देहरादून का एक अखबार -आए दिन माफीनामा। आए दिन गलत खबर
[caption id="attachment_27835" align="alignleft" width="233"]
वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार[/caption]
वजह - वजह पत्रकारिता का अनुभव न होना। अनुभव , ज्ञान, पर्याप्त योग्यता के बिना बहुत ऊंचा पद मिल जाना । पहले भी पदों को इसी तरह जुगाड से छलांग लगाकर हासिल करना। जैसे आम सैनिक से सीधे तिकडम लगाकर कोई ब्रिगेडियर बन जाए। फिर वो सीमा पर क्या करेगा जान लीजिए। पत्रकारिता में कुछ पद ऐसे ही हासिल किए गए हैं। उनका खामियाजा पाठक या दर्शक भुगतता है।
नतीजा - समाज को आए दिन गलत तथ्यों पर खबरें मिलना, गलत जानकारी मिलना। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के साथ खिलवाड करना ।
काम - अपनी ही तरह गैर अनुभवी . जुगा़डू लोगों की बडे संवेदनशील महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति करना। उनके जरिए उटपंटाग खबरें लिखा जाना। उनकी खबरों को देख पाने का कौशल न होना।
परिणाम - अखबार की बनी बनाई प्रतिष्ठा को निंरतर आघात पहुंचना।
अखबार के जरिए अच्छी रिपोर्टिंग न हो पाना। ढंग के विश्लेषण न हो पाना, गांववदूर दराज की संवेदनशील जरूरी चीजों का अखबार में समावेश न हो पाना। हर चीज कुछ नेता ,अधिकारियों तक सीमित हो जाना। तथ्यों की गड़बड रहना। पाठकों को अच्छी जानकारी न मिलना।
निष्कर्ष - ऐसे लोगों को पत्रकारिता छोडकर कोई दूसरा काम करना चाहिए। अपनी कई तरह की कमजोरियों के साथ वो इस अच्छे पेशे के साथ खिलवाड करते हैं।
उत्तराखंड की राजधानी मैं बैठकर इस संवेदशील राज्य की अस्मिता को रौंदते हैं। समय आया है कि इन बातों की तरफ हमें सबका ध्यान खींचना पडेगा। वरना राज्य खत्म हो जाएगा।
उस अखबार के लिए भी ये शुभ है कि ऐसे लोग छोडकर जाए। देश में कहीं के भी रहने वाले हो लेकिन मेधावी , पढे लिखे, क्षेत्रीय आग्रहों से दूर संवेदनशील लोग उत्तराखंड , देहरादून की मीडिया में आएं। और सौभाग्य से कुछ ऐसे लोग हैं भी। उनका स्वागत।
(वरिष्ठ पत्रकार वेद उनियाल के फेसबुक से साभार)
वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार[/caption]
वजह - वजह पत्रकारिता का अनुभव न होना। अनुभव , ज्ञान, पर्याप्त योग्यता के बिना बहुत ऊंचा पद मिल जाना । पहले भी पदों को इसी तरह जुगाड से छलांग लगाकर हासिल करना। जैसे आम सैनिक से सीधे तिकडम लगाकर कोई ब्रिगेडियर बन जाए। फिर वो सीमा पर क्या करेगा जान लीजिए। पत्रकारिता में कुछ पद ऐसे ही हासिल किए गए हैं। उनका खामियाजा पाठक या दर्शक भुगतता है।
नतीजा - समाज को आए दिन गलत तथ्यों पर खबरें मिलना, गलत जानकारी मिलना। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के साथ खिलवाड करना ।
काम - अपनी ही तरह गैर अनुभवी . जुगा़डू लोगों की बडे संवेदनशील महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति करना। उनके जरिए उटपंटाग खबरें लिखा जाना। उनकी खबरों को देख पाने का कौशल न होना।
परिणाम - अखबार की बनी बनाई प्रतिष्ठा को निंरतर आघात पहुंचना।
अखबार के जरिए अच्छी रिपोर्टिंग न हो पाना। ढंग के विश्लेषण न हो पाना, गांववदूर दराज की संवेदनशील जरूरी चीजों का अखबार में समावेश न हो पाना। हर चीज कुछ नेता ,अधिकारियों तक सीमित हो जाना। तथ्यों की गड़बड रहना। पाठकों को अच्छी जानकारी न मिलना।
निष्कर्ष - ऐसे लोगों को पत्रकारिता छोडकर कोई दूसरा काम करना चाहिए। अपनी कई तरह की कमजोरियों के साथ वो इस अच्छे पेशे के साथ खिलवाड करते हैं।
उत्तराखंड की राजधानी मैं बैठकर इस संवेदशील राज्य की अस्मिता को रौंदते हैं। समय आया है कि इन बातों की तरफ हमें सबका ध्यान खींचना पडेगा। वरना राज्य खत्म हो जाएगा।
उस अखबार के लिए भी ये शुभ है कि ऐसे लोग छोडकर जाए। देश में कहीं के भी रहने वाले हो लेकिन मेधावी , पढे लिखे, क्षेत्रीय आग्रहों से दूर संवेदनशील लोग उत्तराखंड , देहरादून की मीडिया में आएं। और सौभाग्य से कुछ ऐसे लोग हैं भी। उनका स्वागत।
(वरिष्ठ पत्रकार वेद उनियाल के फेसबुक से साभार)