी के हरयाणा के कुरुक्षेत्र से सांसद राजकुमार सैनी ने सोनीपत में पिछड़े वर्ग के समर्थकों को संबोधित करते हुए जाटों का नाम लिए बिना आपतिजनक एवं असंसदीय भाषा का प्रयोग किया | बाद में अपनी कथनी में परिवर्तन करते हुए सैनी ने शूरवीर शब्द का प्रयोग कर अपनी बात की लीपा पोती करने का प्रयास किया | प्राप्त समाचार के अनुसार सांसद सैनी ने अपने पिछड़े वर्ग के समर्थकों से कहा कि भीम राव अंबेडकर ने आपका पक्ष लिया परन्तु इन [शूर—–] लोगों ने उन्हें पार्लियामेंट में नहीं जाने दिया | इस वाक्य के बाद सैनी ने अपना पैंतरा बदला और कहा कि राम मनोहर लोहिया को भी इन शूरवीरों ने पार्लियामेंट में नहीं जाने दिया | उल्लेखनीय है कि सांसद सैनी जाटों को आरक्षण देने के खिलाफ पिछड़े वर्ग के लोगों को लामबंद करने में जुटे हैं | वे समय समय पर जाट आरक्षण के खिलाफ कटु वचन बोलते रहते हैं |
हरयाणा के ही दिल्ली से लगते फरीदाबाद के सुनपेड़ गाँव में एक दलित परिवार के दो मासूम बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना पर केंद्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह के बयान को कुत्ते की मौत से तुलना कर विरोधियों ने कड़ी निंदा की थी |

नवम्बर के ही अंतिम सप्ताह में हरयाणा प्रदेश के ही एक वरिष्ठ मंत्री अनिल विज द्वारा जिला फतेहाबाद में अधिकारियों की मीटिंग में जिले की पुलिस कप्तान संगीता कालिया को अवैध शराब बिकने की घटना पर मीटिंग से ही गेट आउट बोल दिया , परन्तु पुलिस कप्तान ने बाहर जाने से मना कर दिया | तब मंत्री महोदय ही खुद उठ कर चले गए | दूसरे ही दिन पुलिस अधिकारी का तबादला हो गया |

उपरोक्त तीनों ही घटनाओं में सत्ता पक्ष की असहिष्णुता की झलक स्पष्ट दिखलाई दे रही है | प्रथम दृष्टि में तीनों ही घटनाओं के पीछे सत्ता के अहम् , मद व मानसिक कलुषिता परिलक्षित होते हैं | कोई व्यक्ति भावावेश में क्या बोलता है , बिना सोचे समझे क्या कहता है , वह उसकी मानसिक स्थिति का दर्पण भी है | आवेश में व्यक्ति का व्क्तव्य उसके मन , विचार एवं वचन की एकरूपता दर्शाता है | सहिष्णुता के अभाव में व्यक्ति का व्यवहार हमेशा कटु ही रहता है | जाकि रही भावना जैसी , प्रभु मूर्ति देखि तिन तैसी | हर व्यक्ति के मन में किसी न किसी के प्रति लगाव दुराव तो होता ही है | वह उसी के अनुसार आचरण करता है | आकाशीय आवेश एवं धरा के आवेश की मात्रा जितनी अधिक एवं विपरीत होगी उतनी ही अधिक तीव्रता व वेग के साथ बिजली गिरेगी | वही तथ्य मानवीय व्यवहार में भी लागु होता है |

परन्तु राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा के सांसद सैनी का कथित संबोधन एक जाति विशेष के प्रति कलुषित मानसिकता का प्रतीक तो है ही अपितु यह बयान कोई आवेश में कहा गया वाक्य नहीं है बल्कि भाजपा की सोची समझी राजनैतिक रणनीति का हिस्सा है | वर्तमान स्थिति में हरयाणा में भाजपा वोटर का जाट गैर जाट का धुर्विकरण कर गैर जाट मतदाताओं में अपनी पैंठ ज़माना चाहती है | वह एक समय में गैर जाट राजनीति के पुरोधा रहे पूर्व मुखमंत्री भजन लाल के रास्ते को पुनः अख्त्यार कर गैर जाट के सहारे हरयाणा में कुर्सी की लम्बी पारी खेलना चाहती है | यह नहीं हो सकता कि भाजपा सांसद बिना पार्टी लाइन को विश्वास में लिए अकेले अपने ही दम पर इतना बड़ा फैसला कर लें कि एक जाति विशेष की दुश्मनी मोल ले लें | सांसद द्वारा बार बार जाट आरक्षण का तीव्र विरोध एवं कटुतापूर्ण बयानबाजी का भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा अनदेखा करना तथा मुख्य मंत्री एवं प्रधान मंत्री की चुप्पी मौन स्वीकृति एवं पार्टी लाइन की सहमति का द्योतक नजर आ रहा है | इससे भाजपा की जाटों को दिए गए आरक्षण के प्रति सोच एवं असहिष्णुता साफ़ झलकती है | क्योंकि हरयाणा में जाटों की विचारधारा भाजपा की धार्मिक असहिष्णुता की विचारधारा से मेल नहीं खाती है | जाट भले ही हिन्दू हैं परन्तु कट्टर हिन्दू पंथी नहीं हैं , उनका मुस्लिम समुदाय से भी कोई दुराव या शत्रुता का भाव नहीं है |

राजनैतिक विचारको का मत है कि जाटों का मुस्लिम समुदाय से दुराव न होना ही भाजपा को अखरता है | इसीलिए भाजपा एक सोची समझी रणनीति के तहत समाज में जाटों के प्रति असहिष्णुता का माहौल पैदा कर जाटों व मुस्लिमों को सत्ता में आने से रोकने के लिए गैर जाटों को गले लगाना चाहती है |भाजपा मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस का वोट बैंक मान रही है , परन्तु यह भूल रही है कि बिहार में मुस्लिम यादव गठबंधन की तर्ज पर अगर हरयाणा में भी जाट मुस्लिम का गठबंधन हो गया तो भाजपा कहाँ ठहर पायेगी | भाजपा की जाटों व मुस्लिमों के प्रति असहिष्णुता भाजपा को ही ले बैठेगी |

भाजपा भले ही कितनी ही दलित हितेषी होने का प्रचार करती रहे , कितना ही अम्बेडकर का नाम संसद व बाहर उठाती रहे , दलितों को अपनी और भाजपा खींच पाएगी इसमें अभी संदेह ही नजर आता है | यह सही है कि भाजपा दलितों को लुभाने के लिए अम्बेडकर के नाम को अपना वैतरणी तारक नाम बनाना चाहती है | सांसद सैनी का बैकवर्ड सम्मलेन में अपने सोनीपत के संबोधन में यह कहना कि भीम राव अंबेडकर ने आपका पक्ष लिया परन्तु इन [शूर—–] लोगों ने उन्हें पार्लियामेंट में नहीं जाने दिया ,अनायास ही नहीं है | इस बयान के जरिये भाजपा का सैनी के माध्यम से दलितों को अपनी तरफ लुभाने का एक तीर है ,जो द्विधारी है जो एक तरफ जाटों को घायल करता है तो दूसरी तरफ पिछड़ों को दबंग बनाने की चेष्टा करता है |

छब्बीस नवम्बर , २०१५ को भाजपा सरकार में गृहमंत्री राज नाथ सिंह द्वारा संसद में यह कहना कि अपमान के बाद भी अम्बेडकर ने कभी देश छोड़ने की बात नहीं की , क्या दलितों एवं मुस्लिमों को यह संकेत नहीं देता कि अपमान सहते रहो परन्तु अपनी आवाज़ मत उठाओ , देश छोड़ने की बात मत करो ,जुल्म सहने की आदत डालकर सहिष्णु बनों ? गृह मंत्री ने कहा –“ दलित होने के कारण डॉक्टर अम्बेडकर ने तिरस्कार और अपमान सहा , लेकिन कभी देश छोड़कर जाने की बात नहीं कही |”

विचारणीय विषय है कि किसने किया अम्बेडकर का तिरस्कार ? इसका जवाब हर दलित जानता है कि भारतीय संस्कृति के तथाकथित ठेकेदारों तथा कट्टर हिन्दुवाद के मठाधीशों ने न केवल अम्बेडकर अपितु हर दलित को सदैव तिरष्कृत ही किया है , उन्हें हिन्दू धर्म से तो हमेशा अछूत ही माना गया है | आज संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द का विरोध कर हिंदुत्व के एजेंडे को प्रथम स्थान पर रखने वाली वर्तमान भाजपा सरकार क्या देश को पुनः कट्टर धर्मान्धता की तरफ तो नहीं धकेलना चाहती है ? अनायास ही तो नहीं उपजा है यह अम्बेडकर प्रेम | बिल्ली चूहे को कांशी ले जाने का सपना परोस रही है तो जरूर कोई बात है |

स्वतंत्र भारत में खबरों की आजादी…!!

News Nation

तारकेश कुमार ओझा

आजादी के बाद से खबरचियों यानी मीडिया के क्षेत्र में भी आमूलचूल परिवर्तन आया है। पहले मीडिया से जुड़े लोग फिल्म निदेशकों की तरह हमेशा पर्दे के पीछे ही बने रहते थे। लेकिन समय के साथ इतना बदलाव आया है कि अब इस क्षेत्र के दिग्गज बिल्कुल किसी सेलीब्रिटी की तरह परिदृश्य के साथ पर्दे पर भी छाये रहते हैं।अपने ही चैनल पर अपना इंटरव्यू देते हैं और हमपेशा लोगों की बखिया उधेड़ने से भी बिल्कुल गुरेज नहीं करते। बदलते दौर में खबरें शानदार शाही नाश्ते की प्लेट की तरह हो गई है जिसमें कई प्रकार के कलरफूल मिठाईयां सजी होती है। खबरों की दुनिया में दुनिया की खबरें वाकई बड़ी दिलचस्प है। इनमें से कई खबरें इसके बावजूद सुर्खियां बनती है जबकि यह पहले से मालूम होता है कि कुछ घंटे बाद ही यह खबर बिल्कुल उलटी होने वाली है। जैसे भारत – पाक संबंधों में सुधार। दोनों देशों के कर्णधार जब – तब रिश्ते सुधारने की बातें करते हैं । बयान पर बयान जारी होते हैं। लेकिन फिर अचानक सीमा पर गोलियां तडतड़ाने लगती है और तनाव का पारा फूटने को होता है।रिश्तों का यह उतार – चढ़ाव देखते कई दशक बीत चुके हैं। आगे की तो ईश्वर ही जाने।

रोचक खबरों में माननीयों के खिलाफ निलंबन जैसी कार्रवाई भी शामिल है। आम आदमी खास तौर से सरकारी मुलाजिमो के शरीर पर निलंबन के नाम से ही झुरझुरी दौड़ने लगती हैं। बचपन में मैं भी स्कूल में निलंबन की कल्पना से सिहर उठता था। क्योंकि अक्सर मास्साब उद्दंड टाइम बच्चों को एक्सपेल्ड कर दिया करते थे।एक बार खुद अपने साथ ऐसी नौबत आई तो मैं मारे डर के बेहोश होते – होते बचा। लेकिन माननीयों के लिए इसके मायने कुछ और हैं। इससे तो उलटे उनके लोकप्रियता के नंबर बढ़ते हैं। आज खबर आई कि फलां माननीय के खिलाफ सदन में अमुक कारर्वाई की गई, लेकिन दूसरे दिन कार्रवाई के सम्मानजनक खात्मे की सूचना भी आ जाती है और अल्पकाल के लिए दंडित हुआ माननीय सदन में कोई सवाल पूछता नजर आ जाता है।

आम आदमी के लिए कुछ खबरें तो बिल्कुल चाट – पकौड़े की तरह होती है। मसलन किसी मशहूर अभिनेत्री का अफेयर फिर शादी या और अंत में तलाक। बेशक ऐसी सूचनाएं आम आदमी के लिए एकबारगी महत्व पूर्ण नहीं कही जा सकती। लेकिन इससे नीरस जिंदगी में चटपटा स्वाद तो मिलता ही है। ऐसे ही नून – तेल – लकड़ी की चिंता में दुबले हुए जा रहे मैंगो मैन माफ कीजिए आम आदमी के लिए किसी नामी खिलाड़ी या अभिनेता की दिनोंदिन बढ़ती कमाई की सूचना भी भोज की थाली में रखे आचार सा स्वाद देती है। बेशक फटीचरों का खून इससे जलता हो , लेकिन आम आदमी को इस नारकीय जिंदगी में कम से कम यह कम सुकून तो मिलता है कि अपन भले अखबार वाले को समय पर पेमेंट न कर पा रहे हों, लेकिन उसके पसंदीदा खिलाड़ी या अभिनेता – अभिनेत्री की कमाई पड़ोसी महिला की सुदंरता की तरह दिनोंदिन बढ़ती जा रही है । मैं अक्सर खबरों में देखता – पढ़ता हूं कि फलां अभिनेता की फिल्म अपने जन्म लग्न यानी रिलीज होने वाले दिन ही सौ करोड़ क्लब में शामिल हो गई। बमुश्किल दो दशक पहले जब यह सुना था कि अपने अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन अब नई फिल्म साइन करने के एक करोड़ लेने लगे हैं तो हाथों की अंगुलियां दातों तले खुद ब खुद चली गई थी। लेकिन अब तो फिल्म का नाम भले ही न बोलते बने न सुनते , लेकिन सौ करोड़ क्या हजार करोड़ की बात भी मामूली हो चली है। कुछ खबरों का अपना मजा है। खबरों की दुनिया में जब – तब यह समाचार भी देखने – पढ़ने को मिलता है कि देश के सबसे बड़े प्रांत यानी उत्तर प्रदेश के समाजवादी पुरोधा मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्री बेटे से काफी नाराज है। अभी कुछ दिन पहले एक समारोह में उन्हें बेटे को डपटते देख मुझे अपने स्वर्गीय पिता की याद हो आई। कई बार मुझे लगा कि यदि बाबूजी सचमुच नाराज है तो बिटवा पर गाज तो गिरनी ही गिरनी है लेकिन एक चुनाव से चल कर अपना उत्तर प्रदेश दूसरे चुनाव के करीब पहुंच गया। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर अखिलेश बाबू ही काबिज हैं।

(लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

जब – जबरा बोले …!!

तारकेश कुमार ओझा

बचपन में पढ़ी उस कहानी का शीर्षक तो अब मुझे याद नहीं, लेकिन सारांश कुछ हद तक याद है। जिसमें सब्जी बेचने वाली एक गरीब महिला का बेटा किसी हादसे में गुजर जाता है। लेकिन परिवार की माली हालत और गरीबी की मारी बेचारी उसकी मां को दो दिन बाद ही फुटपाथ पर बैठ कर सब्जी बेचने को मजबूर होना पड़ता है। उसे देख कर लोग ताने देते हैं… कैसी बेशर्म औरत है, अभी दो दिन नहीं हुए बेटे को मरे, और चली आई है सब्जी बेचने…। उसे क्या – क्या नहीं कहा जाता। कुछ लोग उसे कलियुगी मां तक करार दे देते हैं। हालांकि उस अभागिन मां की आंखे आंसुओं से भरी है। यह उसकी मजबूरी है कि शोक के बावजूद अपना और परिवार का पेट भरने के लिए उसे बाजार में बैठने को मजबूर होना पड़ता है। इस दौरान लोग इलाके के ही उस संभ्रांत – अमीर परिवार की महिला का बार – बार जिक्र करते हैं जिसके साथ भी यही विडंबना हुई है। लेकिन फर्क यह कि वह महीने भर से बिस्तर पर पड़ी है। नौकर – चाकर लगातार सिर पर पट्टी रखते हुए सेवा में लगे हैं। डाक्टरों की फौज लगातार उसकी तबियत पर नजर रख रहे हैं। एक ही विडंबना दो अलग – अलग मां का भिन्न स्वरूप पेश करती है। गरीब बेबस मां के शोक पर भी अमीर का गम भारी पड़ता है। अपने देश में आम – आदमी और तथाकथित बड़े आदमियों यानी सेलिब्रेटियों का भी यही हाल है। आम आदमी के मुंह से भूल से भी कुछ निकल जाए तो उसकी फजीहत और ऐसी – तैसी तय है। लेकिन ये सेलिब्रिटीज अपने फायदे के लिए चाहे जितनी बेहूदी बातें करें, उनके बयान पर चाहे जितना शोर मचे, लेकिन इसमें भी पर्दे के पीछे से आखिरकार उनको लाभ ही होता है। लगातार कई दिनों तक सुर्खियों में बने रहते हैं। जम कर प्रचार होता है। विवाद एक सीमा से ऊपर गया तो झट बयान जारी कर दिया कि उसका इरादा ऐसा नहीं था। उसकी बातों को तोड़ – मरोड़ कर पेश किया गया। यदि उसकी बातों से किसी को दुख पहुंचा हो तो … वगैरह – वगैरह। बस बात खत्म और जनाब फिर से अपने काम – धंधे पर। क्योंकि वे जबर हैं। लेकिन क्या आम – आदमी के साथ भी यह सहूलियत है।

हाल में बालीवुड के दो खानों ने असहिष्णुता का राग छेड़ते हुए यहां तक कह दिया कि बच्चों की चिंता में उनकी घर वाली देश छोड़ने तक की सोचने लगी थी। यह तो उनकी महानता है कि अब तक देश में ही बने रह कर जनता पर अहसान कर रहे हैं। घरवाली की चली होती तो वे कब का विदेश में सैटल हो चुके होते। अब अल्पबुद्धि वाले तो इतना ही जानते हैं कि घर – परिवार और देश कोई अपनी मर्जी से नहीं चुन सकता । यह तो जो नसीब में लिख गया उसे जीवन भर निभाना ही है। लेकिन सेलिब्रेटीजों की बात अलग है। इनका वश चले तो ये जन्म से पहले ही अपने पसंदीदा देश का चुनाव कर लें कि भैया मुझे यह देश मेरी च्वाइश नहीं, मैं तो फलां देश में जन्म लूंगा। यह जबर होने का ही परिणाम है कि जो बात कहने पर एक आम – आदमी के सामने जेल जाने की नौबत आ जाए, वही बात कहने पर इन बड़े लोगों के बचाव में हर दिन नए – नए लोगों की फौज खड़ी होती रहती है। कोई कहता है… अरे उसके कहने का मतलब ऐसा नहीं रहा होगा… वह तो बड़ा समझदार आदमी है, मुझे नहीं लगता उसने ऐसा कहा होगा। आखिर वह बड़ा आदमी है… उनका बड़ा नाम है… उसने इतने सालों तक बालीवुड के जरिए उन्होंने देश और जनता की सेवा की है, उसका कुछ तो लिहाज करना चाहिए। जरूर मीडिया ने उसकी बातों में नमक – मिर्च लगा कर मसालेदार बनाया होगा। आश्चर्य कि रंग के हिसाब से अलग – अलग राजनेता भी उसके समर्थन या विरोध में लामबंद होते रहते हैं। यहां भी राजनीतिक नफा – नुकसान हावी दिखता है। यह तथाकथित बड़े होने का ही तो फायदा है। क्या अपने देश में यह कभी संभव नहीं होगा कि बेहूदा और आपत्तिनजक बातें कहने पर समाज के हर वर्ग के लोग एक स्वर में उसकी लानत – मलानत करे। ताकि भविष्य में दूसरे इससे सबक लें। मीडिया भी ऐसे तत्वों का महिमामंडन करने के बजाय या तो निष्पक्ष तरीके से बयान का विश्लेषण कर दोषी को सबक सिखाए या फिर ऐसे बयान से दोषी को व्यापक प्रचार देने के बजाय कम से कम चुप ही रहे।

(लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

सच्ची शराबबंदी लागू कर दें, तो हम भी करेंगे नीतीश की जय-जय

बिहार के सारे अखबारों ने “नौ सालों के कथित सुशासनी सरकार के रिपोर्ट -कार्ड ” को जिस तरीके से परोसा और जिस तरह से वो नीतीश जी के चुनावी –अभियान की मुहिम ‘सम्पर्क-यात्रा’ को परोस रही है वो अपने आप ही नीतीश जी की सरपरस्ती वाले सुशासन के मीडिया -मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता है
बिहार के सारे अखबारों ने “नौ सालों के कथित सुशासनी सरकार के रिपोर्ट -कार्ड ” को जिस तरीके से परोसा और जिस तरह से वो नीतीश जी के चुनावी –अभियान की मुहिम ‘सम्पर्क-यात्रा’ को परोस रही है वो अपने आप ही नीतीश जी की सरपरस्ती वाले सुशासन के मीडिया -मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता है

अभिरंजन कुमार

अगर नीतीश कुमार सचमुच बिहार में प्रभावशाली तरीके से शराबबंदी लागू कर पाए, तो उनसे मेरी आधी शिकायतें दूर हो जाएंगी। शराब बहुत सारी बुराइयों की जड़ है। इसकी वजह से महिलाओं का जीवन नरक बन जाता है, बच्चों पर बुरा असर पड़ता है, लोग बड़ी संख्या में गंभीर बीमारियों के शिकार होते हैं, बड़े पैमाने पर दुर्घटनाएं होती हैं, कानून-व्यवस्था के हालात बिगड़ते हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और देश की कार्यशक्ति और अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष और परोक्ष चोटें पड़ती हैं।

कारगर शराबबंदी के लिए नीतीश कुमार को आग के ढेर से गुज़रना होगा। देश के अन्य हिस्सों की ही तरह बिहार में भी शराब माफिया बहुत पावरफुल है। ख़ुद नीतीश जी की टोली में कई लोग ऐसे होंगे, जो शराब के धंधे से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होंगे। नीतीश जी को उनपर लगाम कसनी होगी। शराबबंदी का असली मकसद तभी हासिल होगा, जब गली-गली अवैध शराब की भट्ठियां न लग जाएं। बिहार में ज़हरीली शराब से हर साल बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। बिहार पुलिस के एक आला अधिकारी ने कहा था कि बिहार में जितनी शराब वैध तरीके से बिकती है, उतनी ही अवैध तरीके से भी बिकती है।

इतना ही नहीं, इस वक्त शराब से बिहार को करीब साढे तीन हज़ार करोड़ रुपये के सालाना राजस्व की प्राप्ति होती है। नीतीश जी को इसका लालच छोड़ना होगा। अपने पिछले कार्यकाल में शराब से प्राप्त पैसे पर वह इस हद तक निर्भर हो गए थे कि यहां तक कह दिया था कि लोग शराब पिएंगे, तभी तो लड़कियों की साइकिलों के लिए पैसे आएंगे। इस बयान के चलते उनकी काफी आलोचना हुई थी और बिहार की कई होनहार बेटियां सरकारी साइकिलें लौटाने पहुंच गई थीं।

लेकिन अब चूंकि ऐसा लग रहा है कि सरस्वती ने नीतीश जी को सद्बुद्धि प्रदान कर दी है, इसलिए पुरानी बातों से आगे बढ़ते हुए हमें उनका समर्थन करना चाहिए और बिहार में सच्ची शराबबंदी के रास्ते पर बढ़ने में उनकी मदद भी करनी चाहिए, अगर वे डगमगाते हैं तो संभालना भी चाहिए और अगर भागने की कोशिश करते हैं तो दबाव भी बनाए रखना चाहिए।

नीतीश जी से आधी शिकायत हमें शराब को बढ़ावा देने के लिए थी और आधी शिकायत मुख्य रूप से इन दो वजहों से रही-

1. पहली इस बात के लिए कि लड़कियों को साइकिलें बांटकर उन्होंने सुर्खियां तो बटोरीं, लेकिन कुल मिलाकर बिहार की सरकारी शिक्षा को ध्वस्त कर दिया। उनके दूसरे टर्म में बिहार भर के शिक्षक भी आंदोलनरत् रहे। बच्चे भी आंदोलनरत् रहे। पढ़ाई का स्तर निचले पायदानों तक पहुंच गया। मिड डे मील में भ्रष्टाचार और लापरवाही इस हद तक बढ़ गई कि ग़रीबों के बच्चों को जगह-जगह ज़हरीला खाना खिलाया गया। छपरा के धर्मासती गंडामन गांव में तो भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटना हुई, जिसमें मिड डे मील खाने से 23 बच्चों की मौत हो गई थी।

2. दूसरी इस बात के लिए कि उनके पिछले कार्यकाल में बिहार में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया था और अपराधियों को सरकारी संरक्षण की घटनाओं के लिए सबूत जुटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह साफ़ परिलक्षित होता था। इस बार भी विधानसभा में 135 ऐसे सदस्य पहुंचे हैं, जिनका इतिहास किसी न किसी रूप में दागदार है। नीतीश जी किस तरह उनपर लगाम कसे रखेंगे और भ्रष्टाचार को कैसे रोकेंगे, इसपर सबकी नज़र रहने वाली है, क्योंकि अगर वे ऐसा नहीं कर पाए, तो जंगलराज पार्ट-2 के आरोप से वे अपनी और लालूजी की साझा सरकार को बचा नहीं सकेंगे।

आशा करते हैं कि नीतीश जी ने एक कदम बढ़ाया है तो दूसरा कदम भी बढ़ाएंगे, ताकि उनकी सरकार सही दिशा में चलती हुई दिखाई दे। उन्हें हमारी पूरी शुभकामनाएं हैं।

गदर आन्दोलन का इतिहास : आजादी या मौत

गदर आन्दोलन का इतिहास : आजादी या मौत

समीक्षक : आरिफा एविस

हम इतिहास के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ इतिहास को खासकर भारतीय इतिहास को बदलने की नाकाम कोशिश की जा रही है. भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन और उससे जुड़े तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है. इतिहास के ऐसे कठिन दौर में भारतीय इतिहास को समृद्ध करती वेद प्रकाश ‘वटुक’ द्वारा लिखित पुस्तक ‘आजादी या मौत’ गदर आन्दोलन की एक ऐसी दास्तान है जो अभी अकथ रही है.

वेद प्रकाश ‘वटुक’ की यह पुस्तक संस्मरणात्मक रूप से अपनी बात कहती है कि 1848 से लेकर 1910 तक भारत के लोग अमरीका, कनाडा, इंग्लैण्ड में जहाँ एक तरफ उच्च शिक्षा प्राप्त करने गए वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग अपनी गरीबी मिटाने गए थे-“भारतीय छात्र ब्रिटेन ही जाते थे क्योंकि वह शिक्षा उन्हें ऊँचे सरकारी पदों के लिए तैयार करने के लिए सहायक होती थी…” इसी शिक्षा का परिणाम था कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में कालान्तर में भाग लेने वाले नेताओं का भी निर्माण हुआ. गाँधी, नेहरू, जिन्ना आदि उसी शिक्षा की उपज थे. छात्रों का एक वर्ग ऐसा भी था जो भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे जिनमें तारकनाथ दास, सुधीन्द्र बोस, प्रफुल्ल मुखर्जी आदि प्रमुख थे.

दूसरी तरफ वे भारतीय लोग भी आये जो अपनी गरीबी का दुर्भाग्य मिटाना चाहते थे. उन्हें तो जो भी काम जहाँ भी मिलता, जितनी भी पगार पर मिलता कर लेते. साथ ही उन देशों के नस्लभेदी, द्वेषी विशाल समाज के कोप से अपना अस्तित्व बचाना भी एक चुनौती थी. और इन मुश्किलों के बावजूद वे स्त्रीविहीन, परिवार विहीन एकांकी पुरुष एक दूसरे का सहारा बनकर जीने को विवश थे.

विदेशों में भारतीय नागरिक घृणा, उत्पीड़न और शोषण का शिकार हो रहे थे. उसी दौरान सोहन सिंह भकना और उसके दोस्त काम ढूंढने गए थे. जब वे अमरीका के सुपरिटेंडेंट से मिले तो उनका जवाब सुनकर शर्म से गर्दन झुकाकर वापस चले आये. “काम तो है पर तुम्हारे लिए नहीं… मेरा दिल तो करता है तुम दोनों को गोली मार दूँ. …तुम्हारे देश की कितनी आबादी है? ये तीस करोड़ आदमी हैं या भेड़ें? जो तुम तीस करोड़ आदमी होते तो गुलाम क्यों होते? गुलाम क्यों रहते… मैं तुम दोनों को एक-एक बन्दूक देता हूँ. जाओ पहले अपने देश को आजाद कराओ. जब आजाद कराके अमरीका आओगे तो मैं तुम्हारा स्वागत करूँगा.”

जब भारतीय लोगों के लिए अमरीका, कनाडा इत्यादि देशों के दरवाजे बंद होने लगे तो भारतीय अप्रावासियों की त्रासदी निरंतर बढ़ने लगी. तमाम विरोध प्रदर्शन, सभाओं एवं लिखित प्रेस विज्ञप्ति के बाद भी भारतीयों के समर्थन में कोई भी व्यक्ति सामने नहीं आया. “धीरे-धीरे भारतीयों की समझ में यह आने लगा कि ब्रिटेन साम्राज्य की रक्षा/सेवा में चाहे वे अपना तन-मन-धन सबकुछ न्यौछावर कर दें, तो भी किसी भी गोरों के उपनिवेश में आदर नहीं पा सकते. इसी चिन्तन ने ब्रिटिश सरकार परस्त लोगों के मन में राष्ट्रीयता और एकता की भावना को जन्म दिया. विदेशी धरती पर 1909 में ‘हिन्दुस्तान एसोसिएशन की स्थापना हुई. बदलती परिस्थितियों में यह संस्था भारतीयों के हित की रक्षा के लिए कटिबद्ध थी.”

1913 तक आते-आते गदर पार्टी की नींव रख दी जाती है इसने पूर्ण स्वराज के नारे को कांग्रेस से भी पहले अपना लिया था. ‘गदर’ का यह नारा बहुत प्रचलित था- “जब तक भारत पूर्णरूप से राजनीतिक ही नहीं सामाजिक और आर्थिक आजादी भी प्राप्त नहीं कर लेता, हमारी जंग जारी रहेगी.”
‘गदर’ की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि इस अखबार को ‘गदर पार्टी’ के नाम से जाना जाने लगा. गदर पार्टी के सदस्यों ने जिस आजाद भारत का सपना देखा था. उसको व्यावहारिक रूप से जीने की कोशिश करने लगे- “धार्मिक अभिवादनों का स्थान ‘वंदेमातरम्’ ने ले लिया. जूते और धर्म दरवाजे से बाहर रखकर वे वहाँ शुद्ध भारतीय होकर जीते, साथ पकाते, साथ घर की देखभाल करते और साथ मिलकर ‘गदर’ निकलते.”

गदर पार्टी की सक्रियता ने अमरीका, कनाडा और ब्रिटेन की सरकार को हिलाकर रख दिया. परिणामस्वरूप उन्होंने भेदियों को ‘गदर’ नेताओं के पीछे लगा दिया. लेकिन गदर ने धीरे-धीरे अपनी पहचान आम लोगों में बनानी शुरू कर दी थी. 25 मार्च 1914 को दिए गए हरदयाल के भाषण ने पूरी सभा को इतना प्रभावित एवं उत्तेजित किया कि लोग देश की आजादी के लिए स्वदेश लौटने की तयारी करने लगे. उन्होंने अपने भाषण में कहा था- “वह दिन दूर नहीं जब मजदूर जागेंगे, किसान जागेंगे, शोषित कुचले हुए लोग जागेंगे, बराबरी का हक़ मागेंगे, इन्सान की तरह जीने का अधिकार मांगेंगे. उसके लिए प्राणों का उत्सर्ग करेंगे- उनकी ताकत के आगे न अन्याय टिकेगा न झूट भरा जालिम राज.”

4 अगस्त 1941 को ब्रिटेन द्वारा जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा होते ही ‘गदर’ सदस्यों ने घोषणा कर दी कि अब वक्त आ गया है भारत की गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करने का समय आ गया है. गदर पार्टी के नेताओं के संदेशों में अपील जारी की जाने लगी कि भारत में जाकर जनता में क्रांति का सन्देश फैलाये. मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली ने अपने सन्देश में कहा “भाइयों, आप लोग दुनिया के बेहतरीन मुजाहिदीन हैं. धर्म की आड़ में दूसरे मजहबों के बेबस लोगों को मारने वाले नहीं, शैतानी राज को जड़ से उखाड़ने वाले मुजाहिदीन, हर लाचार की पांव की बेड़ियां काटने वाले मुजाहिदीन, गुलामी की जंजीरों के टुकड़े-टुकड़े कर फेंकने वाले, जालिम को मिटाने वाले मुजाहिदीन. पर याद रखो, आजादी गोरों की जगह काले साहबों को बिठा देना नहीं.” देखते ही देखते 60 से 80 प्रतिशत अप्रवासी भारतीय बलिदान होने के लिए भारत लौट आये. यह विश्व इतिहास की सबसे अभूतपूर्व घटना इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गयी.

रास बिहारी के गदर पार्टी में शामिल होते ही ‘गदर’ साहित्य जनता के विभिन्न तबकों तक पहुंचने लगा. उसने सैनिकों के लिए गदर साहित्य पहुंचाना शुरू कर दिया ताकि एक दिन सैनिक विद्रोह किया जा सके. इसी दौरान राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण भी कर लिया गया था. ऐसा लग रहा था कि क्रांति का सपना साकार होने वाला है लेकिन अचानक ही पार्टी के एक सदस्य ने विश्वासघात करके बहुत से साथियों को पकड़वा दिया.

देश विदेश में गदरी नेताओं पर ‘वैधानिक सरकार को पलटने’ के षड्यंत्र में सामूहिक मुकदमा चलाया गया. मुकदमे के दौरान गदरियों ने बार बार कहा “बंद करो यह ड्रामा, दे दो हमें फांसी.” फैसले के दिन जब सभी को मृत्युदंड मिला और उनके साथी ज्वाला सिंह को आजीवन कारावास तो वो चीख पड़ा “जब मेरे साथियों को मौत की सजा मिली है, तो मुझे उम्रकैद क्यों?” ऐसे थे आजादी के दीवाने जिन्होंने फाँसी के तख्ते को हँसते गाते चूम लिया. कोठरी में करतार सिंह के द्वारा कोयले से लिखे गए वे शब्द आज भी सच्ची आजादी की उम्मीद बनाये रखते हैं-“शहीदों का खून कभी खाली नहीं जाता. आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसो जरूर ही बाहर जाकर रंग लायेगा.”

गदर आन्दोलन के विफल होने के बाद जो भी गदरी बचे थे उन्होंने अपनी नाकामयाबी से सबक लिया और आत्मकेन्द्रित योजना न बनाकर जनकेन्द्रित योजनाओं पर अमल करना शुरू कर दिया. इस तरह उन्होंने नये सिरे से जन आन्दोलन को विकसित करना शुरू किया जिसमे सोहन सिंह भकना किसान आन्दोलन के मेरुदंड बनकर उभरे.

देश तो आजाद हो गया लेकिन सोहन सिंह भकना ने आजाद भारत की सरकार के बर्ताव पर रोस जताया- “मुझे इस बात का फख्र है कि कौम की दुश्मन अंग्रेज सरकार मेरी कमर न झुका सकी, जो अभी झुकी है तो उन्हीं मित्रों की सरकार के कारण जिनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़कर हमने आजादी की लड़ाई लड़ी थी.”

यह पुस्तक पाठकों की इतिहासबोध चेतना को उन्नत करने में सहायता करती है क्योंकि समाज के इतिहास में प्रत्येक व्यक्ति का अपना इतिहास और योगदान होता है. गदर आन्दोलन के इतिहास की रौशनी में हम भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन को भी आसानी से समझ सकते हैं.

आजादी या मौत : वेद प्रकाश वटुक | गार्गी प्रकाशन | कीमत 130 रुपये | पेज 192

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