खतरों को ठेंगा दिखाने वाली उड़नपरी

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भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स इन दिनों भारत यात्रा पर आई हैं। वे अपने पिता के देश में आकर पहले की तरह इस बार भी भावुक हो गईं। उन्होंने कहा है कि भारतीय युवाओं में तकनीकी प्रतिभा बेमिसाल है। उन्हें उम्मीद है कि एक न एक दिन अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत, दुनिया में अपनी बुलंदी के झंडे जरूर गाड़ेगा। वे दुनिया की ऐसी पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा चहलकदमी (स्पेसवॉक) करने का रिकॉर्ड बना दिया है। उन्हें लगता है कि आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष तकनीक का तेजी से विकास होगा। इसके जरिए ब्रह्माण्ड के तमाम रहस्य दुनिया के सामने उजागर होंगे। संभव है कि इसके द्वारा मानव जीवन की और बेहतरी के लिए नए विकल्प निकल आएं। 

अमेरिकी नेवी की पायलट सुनीता ‘नासा’ से लंबे समय से जुड़ी हैं। उनमें इतनी गजब की हिम्मत और जूझने का माद्दा है कि वे बड़े-बड़े खतरनाक अभियानों के लिए सहज तैयार हो जाती हैं। कहती हैं कि अंतरिक्ष मिशन खतरे से भरे जरूर होते हैं, लेकिन उनके जैसा रोमांच और कहीं किसी को नहीं मिल सकता। वे सात बार अंतरिक्ष अभियानों में यात्रा कर चुकी हैं। कई बार मौत के खतरे को बहुत पास से महसूस कर चुकी हैं। लेकिन, इन खतरों के बाद भी वे नए अंतरिक्ष अभियान में जाने के लिए उतावली हैं। उन्हें लगता है कि अंतरिक्ष के करियर में उन्हें अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

1965 में ओहायो (अमेरिका) के युक्लिेड शहर में पैदा हुईं सुनीता, स्कूली जीवन से ही खतरों की खिलाड़ी बन गई थीं। उन्हें सड़कों पर तेज रफ्तार से बाइक चलाने में खासा मजा आता था। बाइक रेस की कई प्रतियोगिताएं भी स्कूली दौर में उन्होंने फतह की थीं। बेटी के रफ्तार प्रेम से कई बार उनके पिता को भी डर लगने लगता था। रेसिंग के चक्कर में कई बार उन्हें पिता की डांट भी खानी पड़ी थी। सुनीता याद करती हैं कि उनके पिता और मां कई बार चिंतित जरूर हो जाते थे। लेकिन, उन्होंने कभी भी अपनी इच्छाएं उन पर थोपने की कोशिश नहीं की। शायद, इसी वजह से वे अंतरिक्ष के करियर में इतनी सफलता हासिल कर पाई हैं।

सुनीता के पिता दीपक पांड्या और मां बोनी पांड्या हमेशा बेटी की हौसला अफजाई करते रहे हैं। सुनीता अपनी बेमिसाल सफलता का पूरा श्रेय अपने मां और पिता को ही देती हैं। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि जीवन के कई मोड़ों पर वे बुरी तरह से असफल हो चुकी हैं। लेकिन, ऐसे क्षणों में सबसे ज्यादा हौसला अफजाई का काम उनके पिता ने ही किया है। वे यही कहते थे कि असफलताओं से ही सफलता का रास्ता निकलता है। ऐसे में, असफलताओं से क्या घबराना?

दीपक पांड्या, ओहायो के एक जाने-माने डॉक्टर रहे हैं। वे मूलरूप से गुजरात के मेहसाणा के रहने वाले हैं। अमेरिका जाकर उन्होंने सल्वेनिया मूल की बोनी से शादी कर ली थी। अमेरिका में प्रवास के बावजूद दीपक का जीवंत संपर्क गुजरात से बना रहा। वे हर दो-चार साल में परिवार सहित गुजरात जरूर लौटते रहे हैं। ऐसे में, भले सुनीता का जन्म अमेरिकी धरती पर हुआ हो, लेकिन पिता के ठेठ भारतीय संस्कारों का गहरा असर उन पर रहा है। सुनीता कहती भी हैं कि पिता की आंखों से उन्होंने भारत को बहुत करीब से देखा है। खास तौर पर भगवत गीता और उपनिषदों की शिक्षा का उन पर गहरा प्रभाव है।

अंतरिक्ष अभियानों के दौर में सुनीता अपने साथ भगवत गीता और उपनिषदों की दो पुस्तकें भी ले गई थीं। कहती हैं कि गीता के जरिए उन्हें जीवन का नया दर्शन मिला है। वे समझ पाई हैं कि डर इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है। जब जोखिम ज्यादा हो, ऐसे क्षणों में गीता के संदेश बहुत कारगर होते हैं। अंतरिक्ष मिशन के दौर में उन्होंने कठिन क्षणों में गीता के संदेशों से नई ऊर्जा ली थी। क्योंकि, गीता का संदेश है कि सकारात्मक उद्देश्य के लिए मजबूत दृढ़ संकल्प अपने अंदर पैदा करो और आगे बढ़ते चलो। किसी ने डर पर काबू पा लिया, तो समझो आधी सफलता तो अपने आप ही मिल गई। उन्हें लगता है कि इस तरह की मजबूत इच्छाशक्ति उन्हें गीता के ज्ञान से प्राप्त हुई है। इसीलिए वे हर अंतरिक्ष अभियान में अपने साथ गीता ले जाना नहीं भूलतीं।

इन भारतीय धार्मिक पुस्तकों के अलावा सुनीता को कई भारतीय व्यंजन बहुत लुभाते हैं। वे कहती हैं कि खास तौर पर अलग-अलग किस्म के समोसे उन्हें बहुत भाते हैं। पिछले साल वे लंबे अंतरिक्ष   अभियान में थीं। इस दौर में उनके साथ समोसे भी थे। जिनका मजा उन्होंने अंतरिक्ष में लिया था। 2007 में सुनीता ने एक बड़ा अंतरिक्ष मिशन पूरा किया था। कई दिन अंतरिक्ष में गुजारने के बाद वे सकुशल धरती पर लौंट आई थीं। इस अंतरिक्ष अभियान की सफलता से सुनीता की चर्चा पूरी दुनिया में हो गई थी। इसी अभियान के बाद वे अक्टूबर 2007 में भारत यात्रा पर आई थीं। यहां आने पर उनका स्वागत जिस गर्मजोशी से हुआ था, उससे वे भाव-विभोर हो गई थीं।      इस यात्रा के दौरान वे गुजरात में अपने पिता के पैतृक स्थान का दौरा भी करने गई थीं। भाव-विभोर होकर उन्होंने पिता के पैतृक घर की मिट्टी को माथे पर लगा लिया था।

2008 में भारत सरकार ने उन्हें विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में खास उपलब्धि के लिए ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाजा था। 2007 में उन्होंने अंतरिक्ष अभियान 14-15 को रिकॉर्ड सफलता से पूरा किया था। इस अभियान में भी उन्होंने लंबे समय तक अंतरिक्ष में जोखिम भरी चहलकदमी का रिकॉर्ड बना दिया था। पिछले साल अगस्त-सितंबर में सुनीता ने अंतरिक्ष प्रवास के दौरान सात बार ‘स्पेसवॉक’ करने का करिश्मा कर दिखाया। उन्होंने 50 घंटे और 40 मिनट अंतरिक्ष में चहलकदमी करके एक विश्व रिकॉर्ड बना डाला है।  वे अंतरिक्ष में 322 दिन तक रहने का विश्व रिकॉर्ड भी बना चुकी हैं। वे दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने इतना लंबा समय अंतरिक्ष में सफलता पूर्वक बिताया है। 47 वर्षीय सुनीता को लगता है कि उम्र से भले वे नौजवान न रह गई हों, लेकिन उनका हौसला तो पहले से भी ज्यादा जवां हो गया है। उनकी इच्छा है कि वे अंतरिक्ष में प्रवास का नया विश्व रिकॉर्ड बनाएं। अंतरिक्ष प्रवास के दौरान कुछ न कुछ ऐसा खोज लें, जो कि अगली पीढ़ी के लिए बहुत कारगर साबित हो। बस, जिंदगी के लिए उनकी यही ख्वाइश बची है। वह चाहती हैं कि मून मिशन में और काम हो। वहां भी अंतरिक्ष स्टेशन बनाया जाए। ताकि, अंतरिक्ष अभियान के काम में तेजी आए।     इस सप्ताह वे भारत की यात्रा पर यहां पहुंची हैं। सोमवार को ही दिल्ली के राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के एक कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम में देश के तमाम हिस्सों के स्कूली बच्चे जुटे थे। इन बच्चों ने अपनी ‘अंतरिक्ष दीदी’ से जमकर सवाल पूछे। हर सवाल का जवाब सुनीता ने बड़े धैर्य से दिया। उन्होंने बच्चों को चांद-सितारों की दुनिया से जुड़े अपने तमाम अनुभव बताए। यह भी बता डाला कि कैसे अंतरिक्ष अभियान में कई बार उन्हें दौड़-दौड़कर एक-एक बूंद पानी लपकना पड़ता था? क्योंकि, पानी एकदम उड़ने लगता है। वे टूथपेस्ट से दांतों में ब्रश भी कैसे कर पाती थीं, इसके अनुभव भी उन्होंने बड़े मजेदार ढंग से बताए। बातों-बातों में ही अंतरिक्ष अभियान का तमाम ज्ञान देकर उन्होंने बच्चों को खूब हंसाया भी।  एक बच्चे का सवाल था कि दीदी, आप पिछले साल अंतरिक्ष में लंबे समय तक थीं। उस समय सबसे ज्यादा आपको किसकी याद सताती थी? मासूम के इस सवाल पर सुनीता पहले खिलखिलाकर हंसी, फिर उन्होंने बताया कि सच्चाई तो यह है कि वे अंतरिक्ष में अपने प्यारे डॉगी को सबसे ज्यादा मिस करती थीं। यह बात उनके प्यारे पति को भी पता है। उन्हें यह जानकर अच्छा नहीं लगा कि वे उनकी बजाए प्यारे डॉगी को सबसे ज्यादा मिस करती थीं। यह जवाब सुनाकर सुनीता ने सभी बच्चों को खूब हंसाया। जाते-जाते सबको नसीहत भी दे गईं कि बड़े से बड़े काम को मजबूत इरादों से किया जा सकता है। बस, कठिन क्षणों में हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। उन्होंने एक ही चीज सीखी है कि परेशानी आती है, तो उसका कोई न कोई तोड़ जरूर होता है। बस, इन क्षणों में धैर्य बनाए रखने की खास जरूरत होती है।  एक सवाल था कि कल्पना चावला के हादसे के बाद उन्हें अंतरिक्ष मिशन में कितना डर लगा था? कल्पना चावला का जिक्र आया, तो सुनीता काफी भावुक नजर आईं। ‘नासा’ में उनकी दोस्ती कल्पना से हो गई थी। उल्लेखनीय है कि कल्पना भारतीय मूल की पहली महिला थीं, जो कि ‘नासा’ के अभियान में अंतरिक्ष पर पहुंची थीं। लेकिन, 1 फरवरी 2003 को मिशन से लौटते वक्त उनका यान ध्वस्त हो गया था और उनकी मौत हो गई। कल्पना चावला की मौत से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई थी।  कल्पना को खोने के बाद देश के लोग सुनीता की सलामती के लिए ज्यादा जज्बाती हो जाते हैं। पिछले साल जब वे अंतरिक्ष मिशन से धरती पर लौटने वाली थीं, तो इस भारतीय मूल की बेटी की सलामती के लिए देशभर में प्रार्थनाओं का दौर श
ुरू हुआ था। स्कूली बच्चों ने प्रार्थनाएं की थी कि ‘सुनीता दीदी’ तुम सकुशल धरती पर जरूर लौट आना। क्योंकि, कल्पना दीदी को खोने का गम हम नहीं भूले हैं।  सुनीता ने कहा है कि भारत सरकार ने जिस तरह से अंतरिक्ष अभियान कार्यक्रमों को वरीयता देनी शुरू की है, ऐसे में उन्हें विश्वास है कि इस देश में तमाम कल्पना चावला जरूर पैदा होंगी। उन्हें भी भारत में अपनी पैतृक जड़ें होने का बहुत गर्व है। उनकी इच्छा है कि वे यहां पर हिमालय क्षेत्र और दक्षिण भारत की जमकर यात्राएं करें। उन्होंने अंतरिक्ष मिशनों में वहां से कई बार भारत की धरती को निहारा है। अंतरिक्ष से भारत जितना खूबसूरत लगता है, उससे कहीं ज्यादा यहां आने पर उसकी खूबसूरती महसूस होती है।  भारत प्रवास के दौरान दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के कार्यक्रम पूरे होने के बाद सुनीता, अपने पिता   के पैतृक स्थान मेहसाणा जाएंगी। गुजरात सरकार ने ‘सुनीता बेटी’ का बड़े पैमाने पर अभिनंदन करने का कार्यक्रम बनाया है। दिल्ली के बाद मुंबई में भी सुनीता ने दोहराया है कि विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं ने पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है। कंप्यूटर क्षेत्र में जिस तरह से भारतीय प्रतिभाओं ने अपना दबदबा बनाया है, उससे दुनिया में भारत की छवि एकदम बदल गई है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले सालों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय युवा अपनी प्रतिभा से ब्रह्मांड के तमाम उलझे रहस्यों को सुलझा लेंगे। दिल्ली की ‘वर्कशॉप’ में एक छात्र ने सुनीता से सवाल किया था कि आखिर हम लोग ‘ब्लैक होल’ की गुत्थी अभी तक क्यों नहीं सुलझा पाए? इस पर अंतरिक्ष की इस बेमिसाल उड़नपरी का दो टूक जवाब था कि अब इन अनसुलझी अंतरिक्ष पहेलियों को सुलझाने की जिम्मेदारी भारतीय युवाओं की है। उन्हें विश्वास है कि यहां के युवाओं का तेज दिमाग दुनिया में कुछ भी अनसुलझा नहीं रहने देगा।  सुनीता विलियम्स ने बच्चों को यह भी बता दिया कि जीवन में कई बार संयोगों की भी बड़ी भूमिका होती है। जैसे कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे एक दिन अंतरिक्ष यात्री बनेंगी। दरअसल, वे तो पशु-चिकित्सक (वेटेरनरी डॉक्टर) बनना चाहती थीं। क्योंकि, उन्हें कुत्ते-बिल्लियों से काफी प्रेम रहा है। लेकिन, भौतिक शास्त्र में डिग्री लेने के बाद उनका रुझान अंतरिक्ष विज्ञान की तरफ बढ़ने लगा। जब वे नेवी में लड़ाकू हैलीकॉप्टर की पायलट बनीं, तो उन्हें लगा कि वे हैलीकॉप्टर से जांबाजी दिखाने का माद्दा रखती हैं, तो अंतरिक्ष यान क्यों नहीं उड़ा सकतीं? बस, वे अपने लक्ष्य में जुट गईं। इसी के चलते जून 1998 में उनका चुनाव ‘नासा’ के अंतरिक्ष मिशन के लिए हो गया।  वे अपनी कामयाबी का श्रेय पिता से मिले भारतीय संस्कारों और जीवन-दर्शन को देना नहीं भूलतीं। अब भला बताइए! कि भारत के प्रति इतनी भावुक ह्रदय सुनीता विलियम्स को आप कैसे खांटी अमेरिकी मान सकते हैं? सुनीता कहती भी हैं कि जिसने अंतरिक्ष से दुनिया को देखा है, उसने समझ लिया है कि पूरी दुनिया वाकई में गोल है और इंसान ने ही इसको सीमाओं में बांधा है। वरना, प्रकृति ने तो दुनिया को एक ही बनाया है। वह भी तरह-तरह के रंगों से भरपूर।

(लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।)

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