आलोक कुमार,वरिष्ठ पत्रकार”मरता क्या नहीं करता “..... [caption id="attachment_21485" align="alignright" width="497"]
नीतिश कुमार के लिए जनता के मिजाज को समझने का वक्त अब निकल चुका है[/caption]
मुख्यमंत्री रहते हुए भी नीतीश जी ऐसी ही दो और यात्राएं " अधिकार यात्रा व संकल्प यात्रा " आयोजित कर चुके हैं ... इन यात्राओं का क्या फल-प्रतिफल जनता या खुद नीतीश जी को हासिल हुआ ये भी हम सब देख चुके हैं .... अपनी पिछली दोनों यात्राओं के दौरान नीतीश जी को जनता के भारी विरोध व उग्र -प्रदर्शनों का सामना भी करना पड़ा था ,नौबत तो यहाँ तक आ पहुँची थी कि अपनी अधिकार यात्रा के दौरान नीतीश जी ने अपनी जान जाने की आशंका तक जाहिर कर दी थी (भले ही वो उनकी राजनीतिक चोंचलेबाजी थी ) .....
पिछले दो – ढाई वर्षों के दरम्यान नीतिश जहाँ भी गए हैं उन्हें जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा है …. हद तो तब ही हो गयी थी , जब उन्हें अपने ही गृह-जिले (नालंदा) एवं अपने ही गाँव कल्याणबिगहा (आशा कार्यकर्ताओं ने नीतीश जी को चप्पल दिखाया था ) में विरोध का सामना करना पड़ा था …. नीतीश जी ने इन्हीं विरोध -प्रदर्शनों के कारण एक लम्बे अर्से के लिए जनता के बीच जाना ही छोड़ दिया था , लेकिन अब जब चुनाव नजदीक है और पूरा राजनीतिक – कैरियर ही दाँव पर लगा हो तो ऐसी दुरह परिस्थितियों में जनता के बीच जाने से बचा भी नहीं जा सकता…. ना ही इन विरोध -प्रदर्शनों को सदैव " विपक्षी साजिश " करार दिया जा सकता है …. वो एक कहावत है ना ...”मरता क्या नहीं करता “.....
राजनेता जब जनता से विमुख होकर फैसले लेता है और जनता को केवल बरगलाने की फिराक में रहता है तो उसकी परिणति विरोध में ही होती है और ऐसे में जनाक्रोश स्वाभाविक व तर्कसंगत ही है ….. इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि जनहित के मुद्दों पर अतिशय व् कुत्सित राजनीति की परिणति जनाक्रोश ही है ……
वैसे भी ऐसी यात्राओं से जनता को कुछ भी हासिल नहीं होता और इस सच को आज जनता भली-भाँति समझ चुकी है .... ऐसी यात्राएं वस्तुतः राजनीतिक यात्राएं होती है जिनका मूल उद्देश्य होता है अपनी सिमटती या खोई राजनीतिक जमीन की तलाश .... वैसे भी आज की तारीख में नीतीश जी के पास 'खाली समय' की कमी नहीं है और उनके 'अपने'भी आँखें तरेर रहे हैं ऐसे में किसी बहाने 'तफरीह' जायज भी है ...!!
एक साक्षात्कार के दौरान एक अल्पसंख्यक गामीण बिहारी की कही हुई बात सदैव मेरे जेहन में कौंधती है "जनहित की कब्र पर दिखावे की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती और जनता के दर्द पर घड़ियाली आँसू बहाने वालों को पहचानने में ज्यादा देर नहीं होती "
मेरे विचार में नीतिश जी के लिए जनता के मिजाज को समझने का वक्त शायद अब निकल चुका है !!
आलोक कुमार ,
(वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक ),
पटनाM
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